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ब्लाइंड्स एंड द एलीफैंट !

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ब्लाइंड्स एंड द एलीफैंट ! आजकी पोस्ट यकीनन लम्बी होगी. जानता हूँ बेहद कम लोग पढ़ेंगे, पर मैं मजबूर हूँ. जितना मैं देख पा रहा हूँ अपनी सीमाओं में, कह सकता हूँ कि चीजें एक दुसरे से इतनी गुथी-मुथी हुई हैं कि उन्हें एक साथ ही देखना होगा, वरना हमारा हाल भी बचपन में पढ़ी कहानी की तरह हाथी और छः अंधों वाला ही होगा. बचपन में पढ़ी ढेरों कहानियाँ अपना मतलब और गूढ़ार्थ जीवन भर खोलते रहते हैं. सहज, इतना भी सहज नहीं होता पर होता है सहज ही. हम कभी समस्या को हाथी की पूँछ की तरह समझते हैं तो कभी पेट की तरह तो कभी सूंड की तरह. हम अलग-अलग भी गलत नहीं हैं पर यह समझ लेना चाहिए कि अलग-अलग हम उन अंधों की तरह ही हैं जो यह कभी समझ नहीं पाए कि समूचा हाथी कैसा होता है. वह कहानी बहुत सूक्ष्म है. वे अंधे इसलिए हैं क्यूंकि वे अपना अपना अलग अनुभव साझा कर संवाद तक पहुँचने का प्रयत्न नहीं कर रहे. उनमें जिद है अपने अनुभव को ही अंतिम मानने की. यह जिद इसलिए है क्यूंकि वे पृथक-पृथक केवल स्वयं को महत्त्व दे रहे. अतिरेकता में स्वयं को ही अधिक महत्त्व इसलिए क्यूंकि जाने-अनजाने वे अपनी असुरक्षा से ग्रस्त हैं कि वे पूर्ण नहीं है…