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April, 2015 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

आपकी अमोल शुभकामनाओं के लिए ह्रदय से आभारी हूँ.

आपकी अमोल शुभकामनाओं के लिए ह्रदय से आभारी हूँ. ये ज्ञात-अज्ञात दुआएं ही हैं जिनकी बदौलत ये यज्ञ पूरा हुआ l अभी भी विश्वास नहीं होता कि पूरी हो गयी पी.एच. डी. l पिछले कई सालों से ये मेरे अस्तित्व के साथ यूँ चिपक गयी थी कि यही मेरी सीमा और यही मेरा विस्तार हो गयी थी. कुछ रास्ते, कुछ लोगों के लिए आसान और कुछ लोगों के लिए बहुत ही कठिन हो जाते हैं; इसमें काबलियत बस एक पहलू है l मेरे लिए यह रास्ता बहुत ही कठिन हो गया था l सैकड़ों बार सोचा कि इस रास्ते की मंजिल का मुंह मै नहीं देख सकूँगा l शुभेक्षाएं एवं दुआओं ने ही मुझे उबार लिया l और सच में रास्ते के इस किनारे आकर मै वही नहीं रह गया हूँ, जो रास्ते के उस छोर पर था l सीखा तो बहुत कुछ l पर शायद सबसे बड़ी सीख जो सीखी वो है-धैर्य l स्वयं पे विश्वास रखते हुए धैर्य का दामन पकडे हुए चलते जाना ...बस चलते जाना.......,....! और जब भी जितना भी मौक़ा मिल जाये ..खिलखिलाते रहना-हँसते और हंसाते रहना.... smile emoticon
शुक्रिया‪#‎JNU‬l डेमोक्रेटिक स्पेस की रट लगाना और डेमोक्रेटिक स्पेस उपलब्ध करवाने में बहुत अंतर है l यहाँ हर तरह के लोगों का स्वागत है l हर तरह क…

आप से नाउम्मीद नहीं

आने वाले सालों में उपलब्धियां 'आप' के पास भी होंगी गिनाने को. मोल-तोल की मीडिया 'आप' के नाम का भी ढोल बजाएगी ही. बाकियों से बेहतर तो 'आप' यूँ भी करोगे क्यूंकि अभी 'आप' के पास किसी का कुछ बकाया नहीं होगा. आइये स्वागत है भारतीय राजनीति के महासागर में....मुबारक हो कि 'आप' ने देर-सबेर वही स्विम-सूट पहन लिया. उम्मीद अभी भी 'आप' से ही है, क्यूंकि अभागे ग्राहक के पास गिनी-चुनी वही दुकानें हैं और 'आप' के यहाँ फिर भी थोड़ी राहत है. 'आप' निश्चिन्त रहें, इतिहास में 'आप' दर्ज तो हो ही गए हैं....बस सोच इतना ही रहा हूँ कि 'भारतीय राजनीति को नीति की राजनीति' के लिए अभी और, आह अभी और .....प्रतीक्षा करनी होगी....! नाउम्मीद नहीं हूँ मै ! ‪#‎श्रीशउवाच‬

जब भी मै कुछ गंभीर लिखता हूँ, मै स्पष्ट होता हूँ कि...

जब भी मै कुछ गंभीर लिखता हूँ, मै स्पष्ट होता हूँ कि 'मुझे भविष्य में कैसा समाज चाहिए?' भयाक्रांत, असुरक्षित, असंगठित, विभाजित, संकीर्ण अथवा समरस, संगठित, समन्वित, सतत, विकासोन्मुख ....! ऐसा सोचते ही मेरी भाषा संयत हो जाती है. मै सहनशील एवं साहसी हो जाता हूँ. मै आलोचना का स्वागत करने लग जाता हूँ, क्योंकि यह वो आयाम होती है, जो मुझसे संभवतः छूट जाती है. यह सोच मुझे आज की विभिन्न और बिखरी हुई कई समस्यायों के त्वरित हल से बचाती है, मध्य मार्ग की ओर ले जाती है, उनके एक सूत्रता को पकड़ पाती है. मुझे भारत के भविष्य में विश्वास है, इसलिए मै कोशिश करता हूँ कि मेरे अध्ययन एवं ऑब्जरवेशन का कम से कम दो या अधिक स्रोत अवश्य हो. अतीत से सीख लेता हूँ, विभेद और वैमनस्य छांटकर वहीँ छोड़ देता हूँ. मै चुनता हूँ, थोड़ी सी बुरी यादों के मुकाबले थोड़ी सी अच्छी यादों को..! आँख-कान खुली रखता हूँ, क्योंकि भ्रमित कोई भी हो सकता है जिसने किसी एक विश्वास को ही अपना सर्वस्व बना लिया हो . जानता हूँ, इसलिए चौकन्ना रहता हूँ कि जहाँ मै खड़ा हूँ, वहां के अपने बायसेस हो सकते हैं, दूसरों के भी हो सकते हैं...अपने बायस…

अपेक्षाओं की संकीर्णता

नेता, नायक, महापुरुष, समाज-सेवक, कलाकार, सरकरी सेवक, पत्रकार, अध्यापक, अधिवक्ता, चिकित्सक, अभियंता, कवि-लेखक आदि-आदि ......,...! ये सब अलग अलग लोग हैं. इन्हें अलग-अलग ही देखना होगा...! इनमे से जो भी प्रसिद्ध हो जाता है....उनमें हम सभी के गुणों की अपेक्षा करने लग जाते हैं. अपेक्षाओं की विडंबना देखिये, हम चाहते हैं, खिलाड़ी सचिन हर स्तर पर समाज के लिए 'सचिन' बन जाएँ. हम चाहते हैं कलाकार अमिताभ, हर स्तर पर समाज के लिए 'अमिताभ' बन जाएँ. बन जाएँ तो ठीक है, ना बन सकें तो क्या हम हिसाब लेंगे...क्योंकि वे 'प्रसिद्द' हैं..? प्रसिद्धि अर्जित गुण है...इससे अपेक्षा हो सकती है किन्तु बाध्यता नहीं. जरुरी नहीं कि प्रत्येक प्रसिद्द 'नेता', 'नायक' बन फिर 'महापुरुष' भी बन जाए...! कुछ लोग ही समन्वित अपेक्षा पर खरे उतरते हैं, अधिकांश जो नहीं पार उतर पाते अपेक्षाओं के पहाड़ से उनका मूल योगदान भी भुलाया जाने लगता है.
हर क्षेत्र के रोल मॉडल अलग अलग लोग होते हैं/होने चाहिए. कोई एक ही रोल मॉडल हर क्षेत्र में हम अपेक्षा करेंगे तो उस रोल मॉडल को बेजान मूर्ति बनते देर…

परिवर्तन और विरोधाभास

......सतत दबावों में तोष के लिए सहज ही जो समानांतर मै रच लेता हूँ मानस में...कहीं...., तू उससे ही तो नहीं ना रच लेता है 'भविष्य' ...बता ? ...और तो मुझे लगता है जैसे-परिवर्तन और विरोधाभास बस दो ही धर्म हैं जीवन के ..!
‪#‎श्रीशउवाच‬
Be stereotype..!

They like you; so they would accept you.
Refuse to be typecast..!
Only those who love you; could accept. People challenge even the danger of challenge. In this way, status quoists are more dynamic.


आप उन्हीं लकीरों पर चलो. लोग जो पसंद करते हैं, जरुर स्वीकार कर लेंगे आपको. संभवतः कुछ आपको आदर्श भी मानने लगें. उन लकीरों को अस्वीकार कर चलिए, लोग जो आपसे प्रेम करते हैं, शायद वही आपको स्वीकार कर सकें. लोग 'चुनौतियों के खतरे तक ' को चुनौती देते हैं, इन अर्थों में यथास्थितिवादी कहीं अधिक प्रयत्नशील हैं, चूँकि उन्हें सतत विरोध करना है. (कल 'रंगरसिया' फिल्म देखने के बाद ...सोचने लगा. )
‪#‎श्रीशउवाच‬