जब भी मै कुछ गंभीर लिखता हूँ, मै स्पष्ट होता हूँ कि...

जब भी मै कुछ गंभीर लिखता हूँ, मै स्पष्ट होता हूँ कि 'मुझे भविष्य में कैसा समाज चाहिए?'
भयाक्रांत, असुरक्षित, असंगठित, विभाजित, संकीर्ण अथवा समरस, संगठित, समन्वित, सतत, विकासोन्मुख ....!
ऐसा सोचते ही मेरी भाषा संयत हो जाती है. मै सहनशील एवं साहसी हो जाता हूँ. मै आलोचना का स्वागत करने लग जाता हूँ, क्योंकि यह वो आयाम होती है, जो मुझसे संभवतः छूट जाती है. यह सोच मुझे आज की विभिन्न और बिखरी हुई कई समस्यायों के त्वरित हल से बचाती है, मध्य मार्ग की ओर ले जाती है, उनके एक सूत्रता को पकड़ पाती है.
मुझे भारत के भविष्य में विश्वास है, इसलिए मै कोशिश करता हूँ कि मेरे अध्ययन एवं ऑब्जरवेशन का कम से कम दो या अधिक स्रोत अवश्य हो. अतीत से सीख लेता हूँ, विभेद और वैमनस्य छांटकर वहीँ छोड़ देता हूँ. मै चुनता हूँ, थोड़ी सी बुरी यादों के मुकाबले थोड़ी सी अच्छी यादों को..!
आँख-कान खुली रखता हूँ, क्योंकि भ्रमित कोई भी हो सकता है जिसने किसी एक विश्वास को ही अपना सर्वस्व बना लिया हो .
जानता हूँ, इसलिए चौकन्ना रहता हूँ कि जहाँ मै खड़ा हूँ, वहां के अपने बायसेस हो सकते हैं, दूसरों के भी हो सकते हैं...अपने बायसेस को चेक करता रहता हूँ, दूसरों की बायसेस से बचता रहता हूँ. मै जमीन पर आकर चीजें तौलता रहता हूँ और किताबों व अध्यापकों से उन्हें तराशता रहता हूँ क्योंकि मै परफेक्ट नहीं हूँ और मुझमें भी बायसेस हैं ही. तर्क और भाव दोनों का समुचित महत्त्व परख लिखने की कोशिश करता हूँ.
छिछले या लिजलिजे शब्द इस्तेमाल नहीं करता क्योंकि 'शब्द' बड़े गहरे उतरते हैं..शब्दांतर भी कुछ कह रहे होते हैं. भाषा की महत्ता को मै मान देता हूँ, ये बड़ी दूर तलक जाते हैं....ये कभी नष्ट नहीं होते, सो इनका अर्थपूर्ण प्रयोग ही करने का हिमायती हूँ.
मै कत्तई नहीं चाहता कि मेरी पीढी की समस्याएं अगली पीढ़ी को भी आक्रांत करें, इसलिए 'मुझे भविष्य में कैसा समाज चाहिए' यह सोचकर ही मै लिखता हूँ...जब भी लिखता हूँ कुछ गंभीर....!
......और आप.....?

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