ब्लाइंड्स एंड द एलीफैंट !



ब्लाइंड्स एंड द एलीफैंट !
आजकी पोस्ट यकीनन लम्बी होगी.
जानता हूँ बेहद कम लोग पढ़ेंगे, पर मैं मजबूर हूँ. जितना मैं देख पा रहा हूँ अपनी सीमाओं में, कह सकता हूँ कि चीजें एक दुसरे से इतनी गुथी-मुथी हुई हैं कि उन्हें एक साथ ही देखना होगा, वरना हमारा हाल भी बचपन में पढ़ी कहानी की तरह हाथी और छः अंधों वाला ही होगा.
बचपन में पढ़ी ढेरों कहानियाँ अपना मतलब और गूढ़ार्थ जीवन भर खोलते रहते हैं. सहज, इतना भी सहज नहीं होता पर होता है सहज ही. हम कभी समस्या को हाथी की पूँछ की तरह समझते हैं तो कभी पेट की तरह तो कभी सूंड की तरह. हम अलग-अलग भी गलत नहीं हैं पर यह समझ लेना चाहिए कि अलग-अलग हम उन अंधों की तरह ही हैं जो यह कभी समझ नहीं पाए कि समूचा हाथी कैसा होता है. वह कहानी बहुत सूक्ष्म है. वे अंधे इसलिए हैं क्यूंकि वे अपना अपना अलग अनुभव साझा कर संवाद तक पहुँचने का प्रयत्न नहीं कर रहे. उनमें जिद है अपने अनुभव को ही अंतिम मानने की. यह जिद इसलिए है क्यूंकि वे पृथक-पृथक केवल स्वयं को महत्त्व दे रहे. अतिरेकता में स्वयं को ही अधिक महत्त्व इसलिए क्यूंकि जाने-अनजाने वे अपनी असुरक्षा से ग्रस्त हैं कि वे पूर्ण नहीं हैं. वे अपने जीवन अनुभव से धीरे धीरे जानेंगे कि पूर्ण कोई नहीं है और तन की पूर्णता ही सम्पूर्णता नहीं है. वे यह भी जानेंगें कि आँख वाले बहुतेरे ही कुछ देख नहीं पाते और वे बिन आँखों के ही कितना कुछ देख सकते हैं.
एक जोड़ी आँखें मिलकर भी उतना ही देखती हैं जितना मस्तिष्क का आदेश होता है. हमारी दो आँखों का सच एक पूरा सच तो है पर एक मुकम्मल सच की तस्वीर के लिए बाकी लोगों से मिलना होगा, बातचीत करनी होगी. इस बातचीत में यह संयम रखना होगा कि सभी अपना सच कह सकें और अपने सच के साथ अपने भीतर, बाकियों के सच के लिए आदर भी रखना होगा.
जब सच के सारे पिक्सेल मिलेंगें केवल तब ही मुकम्मल सच का सुनहला फोटोफ्रेम बनेगा.
हाथी को काबू करके यदि उसे अपने जीवन में किसी उपयोग में लाना है तो छः अलग-अलग सच उसे काबू में नहीं कर पाएंगे. इसके लिए सभी छहों का समूचा सच जरुरी होगा. कुछ लोग छः अलग-अलग सच को समूचा सच बनने नहीं देंगे क्यूंकि वे समूचा सच आपसे पहले जान गए हैं, शायद वे हाथी का इस्तेमाल पहले ही कर रहे हैं अथवा वे नहीं चाहते कि हाथी की कार्यकुशलता (शक्ति/धन/क्षमता) बांटी जाय; वे आपकी अपूर्णता (जो कि प्राकृतिक है और सबमें कुछ न कुछ है ) को सहलायेंगे और आपको अपने साथियों से कभी भी हिलमिल नहीं होने देंगे ताकि हाथी केवल उनका रहे.
हुआ यह है कि आधुनिक समय में पदार्थ ने विचार/दर्शन पर विजय पा ली है और उपनिवेशवाद के अनुभव ने हमारा आत्मबोध खोखला किया है जिसे भरने की कोशिश विवेकानंद से लेकर गाँधी तक ने की थी. अब यह तो हम मानने लगे हैं कि हम भी खास हैं पर इस खासियत का पैमाना अब भी हम पश्चिम से उधार ले रहे. हम ऐसा कर रहे क्यूंकि आधुनिक समय में समानांतर, हमने अपने पैमाने जो हमारी बुनियाद से उभरते उन्हें विकसित नहीं किया. इस पर धीरे धीरे काम होता है और इस राह में और दुसरी समस्याएं भी आती हैं. परिवर्तन कोई एक दिन का फूल नहीं. पश्चिम का पैमाना लेकर हम अलग थलग हो अपने देसी जमीन पर उपजने वाले एक-दुसरे का अनुभव नकारे जा रहे. यह नकार भाव हमें हमेशा अलग-अलग बनाये रखेगा और हमारी सभी थातियों और संसाधनों के समूचे हाथी पर कुछ लोग ही सवारी करते रहेंगे.
समझना होगा कि उन छः अंधों में से एक-दो ने किसी रीति से आँखें पा ली हैं. और वे नहीं चाहते कि आपको आँखें कभी नसीब हों, क्यूंकि हाथी कितनी ही बड़ी है हो उनको अपने लोभ स्वार्थ की वज़ह से वह हाथी अब छोटी लगती है और उसे वे कत्तई साझा नहीं करना चाहते. जब हम सभ्य नहीं हुए थे तो हाथी सबकी थी. फिर वे जिसमें अच्छे थे उसी को पैमाना बना दिया और सभ्यता के नारे के साथ विभाजन की चमकती खाई खोद दी. अब हमारा जीवन उस खाई को पाटने में नहीं उसे पार करने में चला जाता है. जो थोड़े से लोग उस पार चले जाते हैं वे खाई और गहरी खोदकर ऊँची पगार लेकर स्वयं को और ज्यादा सभ्य कहते हैं. यह अलगाव बना रहता है. ये बना रहता है क्यूंकि जन्म से हम सभी अंधें ही होते हैं और बाकी की दृष्टि जीवन-अनुभव से पानी होती है.
प्रेम के हजार रूप हैं, देशप्रेम के भी होने चाहिए. फिर तो ये अपना देश जहाँ कोस कोस पे पानी बदल जाता है और तीन कोस पे बानी. देश उतना ही नहीं है जितना हम जानते हैं, जितने में हम रहते हैं अथवा जितना भर हमने पर्यटन किया है, जितने भर की भाषा आती है हमें, जितना रंग-रूप मिलता है हमसे अथवा जहाँ तक की परम्पराएँ, संगीत, खाना, पहनावा और भगवान मिलते हैं. अपना देश यूरोप के देशों की तरह अभागा नहीं है जिसमें कि अधिकांशतया एक तरह के लोग और एक तरह की ही संस्कृति मिलती है. हमारा महान देश उन यूरोपीय देशों की तरह ऐतिहासिक रूप से दरिद्र भी नहीं है जिनके इतिहास के हालिया पन्ने थोड़े गाढ़े तो हैं पर पुस्तक में पन्ने ही कम हैं.
भूगोल से भाव खोजिये भी तो इसे अंतिम न समझिये.
कुछ थोड़े से लोग मिलेंगे अपवाद जो इस देश से प्यार नहीं करते. बेहद थोड़े से लोग हैं वे इसलिए उन्हें ढूंढना इतना भी आसान नहीं. किसी जगह पर बलात्कार की घटना हो गयी तो वह शहर बलात्कारी नहीं हो गया. उन थोड़े से लोगों का हमारा प्यारा महान देश मोहताज नहीं है जो इस देश से प्यार नहीं करते. देश पे मर मिटने वालों की तादात जब तक ज्यादा है हालात इतनी भी गयी गुजरी नहीं है. पर देश जिंदा लोगों से बनता है. जिंदा लोग उसे जिंदा रखते हैं. जिंदा लोग उसे आगे लेकर चलते हैं. आज के वैश्वीकरण वाले युग में एक-एक व्यक्ति यदि स्वस्थ है और कोई हुनर है उसमें तो उसे ‘मानवीय संसाधन’ कहा जाता है. तो एक भी मानवीय संसाधन हम खो नहीं सकते जो सचमुच अपने देश से प्यार करते हैं तो. एक बार उस हालात को समझिये जिसमें कोई इतना नीच बन जाता है कि अपने माँ बाप से बात करना बंद कर देता है, समझिये उस हालात को जिसमें देश का कोई बाशिंदा देश से ही नफरत करने लग जाता है. क्या पता हालात की उस वज़ह का पता चलते ही समाधान हो और अगली होली सभी भाई बहन साथ मनाएं. लाईलाज की नौबत हो तो नश्तर भी जरुरी पर जहर के बौछार की जरुरत नहीं है, डॉक्टर ने जवाब नहीं दिया है...,...कि देश अपना उस डेथबेड पर नहीं है जहाँ यूथनेसिया अंतिम विकल्प हो.
इतना ही जागरूक होना है कि कहीं कोई हमें बाँट तो नहीं रहा और कहीं हम खुद इतने जिद्दी तो नहीं हो रहे कि दुसरे का सच हम सुनने को तैयार नहीं. हमारी जिम्मेदारी है कि सभी के सच को समझकर समूची हाथी को देश सेवा में लगा दें. उस हाथी को कुछ लोगों के भाले से नियंत्रित न होने दें !
देश हमारा जब आजाद हुआ तो सदियों के सताए हुए लोगों का देश था. उपनिवेशवाद की तुलना किसी भी दुसरे शासक से नहीं हो सकती. विश्व भूगोल का विद्यार्थी जानता है कि मानव यात्राएँ अनगिन कारणों से होती रही हैं. दीवार खड़ी कर देने से जमीन नागरिक की नहीं हो जाती, सरकार की ही रहती है. इतिहास के पन्ने और पीछे भी पलटे जा सकते हैं, विज्ञान ने यह सहूलियत दी है. चार ब्लड ग्रुप ही वाला मानव सेपियंस प्रजाति का है और आज अपने सभी भाइयों (नियांडरथलेंसिस, एस्ट्रलोपीथेकस, एरेक्तस, सोलेंसिस, फ्लोरेसिंसिस, डेनिसोवा, रुडोल्फेंसिस, अर्गास्टर, आदि ) को बहुत ही पीछे छोड़ चुका है. पुरी दुनिया ही सेपियंस की है जो प्रभाव में है. कहीं से आये हों और कहीं बसे हों हम, यह तय है कि धर्म जैसी उन्नत सरंचना बेहद बाद की है. शक्ति, भाषा, अधिकार, श्रद्धा, परम्परा, संस्कार, सामाजिकता, संस्कृति, राजनीति, अर्थनीति आदि सभी विकास क्रमशः और बाद के हैं. यह समस्त विकास हमें उन्नत बनाने के लिए होने चहिये; हमारी विविधता को विभाजन कह हमें अनगिन स्तर पर बांटकर कमजोर करने के लिए नहीं. यहाँ सचेत रहना होगा. विकास में प्रगति और अवनति दोनों धाराएँ समानान्तर चलती हैं. इसलिए ही सामाजिक परम्पराओं, धार्मिक रिवाजों और इतिहास के सारे पन्ने बराबर देखने होते हैं कि कौन से तत्व हमें समवेत कर मजबूत बनाते हैं और कौन से हमें विभाजित करने को उद्द्यत हैं. किसी खास समय, भूगोल में कोई युक्ति यदि काम आयी है तो उसे परम्परा बनाने में बुराई नहीं है किन्तु उसका मूल्यांकन होते रहना चाहिए क्यूंकि परम्पराएँ हमारे लिए हैं, हमें एक-एक कर शक्तिवान बनाने के लिए हैं, बांटकर कमजोर करने के लिए नहीं. जिस परम्परा, रीति, विधान, कानून में समूचे का हित सन्निहित नहीं, निश्चित ही उसके परिमार्जन की आवश्यकता है और यह परिमार्जन सुखद नहीं होगा, आदतों की जड़ता नींद तोड़ना नहीं चाहेगी, बहुधा जगाने वाले को ही भला बुरा कहेगी. इस परिमार्जन का परिणाम सत्यम शिवम् सुन्दरम का निर्माण होगा पर यह परिमार्जन के प्रलय के बाद ही उपस्थित होगा.
संस्कृति, शिक्षा, मीडिया और राजनीति
इस प्रकाश में, मैं भारत की संस्कृति, शिक्षा, मीडिया और राजनीति पर बात करना चाहूँगा. भारत की संस्कृति पर बात हड़प्पा-मोहनजोदड़ो से शुरू करनी पड़ेगी. इतिहास के साथ मिथकों का भी बराबर का महत्त्व है इसलिए धर्मग्रंथों और उनकी मीमांसा भी महत्वपूर्ण है. इतिहास तथ्यपरक वैज्ञानिक रीति से किया गया वह अध्ययन है जिसमें अतीत की व्यापक व्याख्या का प्रयत्न होता है. वैज्ञानिक अध्ययन सतत होता है, किसी भी समय नए अन्वेषणों और नए तथ्यों को समावेश कर नयी व्याख्या की गुंजायश उसमें बनी रहती है. मिथक में केवल तथ्य महत्वपूर्ण नहीं हैं. इसका स्कोप और भी बड़ा है और इसके कैनवस पर हर पीढ़ी अपना एक संस्तर चढ़ा आगे बढ़ जाती है. न इतिहास अंतिम है और न ही मिथक ही. कोशिश हमारी जारी है.
पाकिस्तान की इतिहास की पाठ्य-पुस्तकों में उनके देश का इतिहास भी हड़प्पा-मोहनजोदड़ो से शुरू होता है. मोहनजोदड़ो और हड़प्पा हैं भी पाकिस्तान में ही. इतिहास कोई तथ्य नहीं नकारता. भूगोल का प्रभाव समाज पर पड़ता ही है. मुझे मेरा बचपन अब काफी दूर लगता है. जबकि विश्व इतिहास में तीस-पैंतीस साल कुछ भी नहीं. पृथ्वी या सृष्टि की उत्पत्ति वाले भूगोल के पन्ने पढ़ेंगे तो और भी लघुता का एहसास होगा अपने अस्तित्व के बारे में.
आप अपनी समझ से अपना इतिहास चुनते हैं. समझ बहुत छोटी होती है तो हम अपने खानदान की चार-पांच पुस्तों का नाम रटकर या उनकी तस्वीरे संजोकर खुश रहते हैं. समझ और बढ़ती है तो अपनी जाति, वर्ण के इतिहास को हम अपना मानने लग जाते हैं और फिर आगे जो बढ़ी यही समझ तो फिर हम समाज और देश का इतिहास खोजते हैं और उसे अपना मानते हैं. समझ और बढ़ा ली जाय तो ये धरा हमें अपनी लगने लगती है और फिर कहीं जाकर हम ‘वसुधैव कुटुम्बकम ’ का अर्थ निकाल पाते हैं. एन्थ्रोपोलोजी इस समझ को मजबूत वैज्ञानिक आधार दे देती है. इस समझ में आपने देखा कि ज्यों ज्यों हम आगे बढ़ रहे हैं विभाजन बौने होते जा रहे और एकता बढ़ती जा रही. क्यूँ नहीं सेपियंस सारे साथ रह सकते मिलजुलकर, जबकि पुरे विश्व में उन्हीं का राज है. क्यूंकि कुछ लोग पृथ्वी की हाथी को अपने लोभवश अकेले ही हांकना चाहते हैं. हमारी भारतीय संस्कृति में यह समझ है कि वह व्यक्ति-व्यक्ति तो छोड़िये कण-कण में शंकर निरखती है. जब मैं भारतीय संस्कृति कहता हूँ तो मेरा मतलब केवल सनातन अथवा हिन्दू संस्कृति नहीं है. हाँ, मेरे शब्द जरुर वहीँ से होंगे, क्यूंकि हूँ मैं सनातन धर्मी ही और पैदा हुआ एक हिन्दू परिवार में ही. और मुझे यह कहने की जरुरत तो नहीं है कि आपकी तरह मेरे पास भी पैदा होने के पहले कोई नहीं आया था यह पूछने के लिए कि- कहाँ पैदा होना चाहते हो, किस जाति में, किस वर्ण में, किस लिंग में, किस रंग में, किस समाज में, किस भाषा में, किस प्रदेश में, किस देश में..???
आज का भारत जिसे हम दैट इज इंडिया कहते हैं यह १९४७ में आया, १९५० में संप्रभु हुआ, जिसकी जड़ें हड़प्पा के भी पीछे की हैं और इसमें जो संविधान आया उसके बनाने वालों में हिन्दू महासभा, मुस्लिम लींग, कांग्रेस, लेफ्ट, एंग्लो-इंडियन, राजपूत, दलित, मराठी, पंजाबी, मदरासी, बंगाली, उड़िया, तमिल, मलयाली, कश्मीरी, सभी धर्मों के पंडित और आज के सभी पहचान/अस्मिता वाले लोग थे, इसमें से किसी ने बनने वाले संविधान को यह कहकर नहीं नकार दिया अथवा संविधान सभा से इस्तीफा दे दिया कि यह हमें स्वीकार नहीं है अथवा यह कि यह मेरे देश का संविधान नहीं हो सकता अथवा यह ही कि इस संविधान से जिस नए राष्ट्र का निर्माण होगा उसकी तस्वीर और तासीर उन्हें मंजूर नहीं. भारतीय संविधान ने भारतीय संस्कृति का सत्व सुरक्षित रखा है, ज्यादा परेशान होने की जरुरत नहीं है और हम अपने अपने धर्म, संस्कृति का सत्व सुरक्षित रख सकें इसकी व्यवस्था कर दी है. अब हमें और आपको धर्म, संस्कृति आदि मसले पर आपस में ही प्रतिस्पर्धा सीखाने वाला ध्यान से देखिये कौन है; कहीं यह वही भाले वाला आदमी तो नहीं जिसने हमारी हाथी को हमें छोड़ हांक लिया है.
भारतीय संस्कृति में सनातन संस्कृति, इस्लामिक संस्कृति, कैथोलिक संस्कृति आदि-आदि सभी संस्कृतियाँ मिलीजुली हैं, गुथीमुथी हैं. अब आप इसे पृथक नहीं कर सकते, हाँ; पृथक पृथक देख सकते हैं. इस स्वयं के देखने को ही आप सम्पूर्ण सच मान बाकियों से झगड़ सकते हैं, वृथा अभिमान में रह सकते हैं, घृणा को घृत दे सकते हैं. देश के मानचित्र में से किसी एक व्यक्ति को सहसा चुन लीजिये और समाजशास्त्रियों से पूछ लीजिये कि उसके केवल किसी एक दिन के व्यवहार में क्या केवल एक भाषा है, एक धर्म है, एक रीति है, एक रिवाज है, एक आदत है, एक रंग है...उत्तर आपको मिल जायेगा कि भारत की संस्कृति भारतीय संस्कृति है और इसमें सभी दुसरी संस्कृतियों ने फलना-फूलना अब सीख लिया है. जब हम मिलजुलकर रहते हैं तो पश्चिम ठिठककर हमें देखता है. क्योंकि उसके अनुभव के हिसाब से तो हमें आपस में लड़भिड़कर समाप्त हो जाना चाहिए था क्यूंकि उनकी संस्कृति, विविधता को अपनी एकरूपता के लिए संकट मानती है.


शिक्षा और राजनीति: मैकाले और कर्जन का अट्टहास  
बाकी शासकों के मुकाबले औपनिवेशिक शासक इसलिए इतने घातक सिद्ध हुए क्यूंकि उन्होंने हमारी शिक्षा पर वार किया. शिक्षा से ही हमने सामाजिकता और सामंजस्यता का पाठ अपने सभी भाइयों तक पहुँचाया था. वे चौंके कि १८५७ में मुसलमानों का साथ हिन्दू कैसे दे रहे हैं ? उन्होंने जब भारत के शासक की तरफ देखा तो उन्हें एक मुसलमान दिखा. वही मुसलमान जिससे वे अपने घर यूरोप में भी डरते थे और नयी तकनीक के प्रकाश में वे क्रूसेडर पे क्रूसेडर कर यूरोप में मुसलमानों का कमोबेश सफाया कर चुके थे. उनके यूरोप में अब अमूमन हर शासक ईसाई था. भारत के शासक में उन्हें मुसलमान ही दिखाई दिया, उन्हें हिन्दुओं और अन्य धर्मों का सल्तनत में भागीदार होना नहीं दिखाई दिया. कैसे देखते वे क्यूंकि यूरोप पूरा ही बदल गया था ईसाईयत में. हमारे देश में लेकिन कभी भी कुछ पूरा नहीं बदला था. उत्तर-मध्य एशिया के शक लोग आये, शासन किया पर पूरा नहीं बदला हमारा देश. हिमालय के उस पार चीन से हूण आये, शासन किया पर पूरा नहीं बदला हमारा देश.  कुषाण आये ग्रीस बैक्ट्रिया से शासन किया पर पूरा नहीं बदला हमारा देश.  अरब से आये, फारस से आये, अफगानी आये, तुर्क आये, मुग़ल आये शासन किया पर पूरा नहीं बदला हमारा देश. आत्मसात कर लिया और दुनिया को सह-अस्तित्व की सबसे बड़ी नजीर दी. तो अंग्रेज नहीं समझ पा रहे थे कि आखिर एक बूढ़े शासक को बहुसंख्यक आबादी ने बागी होकर क्यूँ अपना शासक घोषित कर दिया था १८५७ में. उस बूढ़े शासक की मजार पर म्यांमार में अभी चादर चढ़ाई है हमारे प्रधानमंत्री जी ने. उसका खानदान जमींदोज कर दिया गया. जब समझ आयी तो कर्जन ने बंगाल को चुना दरार बनाने के लिए. प्रशासनिक मजबूरी बताई और बंगाल का विभाजन १९०५ में करके हिन्दू और मुस्लिम की एकता को पहला बड़ा झटका दिया. गुरुदेव ने ‘ आमार शोनार बांग्ला ’ का नारा देकर बंगाली अस्मिता को सबसे ऊपर रखने की दरख्वास्त की. हर धर्म के बंगाली, बच्चे, औरत, जवान, बूढ़े सड़क पर लेट गए, रातें बीतायीं, उपवास रखा और अंततः भारी दबाव के बीच १९११ तक यह विभाजन वापस लेना पड़ा. १८५७ में हम जीते, फिर हारे और हारकर हम जीत गए क्यूंकि वे हमारे वृहत्तर सामाजिक ताने-बाने का कुछ नहीं बिगाड़ पाए. १९०५ में भी हम अडिग रहे. उन्नीसवीं शती तक दुनिया की हर शक्ति हमारी साझी संस्कृति से हारती रही. इसी में घुलती मिलती रही पर अफ़सोस उसके बाद हम यह विभाजन नहीं रोक पाए. बीसवीं शती का हमारा इतिहास विभाजन का इतिहास है. यकीनन विश्व के लिए भी यह खासा चुनौतियों वाला रहा और हम इससे अछूते नहीं रहे लेकिन जहाँ विश्व के बाकी हिस्सों ने शिक्षा का सम्यक प्रयोग कर अपने सांस्कृतिक-सामाजिक ताने बाने को आधुनिकता के साथ परम्परा का सुन्दर टीका दिया हम यहीं पिछड़ गए. शिक्षा ही वह तार है जिससे साझी संस्कृति और सामाजिकता का विद्युत प्रवाहित होता किन्तु वह तार तोड़-मरोड़ दिया गया. अंगरेजी शिक्षा ने हमारी नयी पीढ़ी की जड़ों में आत्महीनता की ग्रंथि डाल दी. भारत में रहकर भी भारत को उस तरह से खोजने की कोशिश हुई जैसे कभी कोलंबस ने अमरीका को और वास्कोडिगामा ने भारत को पाया था. इतिहास के हमारे पन्ने जिसे भारत के सभी धर्मों ने अपने अपने घरों में संजोया था, निरक्षर, अज्ञानी, अशिक्षित होकर हमने उनका मोल गँवा दिया. अब हम एक रेडीमेड इतिहास, एक रेडीमेड समाज और एक रेडीमेड शिक्षा के मोहताज हो गए. इधर तथाकथित संवैधानिक सुधार और जनगणना के नाम पर भारतीय समाज को कभी जाति, कभी समाज, कभी धरम और कभी भाषा के नाम पर विभाजित कर दिया गया. मैंकडोनाल्ड अवार्ड, सेपरेट एलेक्टोरेट और जनगणना में दी गयी अलग अलग जातियों का वर्गीकरण एक गाढ़ा जहर साबित हुआ देश के लिए. बंगाल विभाजन तो विफल किया हमारी साझी विरासत ने पर मन में विभाजन रोप दिया था अंग्रेजों ने. आगा खान तृतीय जिन्हें क्वीन विक्टोरिया ने १८९७ में ही इंडियन एम्पायर के नाईट कमांडर की ईज्जत नवाजी थी और जार्ज पंचम ने १९१२ में नाईट ग्रैंड कमांडर ऑफ़ द आर्डर ऑफ़ द स्टार ऑफ़ इंडिया बनाया था उन्होंने मुस्लिम हितों के नाम पर १९०६ में मुस्लिम लींग की स्थापना की. ये खास लोग थे, अवाम की इन्हें कितनी चिंता रही होगी, पता नहीं पर मुस्लिम लींग पहला बड़ा संगठन था जो धरम के नाम पर गढ़ा गया था. अंग्रेज अपनी विभाजन की जो चाल चल चुके थे वो मौलाना अबुल कलाम आजाद, अब्दुल गफ्फार खान आदि तमाम मुसलसल ईमान वाले मुसलमानों की साझी संस्कृति के लिए की गयी कोशिशों पर पानी फेरने वाली थी. अभिजात्य किसी का नहीं होता. वह महज अपना होता है. कोई धर्म हो, कोई सत्ता में हो, कोई देश हो, अपना मुनाफा आते रहना चाहिए. देखते देखते ही हिन्दू महासभा की भी स्थापना १९१५ में हो गयी, जिसकी जड़ें १९०९ के पंजाब हिन्दू महासभा तक जाती हैं. कर्जन अब अट्टहास कर रहा था.
आजादी के बाद मौलाना अबुल कलाम आजाद देश के शिक्षा मंत्री रहे. आज की शिक्षा व्यवस्था की नींव उनकी कर्जदार है. किन्तु हम शिक्षा में समयोचित सुधार नहीं कर सके. किसी भी औपनिवेशिक इतिहास वाले देश की आजाद शिक्षा व्यवस्था के दो मूलभूत उद्देश्य होते है : १. देश को औपनिवेशिक सोच से मुक्ति दिलाना, उसके प्रभावों को न्यून से न्यूनतम करना; और २. शिक्षा को समावेशी बनाते हुए नए विश्व के अनुरूप ढालना ! दोनों ही उद्देश्यों में हमें अभी मीलों मीलों चलना है.
अपना अपना बाजारू लाउडस्पीकर और राजनीति
मीडिया का इतिहास यह ताकीद करता है कि इसे जब तब सत्ता से अपना रिश्ता याद आता रहता है तो थोड़ी समझदारी दिखानी होगी. राजा अपनी नीतियों की जानकारी देता था, इससे मिलती जुलती प्रथा अपने देश में भी थी जब भेरी बजाकर राजा का फरमान सुनाया जाता था. इस परम्परा में धीरे धीरे लोग सवाल करने लगे जब कोई बात परम्परा से इतर जाने लगती. और सवाल करना इसमें मुख्यबिंदु बनता गया. आधुनिक मीडिया को यह सुस्पष्ट है कि सरकार में शामिल लोगों से प्रश्न करना और जस का तस रख देना यह उनका मुख्य कार्य है. कभी सरकार में शामिल रहे लोग भी प्रश्नों से बाहर नहीं. जवाबदेही और उत्तरदायित्व का सिद्धांत सभी सार्वजनिक पदों और संस्थानों पर लागू होता है. आधुनिक विश्व में जैसे-जैसे राजनीतिक संस्थाएं लोकतान्त्रिक रीति से स्थापित होती गयीं, मीडिया भी जनता के प्रति अधिक जवाबदेह और उत्तरदायी होता गया और सार्वजानिक व्यक्ति व सार्वजानिक संस्थायें उसके राडार पर आती गयीं. जस का तस दिखाना पत्रकारिता का एक उच्च मूल्य बना ताकि उस घटना विशेष को सभी पर्सपेक्टिव में देखा जा सके. संचार क्रांति और इंटरनेट ने इसमें धार दे दी, अब इन्हें कोई एक राज्य, कोई एक सरकार, कोई एक देश नियंत्रित नहीं कर सकता था. मीडिया अपने शक्ति के स्वर्णकाल में है किन्तु यह अपनी दयनीयता के भी रसातल में है l यह स्थिति भारत में भी है. मीडिया ने आजादी के संघर्ष के दबाव सहे हैं, आपातकाल के दबाव सहे हैं और अब वैश्वीकरण के युग में बाजार के दबाव भी सह रही है. पिछले सारे दबाव सहे जा सके क्यूंकि जनता चट्टान की तरह खड़ी रही है पर अब सुशिक्षा के अभाव में और पश्चिमी संस्कृति के पदार्थवादी रुझान से ग्रस्त एवं समाजबोध से हीन जनता मीडिया के लिए खड़ी नहीं है. अब इसके लिए न्यूज डिनर टाइम का एंटरटेनमेंट है, एक क्षणिक इक्साईटमेंट. और अख़बार बस एक पुरानी आदत. इन्हें तो अपने गाँव-मोहल्ले का मर्डर भी कल के अख़बार से या शाम की टीवी न्यूज से पता चलती है. यह जनता अपनी राजनीति के लिए भी खड़ी नहीं है. इसे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन चुना जाता है. शिक्षा में जो सम्यक सुधार समय से नहीं किये गए, उसके परिणामस्वरुप आत्महीनता आयी, समाज और देश से हमारा जो कनेक्ट था वह केवल विचार के स्तर पर रह गया है, महसूस नहीं होता, राजनीति आमजन को शक्ति देती है, यह विश्वास ज़माने में राजनीतिक दल, नेता चूक गए, जो शिक्षा बदलाव का वाहक बन सकती थी वह अब खुद ही बाजार द्वारा नियंत्रित हो रही है.
राजनीति और बाजार आधुनिक युग के दो बड़े शक्ति के स्रोत हैं. एक अच्छी शिक्षा ही इनपर लगाम लगाकर एक बेहतरीन राष्ट्र की बुनियाद बना सकती है. सम्यक शिक्षा के अभाव में अपने आसपास देखिये अब बाजार केवल हमारी जरूरतें पूरी ही नहीं कर रहा अपितु बहुधा वह हमें उन नयी जरूरतों के बारे में सुझा रहा होता है जो उसकी फैक्ट्री से निकलने ही वाले होते हैं. एक सही शिक्षित व्यक्ति बाजार के कान उमेठ सकता है अन्यथा बाजार उसके ही कान में छेदकर जब-तब नईं बालियाँ पहनाता रहता है. राजनीति हमारी अब, बस चुनाव-केन्द्रित बनकर रह गयी है. नेता बेचारे क्या करें, जनता अपनी ही राजनीति के लिए खड़ी नहीं है. उन्हें चुनाव जीतना तो है ही, हम वोट ही नहीं करने जाते. जो थोड़े से लोग वोट करने जाते हैं वे धन, पोस्टर, शक्ति प्रदर्शन, शराब अथवा जाति, धर्म आदि से बरगलाये जा सकते हैं क्यूंकि या तो वह शिक्षित नहीं हैं या तो वह सुशिक्षित नहीं हैं. इन थोड़े से लोगों को बरगलाने के लिए पैसा चाहिए. पैसा बाजार से आता है. बाजार में पैसा अभिजात्य से आता है, वे चाहेंगे कि सरकार वें ही नीतियां बनाएं जिससे उनका मुनाफा बढ़े. अब जो नयी सरकार बनेगी उस पर बाजार का दबाव होगा, जनता का नहीं. क्यूंकि जनता तो कबका दबाव बनाना भूल चुकी है. यों चुनाव आसान भी हो जाते हैं, ना घोषणापत्र बनाने की झंझट, ना उचित मुद्दों की लिस्ट बनाने की झंझट. थोड़े से लोग जो वोट करने आयेंगे, पता है कि वे कौन हैं और क्यूँ आये हैं. बाकी जनता के लिए छुट्टी का दिन है मतदान का दिन. टीवी खोलकर और अख़बार पर नाश्ता, खाना खाकर जागरूक नागरिक की भूमिका जी ली, बस.
एक ऐसी जनता जिसे अपने पड़ोस के बारे में भी इन्टरनेट, टीवी या अख़बार से पता चलता हो, उसे तो बरगलाना बेहद आसान है. ध्यान रहे ये जनता वही है जिसका औपनिवेशिक अतीत रहा है, जिसकी शिक्षा आधी-अधूरी है, जो कई स्तर पर पहले ही विभाजित है, जो पश्चिम की भौंडी नक़ल में व्यस्त है, जिसे जल्दी से अनगिन सामान जुटा लेनी की हड़बड़ी है, जो दुनिया को महज एक सुन्दर, बड़ा, चमचमाता शोपिंग मॉल मान बैठी है, जनता, जिसके पास ईएमआई आदि के बाद खुद के लिए वक्त नहीं है, जिसका खुद भी खुदका नहीं है उसे मीडिया और एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री ने गढ़ा है अथवा वो जनता जिसे आजादी के सत्तर सालों बाद भी दोपहर की रोटी के बाद रात की रोटी का पता नहीं है इससे कोई नारा लगवाना, कोई जुमला रटवाना, कोई इतिहास पढ़ाना, कोई सच दिखलाना कत्तई बेहद सरल है. बाजार ने खरीद लिए अपने-अपने लाउडस्पीकर और बज रहे हैं वे २४ घंटे जैसे उनके हुक्मरान चाहते हैं और जैसा चाहता बाजार का अभिजात्य. दरअसल मीडिया बहुत मजबूर है. बिना जनता की शक्ति के इसे दिन रात चलाना इतना आसान नहीं. कहीं कोई अपवादस्वरुप यदि कोई प्रतिष्ठान मीडिया को उसकी उचित भूमिका के साथ चलाना भी चाहे तो प्रश्न पूछना, जस का तस रख देना के बाद उसे थोड़ी सी वह कमी भी पुरी करनी पड़ती है जो अनुकूल परिस्थितियों में शिक्षा का कार्य होता. यह मीडिया के ऊपर अतिरिक्त दबाव है. बिना जागरूक जनता के साथ के मीडिया इतना बोझ नहीं उठा सकती. और जो उसका बोझ उठा सकता है/ उठा रहा है, वह उसे जहाँ चाहेगा वहां ले जायेगा. 
राजनीति बेहद ही कठिन विषयवस्तु है. क्योंकि इसे सबका अधिकतम हित साधना होता है. पर बाजार जिसे बस बेचना आता है इसने सभी कुछ बेहद आसान बना दिया है. अब बाजार के आका ईशारा करते हैं, नेता मुद्दे चुनते हैं, चुने हुए मुद्दों पर मीडिया लाउडस्पीकर बजाता है और चुने हुए लोग नेता चुनकर भेज देते हैं, बाकी जनता कभी शपथग्रहण पर तो कभी टीवी के भाषण पर तो कभी अखबार के किसी साक्षात्कार पर ताली बजाकर और स्वयं को जागरूक समझकर संतुष्ट हो लेती है.

आज अभी
मैं एक बेहद ही मामूली आदमी हूँ. भीतर से जानता हूँ, स्वीकारता हूँ कि मेरे आसपास एक से बढ़कर एक नायाब लोग दिन रात मेहनत कर इस दुनिया में रंग भर रहे हैं. उम्र के तीन दशक पुरे किये हैं लगभग मैंने और उसमें एक बड़ा हिस्सा बचपना रहा. पर मेरे इस छोटे से जीवन में मुझे कोई ऐसा आदमी नहीं मिला, कम से कम मैं नहीं महसूस कर सका कि वह अपने देश से प्यार नहीं करता. आदमी तरह तरह के मिले, तरह तरह का उनका प्यार है, अपना अंदाज है देश से प्यार करने का, देश की समझ अलग अलग है पर कोई भीतर-भीतर यह मानकर नहीं जी रहा कि वह अपने प्यारे देश के खिलाफ है. मुझे मिले लोग ऐसे जिन्हें इस देश के किसी एक कालखंड के इतिहास से अधिक प्यार है अथवा इतिहास के अपने प्रिय अध्याय को उन्होंने और गरिमापूर्ण ढंग से समझा है पर वे सभी इस देश से प्यार जरुर करते हैं.
देश कोई पहाड़, झरना, रेगिस्तान, नदी, समुद्र, सड़क, पुल, जंगल, ट्रेन, कारखाना, अस्पताल, विश्वविद्यालय आदि से ही नहीं बन जाता, देश बनता है लोगों से. आप और हम ही मिलकर देश बनाते हैं. देश किसी काबिल अकेले से भी नहीं बनेगा, मुझे आप चाहिए होंगे और आपको मैं. इसे ही देश कहते हैं. भारतीय संस्कृति में इसे ही देश माना गया है. अगर आप इस देश को प्यार नहीं करते तो देशभक्त, देशप्रेमी तो छोड़िये ना तो आप भारतीय संस्कृति से कोई इत्तेफाक रखते हैं और ना ही भारतीय संविधान से. आप कहीं मध्य में लटके हैं जबतक आपके लटकने से कोई हाथी पर भाला गड़ाए हुए है आप लटकते रहेंगे.
ध्यान से देखिये अपने आसपास. कोई व्यक्तिगत रूप से हमारे खिलाफ नहीं खड़ा है. हम खड़े हो जाते हैं उनके खिलाफ या वे खड़े हो जाते हैं हमारे खिलाफ जब कोई नारा, कोई जुमला, कोई प्रतीक हमारी मनुष्यता से (हमारे सेपियंस होने से ) बड़ा बना दिया जाता है. ध्यान दीजिये वो कौन है और कौन सी हैं वे प्रवृत्तियां जिसकी और जिनकी वज़ह से यह जानते हुए भी कि सामने वाला मेरे विरुद्ध नहीं है फिर भी ऐसा प्रतीत करा दिया जाता है कि जैसे हम दोनों ध्रुवीय दूरी पर हों.
उचित शिक्षा नहीं है, उचित राजनीति नहीं है, मीडिया उचित रीति से काम नहीं कर रही, ऐसे शिकायत करने से नहीं होगा. परिवर्तन होगा नहीं, स्वयं बनना होगा.
जरुरी है:
शिक्षा में सुधार सबसे पहले जरुरी है.
शिक्षा को बाजार से हारने मत दीजिये. सबके लिए अनिवार्य शिक्षा जरुरी है. यह सबका आधार है. देखिये अगर भारत दुनिया की बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था में है तो पूछिये कि आखिर तीन सालों में और पीछे के सालों में भी शिक्षा पर कुल बजट का हिस्सा क्यों गिरता जा रहा है ? इसमें कोई राजनीति नहीं है, यह हमारे भविष्य से सीधा जुड़ा है. शिक्षा के लिए १०० में केवल तीन-चार रूपये ही क्यूँ हैं सरकार के पास. आप प्राइवेट स्कूल और कोचिंग और कॉलेज की बढ़ती फीस से परेशान हैं तो जरा पत्रकार बंधुओं से कहिये कि इसे राष्टव्यापी मुद्दा बनायें और जब वे बनायें तो आप उन्हें पढ़ें और देखें ताकि उन्हें टीआरपी के लिए बाजार के सामने हाथ बांध खड़े न होना पड़े. सबसे कठिन पेशा है ये, इनकी ईज्जत करें.
नागरिक समाज के सबसे बड़े नाम प्रोफ़ेसर, वकील, चिकित्सक हैं. इनसे भी सवाल पूछिये कि आपके देखते-देखते ही बाजार इतना शक्तिशाली कैसे हो गया, आपने तो समाज के आख़िरी व्यक्ति के लिए जीने का संकल्प लिया था. ये वो लोग हैं जिनका काम था गलत को गलत कहना और हिम्मत के साथ सही को सही कहना. समय तो निर्मम है, तटस्थों का भी इतिहास लिखेगा.
आप सवाल-जवाब करने लगेंगे तब ही शिक्षा में दुहरा सुधार होगा. शिक्षा सभी को मिल सकेगी. अब अगली प्राथमिकता है शिक्षा की गुणवत्ता. पहले दो उद्देश्य समझ लिए जाएँ. अपने देश की शिक्षा को औपनिवेशिक प्रभावों से मुक्त कराना. और दूसरा हमारी शिक्षा को मानवीय बनाते हुए वैश्विक जरूरतों के अनुरूप ढालना.
ये सब होगा जब हम सही आदमी को वोट करेंगे. केवल हमने ही नहीं अपना विश्वास खोया है राजनीतिक दलों और नेताओं से, उन्होंने भी जनता पर भरोसा करना छोड़ दिया है. अच्छा काम और अच्छा चरित्र भी जब बार बार चुनाव में मुंहकी खाता है तो वे भी निराश हो वोट बैंक और बाजार की राजनीति करने को मजबूर हो जाते हैं. हारें या जीतें; वोट केवल उसको जो सही आदमी है. धीरे-धीरे राजनीतिक दल बाजार के चंगुल से मुक्त हो जायेंगे. वे सही उम्मीदवार उतारकर जब जीतेंगे तो काम उसी जनता के लिए करेंगे जिन्होंने उन्हें चुनकर भेजा है. अभी वो उन अभिजनों के लिए और बाजार के लिए काम करने के लिए मजबूर हैं जिनकी ताकत पर वे चुने गए हैं. आइये उन्हें हम अपनी ताकत पर संसद भेजें.
मीडिया परिवर्तन को सबसे पहले भांप लेता है, भांप लेगा. जनता एक बार शिक्षित हुई, जागरूक हुई तो पत्रकार बंधुओं को पता लग जायेगा कि अब वे भी स्वतंत्र हैं बाजार के दबाव से. घुटकर जो पत्रकारिता वे करते आ रहे हैं उन्हें ऑक्सीजन मिल जायेगी. फिर वे मुद्दों के लिए बाजार या नेता का मुंह नहीं ताकेंगे बल्कि गाँव, गली, मोहल्ले से मुद्दे लायेंगे.
आइये नए भारत का मिलजुल कर निर्माण करें !
 (डॉ. श्रीश )



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