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वो भूंकते कुत्ते...

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कड़क सी सर्दी, रजाई में उनींदे से लोग सपनों की खुमारी में आँखें लबालब जब जो जैसा चाहते बुनते रचते, समानांतर सपनों की दुनिया, पर बार-बार टूट जाते वे सपने। खुल जाती डोरी नींद की कच्ची, बरबस मुनमुनाते गाली उन आवारा कुत्तों पर, जो भौंक पड़ते गाहे-बगाहे। (Google Image) क्यों नहीं सो जाते कहीं ये कुत्ते भी मजे लेते मांस के सपनों की, या फिर खेलते खेल ,खो सुधबुध    गरमाहट छानते पीढ़ी-दर-पीढ़ी। कुछ लोग होते ही हैं, तनी भवें वाले होती है उन्हें चौंकने की आदत गुर्राते हैं सवाल लेकर, मिले ना मिले जवाब दौड़ते हैं, भूंकते हैं, पीछा करते हैं, लिखते हैं...! जिन्दगी की रेशमी चिकनाइयों से परहेज नहीं पर बिछना नहीं आता, कमबख्तों को। चैन नहीं आता उन्हें, पेट भरे हों या हो गुड़गुड़ी। शायद शगल हो पॉलिटिक्स का, सूंघते हैं पॉलिटिक्स हर जगह, करते हैं पॉलिटिक्स वे  शक करते रहते हैं, हक की बात करते रहते हैं। लूजर्स, एक दिन कुत्ते की मौत मर जाते हैं.... ये, ऐसे क्यों होते हैं....? चीयर्स....! देश आगे बढ़ तो रहा है। ये नहीं बदलना चाहते, भुक्खड़। मेमसाहब का कुत्ता कितना...

साहित्य विभाजनकारी नहीं हो सकता, जब भी होगा जोड़ेगा.

साहित्य विभाजनकारी नहीं हो सकता , जब भी होगा जोड़ेगा.साहित्य शब्द कानों में पड़ते ही सहित वाला अर्थ दिमाग में आने लग जाता है. साहित्य में सहित का भाव है. कितना सटीक शब्द है. साहित्य शब्द में ही इसका उद्देश्य रोपित है. साहित्य विभाजनकारी नहीं हो सकता , जब भी होगा जोड़ेगा. इतना हर लिखने वाले को स्पष्ट होना चाहिए. इसीलिये जरुरी नहीं हर लेखन साहित्य में शामिल हो. मेरी दिक्कत ये है कि कुछ लोग साहित्य मतलब महज कविता कहानी समझते हैं. और इसे भी वो ' सब कुछ समझ सकने के गुरुर के साथ ' समझते हैं-मतलब ये कि उन्हें सही समझाना कठिन भी है. कविता मतलब भी वो कुछ यूँ समझते हैं कि एक लिखने की शैली जिसमें ख़ास रिदम और एक पैटर्न की पुनरावृत्ति होती है जिसकी विषयवस्तु अमूमन प्रकृति अथवा नारी की खूबसूरती होती है. कहानी मतलब भी कि एक नायक होगा..एक नायिका होगी. ज़माने से लड़ेंगे-भिड़ेंगे-फिर जीत ही जायेंगे.एक सीधी सी बात समझनी चाहिए कि किसी भी विषय-विशेष में उतनी ही गहराई और आयाम होते हैं जितनी कि ज़िंदगी की जटिलताएं गहरी होती हैं. इस तरह कोई भी विषय विशेष का महत्त्व किसी भी के सापेक्ष कमतर या अधिकतर नहीं ...

बुद्ध पूर्णिमा

'अपने लिए स्वयं दीप बन जाना'  और  परस्पर विरोधी राहों में से 'मध्यम मार्ग' का चयन ;  महात्मा बुद्ध की इस दो सीख ने अब तक मेरा बहुत ही मार्गदर्शन किया है l जातियों से इतर मानवता में विश्वास रखने वाले और करुणा भाव से ओत-प्रोत इस महाभाव को उनके बुद्धत्व दिवस एवं निर्वाण दिवस पर स्मरण करना प्रासंगिक है और सर्वदा रहेगा l #ShreeshUvach

Grateful to Birthday Wishes :)

आह्लादित मन बहुधा कुछ विशेष प्रतिक्रिया नहीं कर पाता l इस वर्ष, वर्षगाँठ पे आप सभी का असीमित प्यार-दुलार मिला l नसीहतें भी मिलीं, कुछ ने झिझोड़ा भी-हो कहाँ तुम? याद सभी आते हैं और जानता हूँ याद सभी करते हैं l जीवन में बस इतना ही समेटा भी जा सकता है...हासिल इतना ही है ज़िंदगी का...सो खुश हूँ..और हमेशा की तरह तैयार भी l जन्मदिन हर वर्ष अपने समय पर दुन्दुभि बजाते आते हैं कि तैयार हो जाओ कुछ और नए उमंगों के लिए l मन पे गुजरा हर साल यों तो चिपका ही होता है, फिर भी नए मौके अतीत को एक तरफ रख भविष्य की हिलोर को थामने के लिए वर्तमान को तैयार कर ही देते हैं l एक बार फिर आप सबका शुक्रिया..! थैंक्स फेसबुक ... smile emoticon

आपकी अमोल शुभकामनाओं के लिए ह्रदय से आभारी हूँ.

आपकी अमोल शुभकामनाओं के लिए ह्रदय से आभारी हूँ. ये ज्ञात-अज्ञात दुआएं ही हैं जिनकी बदौलत ये यज्ञ पूरा हुआ l अभी भी विश्वास नहीं होता कि पूरी हो गयी पी.एच. डी. l पिछले कई सालों से ये मेरे अस्तित्व के साथ यूँ चिपक गयी थी कि यही मेरी सीमा और यही मेरा विस्तार हो गयी थी. कुछ रास्ते, कुछ लोगों के लिए आसान और कुछ लोगों के लिए बहुत ही कठिन हो जाते हैं; इसमें काबलियत बस एक पहलू है l मेरे लिए यह रास्ता बहुत ही कठिन हो गया था l सैकड़ों बार सोचा कि इस रास्ते की मंजिल का मुंह मै नहीं देख सकूँगा l शुभेक्षाएं एवं दुआओं ने ही मुझे उबार लिया l और सच में रास्ते के इस किनारे आकर मै वही नहीं रह गया हूँ, जो रास्ते के उस छोर पर था l सीखा तो बहुत कुछ l पर शायद सबसे बड़ी सीख जो सीखी वो है-धैर्य l स्वयं पे विश्वास रखते हुए धैर्य का दामन पकडे हुए चलते जाना ...बस चलते जाना.......,....! और जब भी जितना भी मौक़ा मिल जाये ..खिलखिलाते रहना-हँसते और हंसाते रहना.... smile emoticon शुक्रिया   ‪#‎ JNU‬   l डेमोक्रेटिक स्पेस की रट लगाना और डेमोक्रेटिक स्पेस उपलब्ध करवाने में बहुत अंतर है l  ...

परिवर्तन और विरोधाभास

......सतत दबावों में तोष के लिए सहज ही जो समानांतर मै रच लेता हूँ मानस में...कहीं...., तू उससे ही तो नहीं ना रच लेता है 'भविष्य' ...बता ? ...और तो मुझे लगता है जैसे-परिवर्तन और विरोधाभास बस दो ही धर्म हैं जीवन के ..! ‪#‎ श्रीशउवाच‬

भगत सिंह-सुखदेव-राजगुरु की शहादत

देश के लिए किया गया कोई भी योगदान छोटा या बड़ा नहीं होता, वह महनीय ही होता है। शहादतों की तूलना करना किसी भी शहादत का अपमान ही करना है। भगत सिंह-सुखदेव-राजगुरु की शहादत इसलिए बड़ी नहीं है कि किसी और महापुरुष की शहादत छोटी है, बल्कि वह शहादत बड़ी है ही क्योंकि वो प्यारे भारत के लिए की गई थी। मेरी विनम्र श्रद्धांजली...!!!

भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी

साल 1996....!!! अखबार का पहला पन्ना थोड़ा-थोड़ा समझ आने लगा था। 'राव बनाएं, फिर सरकार' के पोस्टरों को फाड़ सहसा एक लोकप्रिय नेता भारत का प्रधानमंत्री बनने जा रहा था। उस जमाने में हम सभी उनकी तरह बोलने की नकल करते थे। शब्दों के बीच का अंतराल चमत्कार पैदा करता था, क्योंकि सहसा वे कुछ ऐसा कह जाते थे, जिसकी मिठास घंटो घुली होती मन में...! हिन्दी भाषा कितनी गरिमामयी हो सकती है...ये हम महसूस कर रहे थे...आज भी कह सकता हूं, मातृभाषा में जो बात है वो आंग्लभाषा में कहां...? श्री अटल बिहारी वाजपेयी....! मेरे होश में तो यदि राष्ट्रपति के तौर पर कलाम साहब ज़ेहन में छाए रहेंगे हमेशा तो प्रधानमंत्री के तौर पर अटल जी की जगह कोई नहीं ले सकेगा। प्रधानमंत्री जो कवि-हृदय हो, सक्रिय और जमीनी राजनीति का लंबा अनुभव लिए हो, समर्पित हो और बेदाग भी हो, स्पष्टवादी भी हो और मृदुभाषी भी हो...! विदेश नीति पर जिसकी व्यक्तिगत छाप हो...., सिद्धान्तवादी भी हो और समन्वयवादी भी हो....और दूजा कौन - भारत रत्न श्री अटल बिहारी वाजपेयी...!!! भारत रत्न जब वाकई भारत के रत्न को मिलता है तो खुशी भी मुकम्मल होत...

In dealing with Pakistan...

In dealing with Pakistan, major obstacle is that to whom you should deal. In Pakistan, there are several power centres but none is accountable. Achchhe din vali Government must deal with those International actors on which Pakistan is fairly dependent. As a country, until we don't have capacity to bargain and negotiate with those actors, we cannot ever come in a position to resolve problems regarding Pakistan.  Diplomatic-economic inability of New Delhi is taking continuously precious lives of our beloved and great soldiers on borders. Our borders are compromised just because; Delhi often merely believes in rhetoric and slogans rather than concrete actions.  ‪#‎ श्रीशउवाच‬

माना, बचपन इतना भी बेख़ौफ़ ना होता हो सबका

माना, बचपन इतना भी बेख़ौफ़ ना होता हो सबका, पर जैसी भी जिन्दगी है किसी की, बचपन का अल्हड़पन याद जरुर आता होगा. तेरा-मेरा था, तरोड़-मरोड़ ना था, नीच-ऊंच था भी तो उसका महत्त्व कुछ ना था. जानते कुछ ना थे, जानना सब चाहते थे. प्यार जितना भी नसीब था, हिसाब नहीं था. खेल खेल में मेल और मेल मेल में रेलम रेल हो जाती थी...हंसी-खुशी की फुलझड़ियाँ सबके पास होती थीं. बचपन में हम बड़े बनना चाहते थे, बड़े बनकर हम बड़े जानते हैं कि हम कितने लम्बे, महीन और कमजोर हो गए. बेजान कागज के नोट की अहमियत , जान दार तितलियों से अधिक हम समझदार आंकने लगे...! पता नहीं हम बड़े हुए या छोटे हुए....पता नहीं. ‪#‎ श्रीशउवाच‬

मानविकी विषयों की हीन समझ

जिस समाज में मानविकी विषयों को विज्ञान एवं तकनीकी विषयों से हीनतर समझने की अपरिपक्वता व्याप्त है , खासे पढ़े-लिखे लोग भी मानविकी विषयों की महत्ता नगण्य ही समझते हैं, वे नहीं समझ सकते कि ये विद्यार्थी लोग क्यों विरोध कर रहे हैं सीसैट का. समाज और संस्कृति की बुनियादी समझ, विज्ञान एवं तकनीकी विषयों में भी सही मायने में उपयोगी इनोवेशन को जन्म देती है, अन्यथा उनमें विनाश के ही बीज रोपे हुए होते हैं. विज्ञान विषयों की तकनीकियों के माध्यम से, कला विषयों में भी उपयोगिता एवं यथार्थ का तत्व प्रमुखता से उभरता है. ज्ञान का कोई क्लिष्ट विभाग विभाजन नहीं हो सकता. अपने अपने अनुशासन में सभी परिश्रम करते हैं और यथासंभव योग भी देते हैं. मशीन बनाने वाले, समझने वाले लोगों को भी रचनात्मक योगदान देने के लिए एक शांत, उन्नत बेहतर समाज और सरकार चाहिए होता है...ताकि विकास का मूल उद्देश्य सुरक्षित रह सके. एक उन्नत बेहतर समाज और सरकार के लिए मानविकी विषयों में भी निरंतर शोध एवं पठन-पाठन की आवश्यकता होती है.  दुनिया के बाकि उन्नत देश जिनकी हम बेशर्म नक़ल करना चाहते हैं वे अपनी भाषा एवं इस मानविकी जरूरत की ...

Loudspeakers of Media

In today's media scenario, there are many loudspeakers, it is now not dominated by one or two or three institutions. So, there is no possibility for uniformity in media voice. Each loudspeaker has own voice, guided by own player system. We can't judge any issue from taking only one or two references, it is not the era of Doordarshan. The politics and its manifestations vary according to the time, era, generation, crisis and challenges. Texture and taste of government in true democracy are exact reflection of people who actively engage in political participation. Today, people are fed up with corrupt practices, lots of layers of rhetorics, red-tapism...,...., etc. They have chosen their government. This new regime must act as they promised to do. It would not be fair to compare two government working styles in a same breath. We, the people, of India, have no patience to give even some time to AAP for judgement having their manifasto in hands, but We want that AAP guy...

वातानुकूलित बौद्धिकों के सैद्धांतिक तर्क

....आज लगभग हर अखबार में आपको ऐसे वातानुकूलित बौद्धिकों की सैद्धांतिक तर्क-आयोजनों की भरमार मिल जायेगी, जो उन्होंने  #AAP के ऐतिहासिक सफलता के पक्ष में रखे होंगे. ध्यान दीजिये, ये वही लोग है जो दो दिन पहले तक #AAP के अस्तित्व तक से परहेज करते थे. अख़बारों में, टीवी की बहसों में उन्हें कांग्रेस-भाजपा के आगे कुछ सूझता नहीं था. (इसमें टीवी एंकरों को तो जाने दीजिये- उन्हें तो रंग बदलते दिख जाने की मजबूरी से भी गुजरना ही पड़ता है). इनके आतंक से ही "आम आदमी" अपनी "खासियत" भूल जाता है.  इसमें से कई नामी पत्रकार-संपादक लोग भी हैं, जिन्होंने मौसम को भांपते हुए यहाँ फेसबुक पे भी कुछ यों स्टेटस लिखा-"कम से कम मै तो कही रहा था",.....! ये वे लोग हैं, जिन्हें पहले हुई सभी क्रांतियाँ महान लगती हैं, और उसके अनगिन कारण भी वे गिनाते हैं. इन्हें सामने का कुछ नज़र नहीं आता. ये वे लोग हैं जिन्हें लोकतंत्र की मजबूतियों से ज्यादा उसकी कमजोरियों में अखंड विश्वास है. ये खाए-पीये-अघाए लोग जाने कितनी ही ऐसी क्रांतियों की ऐसे ही भ्रूण-ह्त्या कर देते हैं..दिनों-दिन अपने कुतर्कों से. क्...

#सचिन

.....We really miss u,  ‪#‎ Sachin‬ . Undoubtedly, you are a great person and fantastic human being on/off the field. The more you mounted above, you have maintained more discipline, decency, dignity and nobility. You are really living legend and above in the list of maestros of every field, an iconic ideal to get immense inspiration and lead life more meaningfully. I am lucky to belong the generation in which I have seen you in action. For you, nation is above from all the thin gs and in this way you have played a greater role to integrate our nation into one spirit. Bharat Ratna Sachin Ramesh Tendulkar...! Thanks to GOI. What a timing…! It’s ok; after all, politics and batting is all about timing.. smile emoticon   Hopefully, government would recognize some more people who deserve Bharat Ratna equally in sport and many more field.

Some worth pursuing good thoughts

"मानने लायक कुछ बहुत अच्छी बातों में सबसे बड़ा नुक्स ये होता है कि वे देखने, सुनने, समझने में बड़ी साधारण लगती हैं...! ” "Some worth pursuing good thoughts have a great lacuna that they seem so simple to eye, ear and mind.” #श्रीश प्रखर 

श्रीश की श्रीश से एक बात-चीत

श्रीश की श्रीश से एक बात-चीत कुछ यों हुई.....!  (बात पुरानी है, पर यहाँ रखने का मन हुआ) "यार बुद्धिमान तो सब कुछ साक्षी भाव से लेते हैं। क्या खुश होना, क्या दुखी होना। अच्छा, तुम बताओ क्या चाहते हो....?" "चाहता हूँ, भौतिक जगत में भी सब ठीक ठीक कर लूँ, मेहनत करूँ, उपलब्धियां मिलें, लोगों की अपेक्षाओं पर खरा उतरूँ, लोगों के काम आ सकूँ। और फिर राम जी का भी प्यार पा लूँ....." "पहले क्या पाना चाहते हो, बाद में क्या पाना चाहते हो...?" पहले  माँ, बाप, परिवार, देश, समाज के लिए कुछ करना चाहता हूँ....उनके लिए फर्ज़ बनता है, मेरा..., फिर खुद को राम जी के चरणों में समर्पित करना चाहता हूँ। " "तो एक बार में एक काम निपटाना चाहते हो...पर ऐसा नहीं होता....! यही तो ज़िंदगी है....इसे आसान क्यूँ चाहते हो....ये क्यूँ आसान रहे.....सब तुम्हारी ईच्छा क्रम से अगर अनुक्रमित हो जाए तो तुम्हारे लिए इस ज़िंदगी में चुनौतियाँ क्या होंगी......? "क्यूँ सब कुछ आसान ना हो....? चुनौतियाँ जरूरी क्यूँ हैं....मै किसी चीज से भागने के लिए थोड़ी कह रहा हूँ...कर...

कमबख्त सच

कमबख्त सच कमबख्त सच को सीढ़ियों सा सरपट होना था। कि कोई भी कदम दर कदम चढ़ते हुए यथार्थ की सपाट छत पर पहुँचता...। पर मुआ हुआ गोल प्याज सा छीलो, उघाड़ो हर परत हाथ कुछ ना आता। दरम्यां हथेली पे ही सूख जाते इकलौते आँसू, जाने और क्या कहना था। (श्रीश पाठक प्रखर ) #श्रीशउवाच 

दिशाहीन हो भटकना भी .....कुछ अर्थ लिए होता है।

मुझे जीवन में एक पग भी चलना निरर्थक नहीं लगता। दिशाहीन हो भटकना भी .....कुछ अर्थ लिए होता है। अनुभव से कह सकता हूँ, जिसे लोग गलतियाँ कह देते हैं ....गहरे में जानता हूँ उन्हीं से मुझे ताकत भी मिलती रही है। मै ये जानता हूँ, जो फैसले लिए जा चुके हैं.....वे गलत नहीं हो सकते है....नज़रिये की बात है......हाँ, थोड़ा बाद में समझ आता है....! जो बीत गया, उसे कोसना स्वयं को और भी कमजोर करना है....आज, अभी जो है....क्या वो उपलब्धि नहीं है....और जो कुछ भी है अभी उसे पाने में यदि आप सोचते हैं केवल सही निर्णयों का योगदान है तो यकीनन आप पक्षपाती हो रहे हैं....!  व्यतीत-अतीत उपलब्धि ही है....वर्तमान, प्रकृति का उपहार है...जिसमें हम सर्वाधिक शक्तिशाली हैं...और भविष्य मोहक आशा है...प्रेरणा है....सकारात्मक होना स्वीकारना है सर्वस्व को...इसमें क्या बुरा है....मुझे अपनी नाकामियाँ भी कम प्रिय नहीं हैं...उनमें भी मै ही हूँ...वे भी मुझे सम्पूर्ण बनाते हैं........! #श्रीशउवाच 

एक मानसिक कलोलबाजी

च....च...अरे नहीं, रिश्ते, उम्र की तरह नही होते, कुछ समझदार-मैच्योर लोग समझते हैं कि हर रिश्तों की उम्र होती है। उन्हें किसी भी नाजुक रिश्तों को टूटना, सिमटना या फिर बिखरना किसी वैज्ञानिक प्रक्रिया के मानिंद, सामान्य लगता है...उन्हें नहीं पता शायद रिश्तों की अन्यान्य प्रक्रिया फिर वैसे ही कभी भी दुहराई नहीं जा सकती और उसकी ऊष्मा किसी जार विशेष में किसी खास केमिकल के साथ संरक्षित भी नहीं की जा सकती। (...एक मानसिक कलोलबाजी...:)   ) #श्रीशउवाच 

धीरज ....

".....जीवन का शायद सबसे कठिन कार्य है धीरज रखना. खासकर जब आपको लगता है कि किसी ना किसी प्रकार से आप लगातार प्रयत्नशील हैं. ये धीरज रखना, किसी साधारण व्यक्ति से नहीं हो सकता. बचपन में जब किसी परिणाम पर टकटकी लगा के उद्विग्न रहा करता तो बड़े बुजुर्ग समझाते कि धीरज धारण करो, बड़ी झुंझलाहट होती उस वक़्त. सारी पढ़ाई सारा ज्ञान शायद विपरीत परिस्थितियों में आपा ना खोने के लिए ही प्रशिक्षित करता है..! धीरज भी अभ्यास मांगता है...यूँ ही नहीं सध जाता...! चुप्पी धारण कर लेना धीरज नहीं है. सकारात्मकता के साथ शांतिपूर्वक सतत प्रयत्नशील रहना, धैर्य है. इस अवस्था में ही 'कर्मण्ये वाधिकारस्ते' का सही अर्थ स्पष्ट होता है.....!!! " ‪#‎ श्रीशउवाच‬