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JNU स्कूल नही, विश्व विद्यालय है ..!

कौन समझाए, यह विश्व विद्यालय है स्कूल नही है कि यहाँ कुछ घोंट के पिलाया-पढाया जाए....एक सच्चे अर्थों का लोकतंत्र है...हर तरह की विचारधारा के लिए जगह है, हाँ, ये अलग बात है, कि मीडिया सनसनी की खातिर केवल ऑफ़ बीट ख़बरों को प्रमुखता देती है....हूँ तो मै यहाँ सात साल से. मुझसे किसी ने नहीं कहा कि ये करो और ये मत करो....ए बी वी पी और एन एस यू आई की भी यहाँ उतनी ही हलचल है जितनी वाम पंथी संगठनों की....! हाँ, एक बात साफ़ कर दूँ, यहाँ कैम्पस में चुनाव वो मार्क्सवाद से नहीं जीतते हैं, अपने साल भर की मेहनत से जीतते है, अपनी सांगठनिक क्षमता से जीतते हैं, यहीं राइट विंग के संगठन मात खा जाते हैं, इसका मतलब ये नही कि किसी विचार धारा की हार-जीत हो जाती है. ...! मै हूँ बिलकुल दिल से राईट विंग का पर मुझे जे एन यू से प्यार है, क्योंकि मै जानता हूँ...यहाँ सच्चे अर्थों में लोकतंत्र है....!

#श्रीशउवाच
("in response of a person who doesn't like JNU on illogical basis.")

श्रीश की श्रीश से एक बात-चीत

श्रीश की श्रीश से एक बात-चीत कुछ यों हुई.....!  (बात पुरानी है, पर यहाँ रखने का मन हुआ)
"यार बुद्धिमान तो सब कुछ साक्षी भाव से लेते हैं। क्या खुश होना, क्या दुखी होना। अच्छा, तुम बताओ क्या चाहते हो....?"
"चाहता हूँ, भौतिक जगत में भी सब ठीक ठीक कर लूँ, मेहनत करूँ, उपलब्धियां मिलें, लोगों की अपेक्षाओं पर खरा उतरूँ, लोगों के काम आ सकूँ। और फिर राम जी का भी प्यार पा लूँ....."
"पहले क्या पाना चाहते हो, बाद में क्या पाना चाहते हो...?"
पहले  माँ, बाप, परिवार, देश, समाज के लिए कुछ करना चाहता हूँ....उनके लिए फर्ज़ बनता है, मेरा..., फिर खुद को राम जी के चरणों में समर्पित करना चाहता हूँ। "
"तो एक बार में एक काम निपटाना चाहते हो...पर ऐसा नहीं होता....! यही तो ज़िंदगी है....इसे आसान क्यूँ चाहते हो....ये क्यूँ आसान रहे.....सब तुम्हारी ईच्छा क्रम से अगर अनुक्रमित हो जाए तो तुम्हारे लिए इस ज़िंदगी में चुनौतियाँ क्या होंगी......?
"क्यूँ सब कुछ आसान ना हो....? चुनौतियाँ जरूरी क्यूँ हैं....मै किसी चीज से भागने के लिए थोड़ी कह रहा हूँ...करना तो सब ही चाहता हूँ...…

कमबख्त सच

कमबख्त सच

कमबख्त सच को सीढ़ियों सा
सरपट होना था।

कि कोई भी कदम दर कदम
चढ़ते हुए
यथार्थ की सपाट छत पर पहुँचता...।

पर मुआ हुआ गोल प्याज सा
छीलो, उघाड़ो हर परत
हाथ कुछ ना आता।

दरम्यां हथेली पे ही सूख जाते
इकलौते आँसू, जाने
और क्या कहना था।
(श्रीश पाठक प्रखर )

#श्रीशउवाच