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राजनीति में शत्रु और मित्र

राजनीति में मित्रता और शत्रुता दोनों बराबर निभानी होती है. किसी से मित्रता की कसौटी किसी से शत्रुता होती है और किसी से शत्रुता की कसौटी किसी से मित्रता होती है. चूँकि हर बुरे से बुरे इंसान की भी कई खूबियाँ होती हैं तो कम या अधिक एवं समय-सापेक्ष हर एक के चाहने वाले होते हैं. तो राजनीति सरल नहीं है. यों भी सभी का हित साधना सरल नहीं. फिर राजनीति में कुछ भी स्थाई नहीं क्योंकि हित स्थाई नहीं होते. मित्र...किसी मुद्दे पर शत्रु सरीखा हो सकता है अथवा लग सकता है...अगले ही मुद्दे पर शत्रु,  मित्र सा लग सकता है l 
..तो राजनीति में शत्रु अथवा मित्र जैसी कोई चीज नहीं. लोकतान्त्रिक नेतृत्व बहुत ही जटिल है ....विरोधाभासी भी. नेतृत्व मतलब एक आवाज...एक हांकने वाला पर लोकतंत्र तो समूहवाची संकल्पना है. तो लोकतंत्र में राजनीति और भी कठिन ...! फिर राजनीति में परसेप्शन अहम् होते हैं....जो इसे और भी दुरूह बनाते हैं, क्योंकि ये सीधा तर्क पे वार करते हैं..!  अगर मीडिया स्वतंत्र नहीं हो तो ये परसेप्शन और भी तीव्र हो असर करते हैं. क्योंकि समूची जानकारी पर आम जन की पहुँच नहीं है तो मीडिया परसेप्शन रचने-गढ़ने-फ़ैलान…