स्वतंत्रता व सुव्यवस्था के नोट्स : श्रीश

मन में कई विचार गोते लगा रहे हैं. पर सबसे पहले श्याम जी द्वारा लिखे गए वे शब्द और वाक्य जिन्हें मैंने अपनी डायरी में लिख लिए हैं... ये लाइनें शून्यकाल में मेरा बहुत साथ देंगी. और ये पंक्तियाँ सूत्रवाक्य हैं..कई कुंजियों का समवेत छल्ला है..उन्हें देखें:


"जब चर्चा चल ही पड़ी है तो लगते हाथ बहुत पहले" सारिका" में पढ़ी धर्म की वह परिभाषा भी उद्दृत कर दूं जो पांच दशकों के बाद भी मुझे भूली नहीं .."अनासक्त विवेक से समष्टि कल्याण के हेतु किया जाने वाला कोई भी कर्म धर्म है."

"यह मन कैसे बनता है ? निश्चित रूप से क्रिया प्रतिक्रिया (stimulus and response cycle) चक्रों से मन निर्मित होता है."


"वृत्त की आवृति =वृति"

"उन्होनें आदतों के जमावड़े को कुण्डलिनी कहा है"


"जितनी लघु, संकुचित और सीमित जीवन-दृष्टि; उतनी ही तेज़ी से भागता है समय.. जीवन-दृष्टि जितनी व्यापक होती चली जाती है; समय की गति भी उसी अनुपात में धीमी होती चली जाती है .. जब दृष्टि अस्तित्व की व्यापकता को पा लेती है..तब समय ठहर जाता है.. विलीन हो जाता है ..आदमी के गणित के हजारों लाखों प्रकाश वर्ष मात्र आँख की झपक में बदल जाते हैं .. स्रष्टि और स्रष्टा में भेद समाप्त हो जाता है..वहाँ स्वतंत्रता है ... और यह घटना प्रयत्न साध्य बिलकुल भी नहीं है ... ð

विस्मय और जिज्ञासा, जीवन-दृष्टि को विकसित करने वाले तत्व ही नहीं हैं; अपितु, यांत्रिकता की यंत्रणा से, किसी सीमा तक बचाए रखने के उपक्रम भी हैं .."


अपनी समझ से इनपर चर्चा थोड़ी देर बाद करूँगा, क्योंकि थोड़ा विषयान्तर हो जायेगा. पहले अंकित जी की उठाई गयी चर्चा के मूल मंतव्य, और फिर इस चर्चा के मौजूदा स्वरुप पर सोचता हूँ.

अंकित जी का मूल प्रश्न है: "देश क्या आजाद है..?"

यह प्रश्न उपजता है जब विभिन्न सामजिक-राजनीतिक विडंबनाएं मुंह बाए आम इंसान को खड़े-खड़े निगलने लगती हैं..और जिनपर दारोमदार होता है रहनुमाई का वही जब मुनाफाखोर व्यापारी निकलते हैं. 

श्याम जी , मेरी समझ से अंकित जी देश की , राष्ट्र की और समाज की उस स्वतंत्रता की ओर ईशारा कर रहे हैं जहाँ सामाजिक-राजनीतिक अधिकार की गारंटी की आदर्श व्यवस्था होती है ताकि समाज का वह अंतिम आदमी जो केन्द्र में नही है, वह भी अपना सर्वांगीण विकास कर पाए. 

श्याम जी , अंकित जी राजनैतिक-सामजिक स्वतंत्रता (अपने पूर्ण अर्थों में) की बात कर रहे हैं, और आप आत्मिक स्वतंत्रता की बात कर रहे हैं. जो कई कदम और ऊपर की बात है. यदि आपकी कसौटी पर सोचें फिर तो हर कोई परम आनंदित, संतुलित-प्रफुल्लित होगा: जैसा हमारे ऋषि-मुनियों ने एक व्यवस्था बना रखी थी अथवा कहें सोच रखी थी/आजमा रखी थी. 

श्याम जी आप समस्या के जड़मूल निदान पर बात कर रहे हैं. अंकित जी ने जिन समस्याओं की ओर ईशारा किया है, वे समस्त समस्याएं तब पनपी हैं, जबसे आधुनिक राज्य की आधारशीला रखी गयी,जबसे औद्योगिक क्रांति हुई, जबसे औपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद आया,जबसे नेशन-स्टेट की संकल्पना आयी. इसपर विस्तार से लिखना पड़ेगा. लिखूंगा भी.

श्याम जी, कुछ ऐसी समस्याएं हैं जो वाह्य जगत से/तक उपजी/सीमित हैं. आप "स्वतंत्रता" की व्याख्या कर रहे हैं, जो बिलकुल ही सटीक है. अंकित जी राजनीतिक-सामाजिक स्वतंत्रता' की बात कर रहे हैं, जो सहज अपेक्षित है. 

मै मानता हूँ, कि स्वतंत्रता एक व्यापक शब्द है और इसमे समस्त स्वतंत्रताएं सन्निहित हैं. किन्तु श्याम जी बिना घाव धोवे आप उसका उपचार नहीं कर सकते. यह घाव धुलना समझ लीजिए राजनीति और सामाजिकता के रास्ते होगा. और अंतिम निर्णायक उपचार आत्मिक अवलोकन यानी दर्शन से होगा. 

इतना आसान नही यह. देखिये. गाँधी जी परम आध्यात्मिक थे, दार्शनिक भी थे, गीता साथ रखते थे, आत्मिक रूप से वे संतुष्ट थे. पर राजनीतिक आन्दोलनों का नेतृत्व क्यूँ किया उन्होंने...? क्योंकि जिस आत्मिक स्वतत्रता (इसे परम साक्षी भाव कहने दीजिए) को पाना अभीष्ट है वो एक खास मानसिक अवस्था(परिपक्वता) के बाद अभ्यास से आती है. यह अभ्यास और मानसिक विकास हो सके इसके एक सुव्यवस्था की आवश्यकता है. सुव्यवस्था ; आधुनिक सन्दर्भों में एक पूरी राजनीतिक-सामाजिक आंदोलन में भाग लेकर फिर आदर्श वितरण की ठोस पद्धति निर्मित कर पाना है. इस दुरूह प्रक्रिया को आधुनिक आविष्कारों और उपभोक्तावादी संस्कृति ने और भी जटिल बना दिया है. अब आप द्वीप के किनारे नहीं रहते, जहां बस कुछ सभाएं मिलजुलकर सभी सार्वजानिक समस्याओं का निदान कर लेती थी. अब अमेरिका के बैंक में नकदी घटती है तो मंदी पुरे विश्व में छा जाती है.



सुव्यवस्था. 

सुव्यवस्था का लक्ष्य है कि सभी सुचारू रूप से रहें और सभी अपने ईच्छित लक्ष्य की ओर निर्बाध बढ़ सकें. इस मार्ग में जितना भी हो सकें; अवरोध हटाएँ जाएँ, खासकर वे अवरोध जिनके मूल में भौतिक अभाव हों एवं वे समस्याएं जो परस्पर विभिन्नताओं से उपजी हों.

श्री श्याम जी, अब जबकि आपने यह लिख दिया है :"मुझे सत्ता और राजनीति शब्द से परहेज़ है "

और मै राजनीति का विद्यार्थी हूँ. मै समझता हूँ आपका रोष. पर इसके लिए चाक़ू जिम्मेदार नही है कि आपने हाथ काट लिए हैं.

एक सुव्यवस्थित वितरण प्रणाली हो जिसमें सभी को न्यूनतम आवश्यक चीजें सरलता से प्राप्त हो, इसके इतिहास साक्षी है अनगिन प्रणालियाँ विकसित की गईं. किन्तु मानव मन में 'लोभ' 'संग्रह' की सहज वृत्ति होती है(जिसकी ओर आपने इंगित भी किया था). तो अब यह इतना आसान नही किसी भी एक प्रणाली के लिए. सतत प्रयोग जारी है. जाने कितनी क्रांतियां हुईं..! संविधान बने, हुक्मरान बदले.

यह चलता रहेगा. अब इसी क्रम में मै आपके द्वारा संकेतित 'जनसंख्या-वृद्धि' 'अनुशासन-हीनता' की समस्या को जोड़ लेता हूँ. सहमत हूँ. वाकई ये दोनों यदि अभीष्ट ढंग से हो जाएँ तत्क्षण एक परिवर्तन दृष्टिगत होने लाग जायेगा.

श्याम जी आपको नही लगता, ऐसे और भी अन्य कारक गिनाये जा सकते हैं. जैसे - अशिक्षा ,भ्रष्टाचार, गरीबी, कुरीतियाँ, धार्मिक-उन्माद, आतंकवाद, आदि-आदि. और ये महत्वपूर्ण कारक हैं, एक आदर्श व्यवस्था की चाहत रखने वाला इनकी अनदेखी करने की नहीं सोचेगा.

जैसा कि अंकित जी ने अपनी एक टिप्पणी में कहा.:"चर्चा को उस परिणिति तक ले जाना चाहिए की केवल वो बौद्धिक चर्चा ना रह जाये उसका कुछ लाभ भी आम जन को हो |"

आइये चर्चा करें कि हम व्यक्तिगत अथवा सामाजिक स्तर पर ऐसे कौन से कदम सरलता से (सरलता से इसलिए ताकि इसका अभ्यास बन सके) उठाये जा सकते हैं..?

मेरा मानना है, शिक्षा इसमें बहुत ही बड़ी भूमिका अदा करती है. और औपचारिक शिक्षा से ज्यादा मै उस शिक्षा की बात कर रहा हूँ, जिसे अनौपचारिक कहिये या जिसका कोई सिलेबस नही होता और जो वातावरण से सीखी जाती है. इस अनौपचारिक शिक्षा के सबसे बड़े वाहक हैं परिवार के जन और वरिष्ठ जन का जिम्मेदाराना एवं स्नेहिल-सभ्य व्यवहार. यहाँ वरिष्ठ-जन का मतलब ८ साल वाले के लिए १० साल वाले का व्यवहार, ४० साल वाले के लिए ७० साल वाले का व्यवहार. यह व्यवहार वाणी तक ही सीमित नही है. आचरण की भी बात है. आपको नहीं लगता लोग कितना कैजुअली बात करते हैं. शब्दों का कितना शिथिल प्रयोग करते हैं. केवल अपनी धारणा सत्य साबित करने के लिए किसी भी महापुरुष तक को किसी भी अपशब्द से नवाज़ सकते हैं. यहीं/यूँ ही अनुशासनहीनता पनपती है. 

माता-पिता, वरिष्ठों का सुबह से लेकर शाम तक आचरण, और घर से बाहर भी उनका आचरण,( चूँकि समाज के बाकी अन्य लोग भी माता-पिता, सम्बन्धियों के बारे में कैसी राय रखते हैं, यह भी महत्वपूर्ण हो जाता है.

तो सबसे पहले व्यक्तिगत स्तर पर अध्ययन, अनुशीलन, सतत श्रम एवं अनुशासन की महत्ता का उदाहरण सतत देना होगा. मतलब आचरण की महत्ता.

फिर औपचारिक शिक्षा पर आते हैं...यहाँ तो गंभीर परिवर्तन की आवश्यकता है. यह एक अलग गंभीर मुद्दा है, मेरे पास इसपर कहने को काफी कुछ है. फिर कभी. संक्षेप में शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो काफी लचीली हो, अपने पर्यावरण-सामाजिक वातावरण से सुसंगत हो और छात्रों एवं शिक्षक का सम्बन्ध औपचारिक-अनौपचारिक का सुन्दर-गंभीर मिश्रण हो. मित्रवत तो हो ही, और दोनों ही स्वयं को विषय का शोधार्थी समझें . व्यापार की तरह Give n Take का गंदा रिश्ता ना हो.

फिर राजनीतिक शिक्षा-जागरूकता की आवश्यकता व प्रशिक्षण. लोगों को जानना होगा कि उनकें सहज अधिकार क्या हैं, उन्हें कैसे ईस्तेमाल करना है और इससे भी बड़ी बात उन अधिकारों को कैसे-किन पद्धतियों से प्राप्त करना है..मतलब साध्य से ज्यादा साधन की पवित्रता पर बल. 


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