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परिवर्तन और विरोधाभास

......सतत दबावों में तोष के लिए सहज ही जो समानांतर मै रच लेता हूँ मानस में...कहीं...., तू उससे ही तो नहीं ना रच लेता है 'भविष्य' ...बता ? ...और तो मुझे लगता है जैसे-परिवर्तन और विरोधाभास बस दो ही धर्म हैं जीवन के ..! ‪#‎ श्रीशउवाच‬

दिशाहीन हो भटकना भी .....कुछ अर्थ लिए होता है।

मुझे जीवन में एक पग भी चलना निरर्थक नहीं लगता। दिशाहीन हो भटकना भी .....कुछ अर्थ लिए होता है। अनुभव से कह सकता हूँ, जिसे लोग गलतियाँ कह देते हैं ....गहरे में जानता हूँ उन्हीं से मुझे ताकत भी मिलती रही है। मै ये जानता हूँ, जो फैसले लिए जा चुके हैं.....वे गलत नहीं हो सकते है....नज़रिये की बात है......हाँ, थोड़ा बाद में समझ आता है....! जो बीत गया, उसे कोसना स्वयं को और भी कमजोर करना है....आज, अभी जो है....क्या वो उपलब्धि नहीं है....और जो कुछ भी है अभी उसे पाने में यदि आप सोचते हैं केवल सही निर्णयों का योगदान है तो यकीनन आप पक्षपाती हो रहे हैं....!  व्यतीत-अतीत उपलब्धि ही है....वर्तमान, प्रकृति का उपहार है...जिसमें हम सर्वाधिक शक्तिशाली हैं...और भविष्य मोहक आशा है...प्रेरणा है....सकारात्मक होना स्वीकारना है सर्वस्व को...इसमें क्या बुरा है....मुझे अपनी नाकामियाँ भी कम प्रिय नहीं हैं...उनमें भी मै ही हूँ...वे भी मुझे सम्पूर्ण बनाते हैं........! #श्रीशउवाच 

धीरज ....

".....जीवन का शायद सबसे कठिन कार्य है धीरज रखना. खासकर जब आपको लगता है कि किसी ना किसी प्रकार से आप लगातार प्रयत्नशील हैं. ये धीरज रखना, किसी साधारण व्यक्ति से नहीं हो सकता. बचपन में जब किसी परिणाम पर टकटकी लगा के उद्विग्न रहा करता तो बड़े बुजुर्ग समझाते कि धीरज धारण करो, बड़ी झुंझलाहट होती उस वक़्त. सारी पढ़ाई सारा ज्ञान शायद विपरीत परिस्थितियों में आपा ना खोने के लिए ही प्रशिक्षित करता है..! धीरज भी अभ्यास मांगता है...यूँ ही नहीं सध जाता...! चुप्पी धारण कर लेना धीरज नहीं है. सकारात्मकता के साथ शांतिपूर्वक सतत प्रयत्नशील रहना, धैर्य है. इस अवस्था में ही 'कर्मण्ये वाधिकारस्ते' का सही अर्थ स्पष्ट होता है.....!!! " ‪#‎ श्रीशउवाच‬

अजीब सी उधेड़बुन ...

अजीब सी उधेड़बुन मची रहती है ज़ेहन में. लगता है जैसे कितना कुछ करना हो और कितना कम हो पा रहा हो. सीखता तो रोज ही कुछ न कुछ हूँ ....न ...न ...ये ज़िंदगी रोज ही कुछ न कुछ सीखाती रहती है. क्या होगा सब कुछ सीखकर. क्या होगा ज्यादातर जानकर.....! शायद ये उधेड़बुन मिट जाए... पर ऐसा होता नही.  थोड़ी जानकारी और ज्यादा के लिए प्रेरित करती है...ज्यादा जानकारी और ज्यादा के लिए हिलोर मारती है....हम बूंद ही बने रहते हैं सामने विशाल सागर दिखता रहता है. हम बूंदों के विभिन्न रंग हो सकते हैं होते ही हैं हमारे सबके दृष्टिकोण भिन्न-भिन्न...! किन्तु मूल स्वरुप में हम रहते हैं बूंद ही. मै नियतिवादी या निराशावादी हो रहा हूँ क्या जब मै स्वयम कों बूंद से बड़ा नही समझ रहा हूँ. पर मै यों ही नही कह रहा ...! आज तक किसी भी विषय पर मै पूरी तरह संतुष्ट नही रहा...मैंने किसी एक विषय पर बहुतेरे शोध किये, लोगों से पूछ-ताछ की...पर अंत तक कोई ना कोई प्रश्न उभरता रहा और वह अनुत्तरित ही रहा. कई बार लगा....उपलब्धि ये नए-नए प्रश्न ही रहे जिनकी प्रारंभ  में कल्पना भी नही हो सकती थी. जानना जैसे यह ही रहा हो कि ...

आवारगी

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  आवारगी; पर लिखने का मन है, आज, माफ़ करियेगा.मुझे 'आवारा' शब्द से इतनी ज्यादा नफ़रत रही है, कि मेरे पापाजी को जब मुझसे अधिकतम विरोध जताना होता है, तो वे इसी शब्द का प्रयोग करते हैं. और वे जानते हैं, कि मै तिलमिला पडूंगा..