अप्रैल 28, 2011

जिंदगी वाया 615

(नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से जे.एन.यू. जाने के लिए डी.टी.सी. बस जाती है, ६१५ नंबर की. यह मिंटो रोड (पिन कोड-११०००१) से चलकर पूर्वांचल होस्टल (पिन कोड-११००६७) तक जाती है. कनाट प्लेस, इंडिया गेट, सरोजिनी मार्केट होते हुए ये बस फिर जे.एन.यू.होस्टल पहुँच जाती है. ऐसा कई बार हुआ कि यह छोटा सा सफर पूरा करते हुए पढ़ाई का अपना पूरा सफर याद आने लगता है. ये सफर एक कान्वेंट स्कूल, शिशु मंदिर , गोरखपुर विश्वविद्यालय होते हुए जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय तक अब आ पहुंचा है. ६१५ कभी झूम के चलती है, कभी जाम में फस जाती है. बिलकुल ज़िंदगी की तरह. इसमें खूब भीड़ होती है . सफर में जाने कितने मिले. पर सबको कहाँ एक ही मंजिल पर रुकना होता है..! ये ६१५ ना अक्सर रेड सिग्नल पर रुक जाती है..पर कभी-कभी रेड होने के एकदम पहले ही निकल जाती. ज़िंदगी में भी ऐसे वाकये तो आये ही जब हमने खतरे की घंटी बजने से पहले ही लगाम अपने हाथ में ले ली हो..!)






नई  दिल्ली रेलवे स्टेशन से ६१५ को आजकल पकड़ना आसान नही. कंस्ट्रक्सन वर्क  चल रहे हैं तो कुछ समझ में नही आता कि कहाँ खड़े रहें तो बस मिल जायेगी. आज सोचता हूँ तो लगता है शुरू में पापाजी को भी बड़ी दुविधा हुई होगी कहाँ पढ़ायें बेटे को . घर का पहला बच्चा , अभी छोटा भी है ठीक से तीन साल भी नही. १९८७-८८  में बच्चे को स्कूल भेजने की औसत उम्र (मध्यमवर्गीय परिवार में) ४-५ साल तो होती होगी. मकान मालिक की बेटी इन्डियन कान्वेंट में पढ़ती है तो उसी में पढ़ाना ठीक होगा. पापाजी के मुताबिक शुरू के एक-दो साल तो बच्चा स्कूल जाना सीख ले बस.

कुछ बेहद धुंधली तस्वीरें याद है मुझको..आप शायद ना मानें ..पर मान लीजिये..सबको याद होती हैं. ये यादें एक रेशमी महीन धागे जैसी  होती हैं. इनमें समय गाँठ पे  गाँठ लगाये जाता है. कुछ गांठें चुभती हैं, कुछ्को बार-बार छूनेका मन होता है..गांठें भी तो रेशम की ही होती हैं न..इसलिए. अगर इन गाठों का कोई एक सिरा खुल जाता है, या फिर कोई खोल देता है ना फिर याद आने लग जाती है कई ढेर सारी यादें, बातें..उस ज़माने की महक भी . तो यूँ ही मुझे भी याद आती हैं वें तस्वीरे..धुधली-धुधली. वे तस्वीरे रंगीन हो जाती हैं जब इस बस की खिड़की से किसी स्कूल जाते छोटे से बच्चे को देखता हूँ अपनी थोड़ी सी बड़ी बहन के साथ. दीदियां  कुछ खास बड़ी नही होती पर उस वक़्त और फिर तबसे हमेशा वो कितनी बड़ी लगती हैं  ना. उन दीदी के साथ सड़क पार करना याद आता है..बस और कुछ नही. सड़क पार करना मुश्किल होता है ना. मुश्किल चीजें याद रह जाती हैं. सड़कें ज्यादातर वन वे होती थीं. लोग एक -दुसरे से गुत्थम-गुत्थम चलते थे..हाल-चाल होती रहती थी. आज सड़कें कई तरह की हैं..सो लोग रफ्तार में हैं..लाल बत्ती काम ना करे तो लोग बिलकुल ना रुकें..! सड़कें जितनी ही चौड़ी हुई हैं लोगों के पास उतना ही वक़्त कम हुआ है.
 


(...जारी )

अक्तूबर 23, 2010

लंबे लाल पहाड़

"इससे पहले कि सांस लूँ
कुछ कहने के लिए साहब
वे जान लेते हैं मेरी त्यौरियों से
कि क्या कह डालूँगा अभी मै.
इससे अधिक वे ये जान लेते हैं कि
वह ही क्यूँ  कहूँगा मै..!
और फिर जब मै कहता हूँ..कुछ
तो उन्हें नहीं दिखता
मेरा लाल चेहरा,
सुखें ओंठ, गीली-सूनी-
धंसी आँखें, पिचके गाल,
या और कुछ भी.
वे मेरी बात में तलाशते हैं
मार्क्सवाद, उदारवाद, बाजारवाद,
नक्सलवाद, जातिवाद या फिर मजहबी कतरनें.
सो सोचा है , कहूँगा नही उनसे  अब कुछ.
साँसे जुटाऊंगा , धौंकनी भर-भर कर
ताकि घटे ना आक्सीजन
उन लम्बे लाल ईर्ष्या-द्वेष के पहाड़ों को लांघते हुए. "


पेंटिंग साभार :Tsuneko Kokubo (स्रोत :गूगल इमेज)

सितम्बर 09, 2010

लव ..कैन किल यू...!


अगर मै  ईमानदार हूँ और अभी स्टुडेंट हूँ तो मानना होगा..कि प्यार हो ही जाता है. इसमें दोस्तों का कोई कसूर नही. उन्हें या उनमें से किसी को भी हो गया ....प्यार किसे है, किससे है..यकीन मानिये ये सब टुच्चे सवाल हैं. मै बयान दे रहा ..तो मुझे है....हंसी आती है इस सोच पर..!  पर एक बात यकीन से मै कह सकता हूँ....ये लव है ना...सम्हलके..इट कैन किल यू....!


"बहुत डगर कठिन है, प्रेम की....
लव ..कैन किल यू...!

इन हवाओं में तैरती हैं इतनी नफरतें भी,
गुत्थम-गुत्थम परेशां है चाहतें और
मन में गोल-गोल घूमती उम्मीदें..!
ये उम्मीदें ..कैन किल यू...!

क्षितिज पार से आते हैं कुछ चेहरे ..
उनपर बजबजाती है अनगिन बातें..
ऊंघता आकाश छितराए से हैं सपनों  के बादल
ये सपने..कैन किल यू....!


हर तरफ फैला है जहर जज्बातों का..
रंगीन रातों औ' बेहया ख्वाहिशों का..

अंजाम सिफर क्यूँ उन मासूम कोशिशों का..
वे कोशिशें..कैन किल यू...!

उफ ये गम  और फिर बार-बार डूबना..
तेरे लिए इतना भी क्यूँ सिसकना..
फिर-फिर दौड़-पकड़  आदतों को पहनना..
ये आदतें..कैन  किल यू...!

साथी; रोज चाँद का तनहा डूबना मत देखो..
उसे सोचो उसे लिख लो , प्यार से मत देखो..
उसे जी लो, पी लो , पर उस पार से मत देखो..
ये देखना..कैन किल यू...!

मत करो प्यार..इसे बस मौक़ा दो..
इजहार जरूरी नही, एहसास छुपा लो
वजह बासी हो ना जाये, सवाल लुटा दो..
प्यारे .. ये प्यार ..देख लेना...वुड किल यू...!"


चित्र साभार: गूगल इमेज (ग्रेचर मेयर की एक पेंटिंग: ब्रोकेन हार्ट )

मार्च 03, 2010

तितर-बितर मन : एक बड़बड़ाहट

तितर-बितर मन : एक बड़बड़ाहट


तितर-बितर मन
भीतर कुनमुना रहा एक आलाप
जो अनगढ़ सपनों से बन पड़ा है.

गला सूख रहा; सारे आदर्श वाक्य निस्तेज से हैं.
सब समझ लेता है मन, उधेड़बुन पर जाती नहीं.

दरक रहे केंचुल संस्कारों के, रेंग रही देह शाश्वत पहनावे में से.
ताना-बाना नया-नया गढ़ता मन,
कुछ बासी से प्रश्न ढहा देते उन्हें हर बार.

आदत, जान गए हैं कि नहीं निभाए जा रहे नियत व्यापार
बोरियत खूब समझती है अपनी वज़ह.

मन, जुआठे के साथ नहीं लगा, पर चल रहा लगातार अटपट.

चिंतन अपने चरम पर पहुंचकर शून्यता का लुआठा दिखा देता है,
तर्कों से घृणा हो रही-एक लंबी उबकाई सी.

सोच में कोई नए जलजले नहीं;
और शायद ऐसी कोई कालजयी जरूरत भी नहीं.

विचलित-विलगित आगत से..आगम आहट का कल्पित सौंदर्य..
भी बासी लगेगा जैसे.

'सापेक्ष' शब्द ने 'सत्य की खोज' का आकर्षण ध्वस्त कर दिया है.
नए मूल्यों की खोज जैसी कोई बात नहीं; सुविधानुसार नामकरण कुछ आदतों का.

 बड़बड़ाना, एक जरूरत है, मुर्दे को ईर्ष्या है इस अदा से.
सरकार, सर्कस की सीटी बजा रही, टिकट गिरे हैं जमीं पर.

चंचल चित्त--ठीक है, हंसेगा नहीं चेहरा अब;
आँखों का कोई भरोसा नहीं, ओंठ फिसलेंगे ही.

पागल का आर्तनाद, मायने नहीं रखता और
सेकेण्ड की सुई को कोई फरक नहीं पड़ता.

नए जूतों ने कदम बाँध दिए हैं,,,सभ्यता की चाल बासी है..पालिश होते रहते हैं चमड़े..!

सांस चलती जाती है..कुहरे में नहीं दिखता ट्रेन को स्टेशन या फिर सिग्नल भी.

रीढ़ टेढी होती जा रही है, पन्नों पे बुकमार्क्स..मुद्दे कभी सुलझते नहीं.
भयानक साजिश ओढ़े सिस्टम मतवाला है, जवान देह ने सरेशाम आग लगा ली है.

इतना कुछ दिखता है...मौला.
दिखाता-सुनाता है इतना कुछ
इतनी गाड़ियां, इतने हार्न..!

चाह...गरम उच्छ्वासें, ट्रैफिक जाम है.
हांफते इंजनों को इतनी जल्दी है कि सिग्नल-मिनट्स बढ़ते जा रहे.

सिक्के चमकदार, चिकने , अंधा पशोपेश में.
गिने-समझे नही जा रहे रुपये.

स्कालर लोग लिख रहे, गन्ना जल रहा.
वैलेंटाइन पे प्रेमिका पूछना चाह रही-उमर भर चीनी खरीद पाओगे..?

अनुलोम-विलोम, बाबा अब किंगमेकर बनेंगे.
डायबिटीज मर्ज, चर्बी का मर्ज है.
सांस गहरी-गहरी खींचनी होगी.
आँख मीचे रहना होगा..कहीं कोई क्रांति
आग बुझा रही होगी,
कहीं कोई कुत्ता पूंछ हिलाए जा रहा होगा.

मुझे तत्काल कुछ करना होगा.
नींद की दवाई नहीं खानी है मुझे...!!!



चित्र साभार : क्रमशः PAT PURDY, DANIEL MCKERNAN

जनवरी 12, 2010

“ सहज..2010..”


“ सहज..2010..”


नए साल पर लिखना चाहिए कुछ..इतना तो बनता ही है..यार..!
2009 जा चुका है. कहाँ कुछ चला जाता है..? कुछ नहीं जाता...सब कुछ यहीं रहता है..चेहरे पे, नसों मे, बहता रहता है...मेरी प्रतिक्रियाएँ बताती हैं मेरी हालत..। कुछ देखने-टोकने की आदत जाती नहीं..क्या करूँ..? गुजरा साल, हर साल की तरह कुछ और सीख दे गया. मसलन; अपनी अभिनय-क्षमता निखारते रहो. लोगों को यथार्थ भी मिलावटी चाहिए. एक आदमी मे वाकई देखो कितने और भी आदमी झूलते रहते हैं..अपनी आँखों को दिल-दिमाग से सटाकर रखना दोस्त..गच्चा खा जाओगे..।
ब्लागिरी मतलब..अपने ideas हाट पे लगाना..शायद. हम धीरे-धीरे नुमाइशी होते रहे..लोग nice-nice करते रहे.ब्लागिरी पे क्या कहना—कुछ जिंदा से लोग आपके पन्ने पलट सकते हैं...इतना कम है क्या..? इसमें इतना साहित्य-सेवा जितना कुछ नही है..ज्यादा सेंटी बनने की जरूरत नही है...! बिना दायित्व के भी लिखने दिया करो यार कहीं...!
नए साल से उम्मीदें.........तो गुजरे साल से कम नही है पर depend करता है कि अपने-आप से कितनी उम्मीदें बची हुई हैं..। पापा की आवाज—अपने आप को सम्हाल लो , बहुत है..! वाह...कितने समझदार हैं वकील लोग. कोर्ट मे इंटरकास्ट लव-मैरिज कराते हैं..और घर पे ब्लड की purity पर आख्यान देते हैं...!

जोड़-घटा कर चीजें तय करना चाहता हूँ..क्या करना है..नए साल मे..! क्या नहीं करना है, इसे कभी सोचना नहीं पड़ा ..होते रहता है..आवारगी का क्या हिसाब-किताब..! “..तुझमे रब दिखता है..यारा मै क्या करूँ..!”


नया साल अभी अपने बाल सँवारे ही था कि मुलाक़ात हुई उनसे जो फुरसत मे/से, बड़ों-बड़ों की मौज ले लेते हैं...फ़ुरसतिया जी...! कितनी जँचती है आपके चेहरे पर आपकी मुस्कान..और बेपरवाही( कोई भ्रम ना पालें..). आप मे कई विशेषतायें हैं जो आपको सबसे अलग कर देती हैं..! आप ब्लागिरी के इतिहास-पुरुषों मे से हैं..सो इनसे उड़ा नही जा सकता..हाँ, साथ थोड़ी देर उड़ सकते हैं. वरिष्ठ हैं..तो वरिष्ठों की जमकर मौज ले सकते हैं/लेते ही हैं. 3G मोबाइल-internet enabled तो..कहीं से भी-किसी पर बरस सकते हैं/ बरसते ही हैं. सर्वशक्तिमान-शक्तिशाली..। सबसे ज्यादा reference देने लायक पोस्टें आप सिरजते हैं..एकदम फॉर्मूला मार्का. ब्लागिरी-पोलिटिक्स से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नही बस हाथ धुलते रहते हैं अक्सर..:)
सोचिए अगर फ़ुरसतिया नही होते ब्लोगजगत मे तो फिर क्या होता..मौज-पंथ किसी पेन की सूखी स्याही मे या किसी के पेट मे ही दम तोड़ देता । आभारी हूँ आपके दर्शन हुए..मन खिल-खिल सा गया. प्र-फुल्लित..फूल के कुप्पा..:)

सागर साहब भी तशरीफ़ लाये. आँखों मे इतनी लहरें...कैसे सम्हलते/ सम्हालते हैं साहब. गोर्की याद आए यार. सपाट बयानी..आवाज मीठी-महीन पर होशियार रहें कमजोर दिल वाले....विनम्र बेबाकी आपको हिला सकती हैं..। अपनी रचनाओं से दिल पे अंगुलियाँ फेरने की आदत पड़ गई है जनाब को. फ़ुरसतिया जी और सागर साहब के साथ झूठे ही ब्लागिरी के दशा-दिशा पर थोड़ी बात होने लगी..ना हमें किसी निष्कर्ष की तलाश थी..ना इसकी चिंता ही. यह प्रतीक्षित मुलाक़ात खुशगँवार रही..कहीं-कुछ चमत्कारिक सा नही रहा तो सो सजोने लायक भी रही ये मुलाक़ात. आभारी हूँ...फिर-फिर आइएगा..आगे से भोजन की व्यवस्था भी रहेगी...:) गहरी साँस ने कहा- आभासी माध्यम इतना आभासी कहाँ रहा अब...धन्यवाद अनूप जी और सागर साहब..!


नया साल इंसाफ माँगता है, गुजरे कई साल के घिसट-पिसट का. इस साल हर क्षण सहज रहने/होने का अभ्यास करना चाहूँगा. ऐश्वर्या राय/बच्चन का एक इंटरव्यू याद आता है—“महत्वपूर्ण होना अच्छा है..अच्छा होना और भी महत्वपूर्ण है..”
इंडिया टुडे कहता है..बीता साल पुनरोदय का रहा..
किनका...?
भारत अब smart हो चला है. 91 मे बचा-खुचा 67 टन सोना गिरवी रख दिया था हमने और 2009 मे 200 टन सोना खरीद लिया हमने आईएमएफ़ से. शाबाश. ठंड से पर रामहरख मर गया, पिछले महीने उसकी इकलौती बेटी का इकलौता जेवर बिक गया..ससुराल की नाक तब भी जाती रही. कोपेनहेगेन मे हमारी सफलता ये कि हम अपनी हेकड़ी जता पाये..Thanks China. तुम सीमा पर थोड़ा और उत्पात मचाये रख सकते हो. दलाई लामा को रज़ाई ओढ़ाएंगे हम आखिर अपनी संप्रभुता भी है कोई चीज. शर्म-अल शेख मे जो हुआ, ठीकी हुआ आखिर बड़े भाई हैं हम पाकिस्तान के..क्ंता-म्ंता तो खिलाएंगे ना..बोलो..। नैनो एक फिसड्डी कार साबित हुई है.कोई मीडिया वाला नही लिखता इसे. टाटा कब किसे कहाँ क्या finance कर दे..! हाकी की स्टिक टेढ़ी होती जा रही पर कुछ की पगड़ी नही ढीली हो रही. धोनी खेल पुरस्कार लेने नही पहुँचते.. घर-घर मे दिखने वाला ऐड की शूटिंग भी तो थी उसी दिन. सेंसेक्स स्थिर हो चला है अब..क्या फरक पड़ता है मीडिया के लिए कि मै किलो भर चीनी नही खरीद पा रहा. अख़बार वालों के लिए अब महँगाई सनसनीखेज नही. दो उम्दा फिल्में आती हैं पा और थ्री इडियट्स जिसमें मीडिया-कार्यप्रणाली और सिस्टम के status quo पर प्रहार है. मिडियायी ब्लागर तिलमिला पड़ते हैं..मुझे टिप्पणी खर्चने का मन नही होता.

आशा है नए साल मे पोगा-पंथी चलती रहेगी. क्लिष्ट शब्दों का सहज/साधिकार प्रयोग करने वाले क्लिष्ट शब्दों का विरोध/व्यापार जारी रखेंगे. मौज वाली पोस्टों पर टिप्पणियाँ उमड़ती रहेंगी. मुझे विनम्र रहना चाहिए. सहज..!
“ सहज..2010..” 


(चित्र साभार:गूगल)