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संभव है, ईश्वर....

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संभव है, ईश्वर तुम बैठे होओ किनारे पर. सम्हाल रहे हो मेरी डगमग नाव.



जूझ रहे होओ साथ लहर-लहर  सूझ तो नहीं रहा मुझे यह अबूझ अम्बर.

लहरों के अनगिन थपेड़े नाव के ही नही, हिला देते हैं पोर-पोर मन की शिराओं के भी. ज़रा भी कम नही है भीतर भी झंझावात तर्क-कुतर्क के बह रहे पुरजोर प्रपात.