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साहित्य विभाजनकारी नहीं हो सकता, जब भी होगा जोड़ेगा.

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साहित्य शब्द कानों में पड़ते ही सहित वाला अर्थ दिमाग में आने लग जाता है. साहित्य में सहित का भाव है. कितना सटीक शब्द है. साहित्य शब्द में ही इसका उद्देश्य रोपित है. साहित्य विभाजनकारी नहीं हो सकता, जब भी होगा जोड़ेगा. इतना हर लिखने वाले को स्पष्ट होना चाहिए. इसीलिये जरुरी नहीं हर लेखन साहित्य में शामिल हो. मेरी दिक्कत ये है कि कुछ लोग साहित्य मतलब महज कविता कहानी समझते हैं. और इसे भी वो 'सब कुछ समझ सकने के गुरुर के साथ' समझते हैं-मतलब ये कि उन्हें सही समझाना कठिन भी है. कविता मतलब भी वो कुछ यूँ समझते हैं कि एक लिखने की शैली जिसमें ख़ास रिदम और एक पैटर्न की पुनरावृत्ति होती है जिसकी विषयवस्तु अमूमन प्रकृति अथवा नारी की खूबसूरती होती है. कहानी मतलब भी कि एक नायक होगा..एक नायिका होगी. ज़माने से लड़ेंगे-भिड़ेंगे-फिर जीत ही जायेंगे. 
एक सीधी सी बात समझनी चाहिए कि किसी भी विषय-विशेष में उतनी ही गहराई और आयाम होते हैं जितनी कि ज़िंदगी की जटिलताएं गहरी होती हैं. इस तरह कोई भी विषय विशेष का महत्त्व किसी भी के सापेक्ष कमतर या अधिकतर नहीं होता. मुझे क्या फर्क पड़ता है कोई चीज कोई ठीक से समझे या न…

धर्म की बात

"धर्म की बात होती है तो सबसे पहले मुझे वोल्तेयर की कही ये उक्ति याद आती है- ईश्वर ना होता तो उसके अविष्कार की आवश्यकता पड़ती. “If God did not exist, it would be necessary to invent him.” यह उक्ति ईश्वर अस्तित्व की बहस को एक संतुलन दे देती है. इसीलिये यह उक्ति बहुत ही खूबसूरत हो जाती है. ईश्वर हो ना हो, उसकी आवश्यकता तो है, रहेगी. हम मर्त्यशील हैं, समय की सीमा में बंधा है हमारा अस्तित्व. यह सीमित समय ही शायद हमारी सभी बेचैनियों की वज़ह है. जैसे आप कहीं घूमने जाते हो तो उस जगहका पूरा लुत्फ़ लेना चाहते हो, कम से कम उस जगह की ख़ास चीजों को जरूर महसूस करना चाहते हो...वहां भी हम कम समय में अधिक चीजें कर लेना चाहते हैं. कम समय में अधिक चीजें कर लेने के लिए सबसे आवश्यक है कुशल मार्गदर्शन. शायद धर्म की जरूरत यों महसूस की गयी हो. समय का नुकसान बर्दाश्त नहीं किया जा सकता था तो अनुशासन की आवश्यकता हुई. अनुशासन के लिए अनुशासक एवं मार्गदर्शन के लिए मार्गदर्शक की आवश्यक भूमिका में ईश्वर अवतरित होते हैं. भविष्य की अनिश्चितता एवं प्रकृति के गूढ़ रहस्यों से अनभिज्ञता; ईश्वर में स्वाभाविक आस्था एवं विश्वास…

ईश्वर यदि एक उपयोगी संकल्पना भी है तो वरेण्य तो हैं ही...!!!

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धर्म की बात होती है तो सबसे पहले मुझे वोल्तेयर की कही ये उक्ति याद आती है- ईश्वर ना होता तो उसके अविष्कार की आवश्यकता पड़ती.  “If God did not exist, it would be necessary to invent him.”
यह उक्ति ईश्वर अस्तित्व की बहस को एक संतुलन  दे देती है. इसीलिये यह उक्ति बहुत ही खूबसूरत हो जाती है. ईश्वर हो ना हो, उसकी आवश्यकता तो है, रहेगी. हम मर्त्यशील हैं, समय की सीमा में बंधा है हमारा अस्तित्व. यह सीमित समय ही शायद हमारी सभी बेचैनियों की वज़ह है. जैसे आप कहीं घूमने जाते हो तो उस जगह का पूरा लुत्फ़ लेना चाहते हो, कम से कम उस जगह की ख़ास चीजों को जरूर महसूस करना चाहते हो...वहां भी हम कम समय में अधिक चीजें कर लेना चाहते हैं. कम समय में अधिक चीजें कर लेने के लिए सबसे आवश्यक है कुशल मार्गदर्शन. शायद धर्म की जरूरत यों महसूस की गयी हो. समय का नुकसान बर्दाश्त नहीं किया जा सकता था तो अनुशासन की आवश्यकता हुई. अनुशासन के लिए अनुशासक एवं मार्गदर्शन के लिए मार्गदर्शक की आवश्यक भूमिका में ईश्वर अवतरित होते हैं. भविष्य की अनिश्चितता एवं प्रकृति के गूढ़ रहस्यों से अनभिज्ञता; ईश्वर में स्वाभाविक आस्था एवं विश्वास का…