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माना, बचपन इतना भी बेख़ौफ़ ना होता हो सबका

माना, बचपन इतना भी बेख़ौफ़ ना होता हो सबका, पर जैसी भी जिन्दगी है किसी की, बचपन का अल्हड़पन याद जरुर आता होगा. तेरा-मेरा था, तरोड़-मरोड़ ना था, नीच-ऊंच था भी तो उसका महत्त्व कुछ ना था. जानते कुछ ना थे, जानना सब चाहते थे. प्यार जितना भी नसीब था, हिसाब नहीं था. खेल खेल में मेल और मेल मेल में रेलम रेल हो जाती थी...हंसी-खुशी की फुलझड़ियाँ सबके पास होती थीं. बचपन में हम बड़े बनना चाहते थे, बड़े बनकर हम बड़े जानते हैं कि हम कितने लम्बे, महीन और कमजोर हो गए. बेजान कागज के नोट की अहमियत , जान दार तितलियों से अधिक हम समझदार आंकने लगे...! पता नहीं हम बड़े हुए या छोटे हुए....पता नहीं. ‪#‎ श्रीशउवाच‬

टच-कीपैडकालीन लोग

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कल अचानक ही शहर-भ्रमण करना पड़ा. बस के लिए दिन वाला पास बनवा लिया था. एक छोटी सी गलती या यूँ कहें हड़बड़ी से गलत बस में बैठ गया , जो पहुँचती तो वहीँ थी , पर बहुत ही घूम-फिरके. ये हड़बड़ी बड़ी ही बेतुकी थी , क्योंकि दरअसल मुझे कोई खास जल्दी थी नहीं. सो मै भी बस में बैठा रहा. बहुत दिनों बाद मुझे एक प्रिय काम करने का मौका मिला. चुपचाप लोगों को पढना.  फिर तो बस से उतरकर भी ये पढना जारी रहा. कितने तरह के तो लोग हैं....कितनी तरह की प्राथमिकतायें. सबकी चाहें कमोबेश एक जैसी हैं...खुशियों की सबको दरकार बराबर है. पर देखो कितने अलग दिखते हैं लोग और कितनी अलग दिखती है उनकी आदतें. टच-कीपैड के युग में भी बच्चों में शरारतें जिंदा हैं..सुकून हुआ देखकर. तो सब कुछ ख़तम नहीं होने जा रहा. इंसान नयी-नयी चीजों की ओर आकर्षित जरूर होता है लेकिन ज़ेहन में उसे कद्र होती हैं खासियतों की. बच्चों को खेलना तो है ही पर हाँ अब उनके पास भी विकल्प बढ़ गए हैं और रूम और फील्ड का अंतर तो उन्हें पता ही है. ये और बात है , कि बाज़ार ने हरहाल में जीतने की ललक को डी.एन.ए. की तह तक इस मानिंद फिट कर दिया है कि जहाँ वे खुद को बेह...

जिंदगी वाया 615

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(नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से जे.एन.यू. जाने के लिए डी.टी.सी. बस जाती है, ६१५ नंबर की. यह मिंटो रोड (पिन कोड-११०००१) से चलकर पूर्वांचल होस्टल (पिन कोड-११००६७) तक जाती है. कनाट प्लेस, इंडिया गेट, सरोजिनी मार्केट होते हुए ये बस फिर जे.एन.यू.होस्टल पहुँच जाती है. ऐसा कई बार हुआ कि यह छोटा सा सफर पूरा करते हुए पढ़ाई का अपना पूरा सफर याद आने लगता है. ये सफर एक कान्वेंट स्कूल, शिशु मंदिर , गोरखपुर विश्वविद्यालय होते हुए जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय तक अब आ पहुंचा है. ६१५ कभी झूम के चलती है, कभी जाम में फस जाती है. बिलकुल ज़िंदगी की तरह. इसमें खूब भीड़ होती है . सफर में जाने कितने मिले. पर सबको कहाँ एक ही मंजिल पर रुकना होता है..! ये ६१५ ना अक्सर रेड सिग्नल पर रुक जाती है..पर कभी-कभी रेड होने के एकदम पहले ही निकल जाती. ज़िंदगी में भी ऐसे वाकये तो आये ही जब हमने खतरे की घंटी बजने से पहले ही लगाम अपने हाथ में ले ली हो..!) नई  दिल्ली रेलवे स्टेशन से ६१५ को आजकल पकड़ना आसान नही. कंस्ट्रक्सन वर्क  चल रहे हैं तो कुछ समझ में नही आता कि कहाँ खड़े रहें तो बस मिल जायेगी. आज सो...

“ सहज..2010..”

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“ सहज..2010..” नए साल पर लिखना चाहिए कुछ..इतना तो बनता ही है..यार..! 2009 जा चुका है. कहाँ कुछ चला जाता है.. ? कुछ नहीं जाता...सब कुछ यहीं रहता है..चेहरे पे , नसों मे , बहता रहता है...मेरी प्रतिक्रियाएँ बताती हैं मेरी हालत..। कुछ देखने-टोकने की आदत जाती नहीं..क्या करूँ.. ? गुजरा साल , हर साल की तरह कुछ और सीख दे गया. मसलन ; अपनी अभिनय-क्षमता निखारते रहो. लोगों को यथार्थ भी मिलावटी चाहिए. एक आदमी मे वाकई देखो कितने और भी आदमी झूलते रहते हैं..अपनी आँखों को दिल-दिमाग से सटाकर रखना दोस्त..गच्चा खा जाओगे..। ब्लागिरी मतलब..अपने ideas हाट पे लगाना..शायद. हम धीरे-धीरे नुमाइशी होते रहे..लोग nice-nice करते रहे.ब्लागिरी पे क्या कहना—कुछ जिंदा से लोग आपके पन्ने पलट सकते हैं...इतना कम है क्या.. ? इसमें इतना साहित्य-सेवा जितना कुछ नही है..ज्यादा सेंटी बनने की जरूरत नही है...! बिना दायित्व के भी लिखने दिया करो यार कहीं...! नए साल से उम्मीदें.........तो गुजरे साल से कम नही है पर depend करता है कि अपने-आप से कितनी उम्मीदें बची हुई हैं..। पापा की आवाज—अपने आप को सम्हाल लो , बहुत है....

लेकॉनिक टिप्पणी का अभियोग ........ऐसा है क्या....? प्रेरणा : आदरणीय ज्ञानदत्त जी...

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लेकॉनिक टिप्पणी का अभियोग ........ऐसा है क्या....? प्रेरणा : आदरणीय ज्ञानदत्त जी. ..  भूमिका : आजकल व्यस्त हूँ, या यूँ कहें कुछ ऐसा ही रहना चाहता हूँ. मै जिस मध्यम स्तरीय पारिवारिक विन्यास से हूँ वहां अभी कुछ समय पहले तक सेलफोन भी विलासिता का प्रतीक माना जाता रहा है तो लैपटॉप और उसमे भी इन्टरनेट कनेक्शन...शायद सरासर विलासिता. अभी मेरा कैरियर मुझसे और ढेर सारा पसीना मांग रहा है और चाहिए उसे स्पर्श integrated and comprehensive time management  का.  तो समय मेरे लिए केवल कीमती ही नहीं है वरन उसका असहनीय दबाव भी रहता है लगातार. लिखना अच्छा लगता है तो ब्लागरी पर नज़र गयी. अचानक से ब्लोगिंग हाथ लगी और हम आ गए धीरे-धीरे रौ में. पर एक अपराध बोध लगातार चलता रहता है मन में कि शायद मेरी दिशा ठीक नहीं है. शायद मै समय गवां रहा हूँ या ब्लागरी तो कभी की जा सकती है. या ऐसा भी क्या है ..मिलता क्या है..कुछ/न्यूनाधिक  टिप्पणियां...!!! अपराध-बोध का कम होते जाना  : शुरू में बस लिखता गया. ब्लाग-एग्रीगेटर्स के बारे में कुछ पता नहीं था. मुझे लगता था कि एक डायरी सा...

क्या हम कभी इतने 'सभ्य' नहीं रहे कि 'हाशिया' ही ना रहे...?

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आज दीवाली है, खासा अकेला हूँ. सोचता हूँ, ये दीवाली, किनके लिए है, किनके लिए नहीं. एक लड़की जो फुलझड़ियॉ खरीद रही है, दूसरी बेच रही है, एक को 'खुशी' शायद खरीद लेने पर भी ना मिले, और दूसरी को भी 'खुशी' शायद बेच लेने पर भी ना मिले. हम कमरे साफ कर रहे हैं, चीजें जो काम की नहीं, पुरानी हैं..फेक रहें हैं, वे कुछ लोग जो गली, मोहल्ले, शहर के हाशिये पे और साथ-साथ मुकद्दर के हाशिये पे भी नंगे खड़े रहते हैं, उन्हीं चीजों को पहन रहे हैं, थैले में भर रहे हैं.. .ऐसे देखो तो कबाड़ा कुछ भी नहीं होता...ये भी सापेक्षिक है. २०,००० हो तो एक कोर्स की कोचिंग हो जाए, पढ़ा पेपर में कि--२०,००० के पटाखे भी आ रहे हैं, बाज़ार में. दीवाली, होली तो जैसे कोई और बैठा कहीं से खेल रहा हो जैसे..हम पटाखे, बंदूख, पिचकारी, रंग बनकर उछल रहे सभी. .. अभी शाम को मैंने एक सिटी स्कूल के बगल बहती नाली से सटे बैठे दो छोटे बच्चे देखे--भाई-बहन. नंग-धड़ंग, काली-मैली, शर्ट-हाफ-पैंट, गंदी-फटी फ्राक--मिट्टी के दिए बना रहे थे वे. 'नगर-पथ' की मिट्टी से और नाली के पानी से ----इनकी दीवाली....? इनके प...

मिथिलेश भैया के "बिस्मिल" अखबार के लिए मैंने अपना पहला लेख लिखा...

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"हर दौर के बिस्मिल को.." बिस्मिल...यानि क्रांतिदूत..हर दौर को जरूरत होती है बिस्मिल की, क्योकि हर दौर में तब्दीलियाँ अपनी जगह बनाने को आतुर होती हैं और पुराने खंडहर अपनी जगह पर कुंडली मार बैठे होते हैं.