संदेश

Comment लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

भगत सिंह-सुखदेव-राजगुरु की शहादत

देश के लिए किया गया कोई भी योगदान छोटा या बड़ा नहीं होता, वह महनीय ही होता है। शहादतों की तूलना करना किसी भी शहादत का अपमान ही करना है। भगत सिंह-सुखदेव-राजगुरु की शहादत इसलिए बड़ी नहीं है कि किसी और महापुरुष की शहादत छोटी है, बल्कि वह शहादत बड़ी है ही क्योंकि वो प्यारे भारत के लिए की गई थी। मेरी विनम्र श्रद्धांजली...!!!

भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी

साल 1996....!!! अखबार का पहला पन्ना थोड़ा-थोड़ा समझ आने लगा था। 'राव बनाएं, फिर सरकार' के पोस्टरों को फाड़ सहसा एक लोकप्रिय नेता भारत का प्रधानमंत्री बनने जा रहा था। उस जमाने में हम सभी उनकी तरह बोलने की नकल करते थे। शब्दों के बीच का अंतराल चमत्कार पैदा करता था, क्योंकि सहसा वे कुछ ऐसा कह जाते थे, जिसकी मिठास घंटो घुली होती मन में...! हिन्दी भाषा कितनी गरिमामयी हो सकती है...ये हम महसूस कर रहे थे...आज भी कह सकता हूं, मातृभाषा में जो बात है वो आंग्लभाषा में कहां...? श्री अटल बिहारी वाजपेयी....! मेरे होश में तो यदि राष्ट्रपति के तौर पर कलाम साहब ज़ेहन में छाए रहेंगे हमेशा तो प्रधानमंत्री के तौर पर अटल जी की जगह कोई नहीं ले सकेगा। प्रधानमंत्री जो कवि-हृदय हो, सक्रिय और जमीनी राजनीति का लंबा अनुभव लिए हो, समर्पित हो और बेदाग भी हो, स्पष्टवादी भी हो और मृदुभाषी भी हो...! विदेश नीति पर जिसकी व्यक्तिगत छाप हो...., सिद्धान्तवादी भी हो और समन्वयवादी भी हो....और दूजा कौन - भारत रत्न श्री अटल बिहारी वाजपेयी...!!! भारत रत्न जब वाकई भारत के रत्न को मिलता है तो खुशी भी मुकम्मल होत...

माना, बचपन इतना भी बेख़ौफ़ ना होता हो सबका

माना, बचपन इतना भी बेख़ौफ़ ना होता हो सबका, पर जैसी भी जिन्दगी है किसी की, बचपन का अल्हड़पन याद जरुर आता होगा. तेरा-मेरा था, तरोड़-मरोड़ ना था, नीच-ऊंच था भी तो उसका महत्त्व कुछ ना था. जानते कुछ ना थे, जानना सब चाहते थे. प्यार जितना भी नसीब था, हिसाब नहीं था. खेल खेल में मेल और मेल मेल में रेलम रेल हो जाती थी...हंसी-खुशी की फुलझड़ियाँ सबके पास होती थीं. बचपन में हम बड़े बनना चाहते थे, बड़े बनकर हम बड़े जानते हैं कि हम कितने लम्बे, महीन और कमजोर हो गए. बेजान कागज के नोट की अहमियत , जान दार तितलियों से अधिक हम समझदार आंकने लगे...! पता नहीं हम बड़े हुए या छोटे हुए....पता नहीं. ‪#‎ श्रीशउवाच‬

मानविकी विषयों की हीन समझ

जिस समाज में मानविकी विषयों को विज्ञान एवं तकनीकी विषयों से हीनतर समझने की अपरिपक्वता व्याप्त है , खासे पढ़े-लिखे लोग भी मानविकी विषयों की महत्ता नगण्य ही समझते हैं, वे नहीं समझ सकते कि ये विद्यार्थी लोग क्यों विरोध कर रहे हैं सीसैट का. समाज और संस्कृति की बुनियादी समझ, विज्ञान एवं तकनीकी विषयों में भी सही मायने में उपयोगी इनोवेशन को जन्म देती है, अन्यथा उनमें विनाश के ही बीज रोपे हुए होते हैं. विज्ञान विषयों की तकनीकियों के माध्यम से, कला विषयों में भी उपयोगिता एवं यथार्थ का तत्व प्रमुखता से उभरता है. ज्ञान का कोई क्लिष्ट विभाग विभाजन नहीं हो सकता. अपने अपने अनुशासन में सभी परिश्रम करते हैं और यथासंभव योग भी देते हैं. मशीन बनाने वाले, समझने वाले लोगों को भी रचनात्मक योगदान देने के लिए एक शांत, उन्नत बेहतर समाज और सरकार चाहिए होता है...ताकि विकास का मूल उद्देश्य सुरक्षित रह सके. एक उन्नत बेहतर समाज और सरकार के लिए मानविकी विषयों में भी निरंतर शोध एवं पठन-पाठन की आवश्यकता होती है.  दुनिया के बाकि उन्नत देश जिनकी हम बेशर्म नक़ल करना चाहते हैं वे अपनी भाषा एवं इस मानविकी जरूरत की ...

वातानुकूलित बौद्धिकों के सैद्धांतिक तर्क

....आज लगभग हर अखबार में आपको ऐसे वातानुकूलित बौद्धिकों की सैद्धांतिक तर्क-आयोजनों की भरमार मिल जायेगी, जो उन्होंने  #AAP के ऐतिहासिक सफलता के पक्ष में रखे होंगे. ध्यान दीजिये, ये वही लोग है जो दो दिन पहले तक #AAP के अस्तित्व तक से परहेज करते थे. अख़बारों में, टीवी की बहसों में उन्हें कांग्रेस-भाजपा के आगे कुछ सूझता नहीं था. (इसमें टीवी एंकरों को तो जाने दीजिये- उन्हें तो रंग बदलते दिख जाने की मजबूरी से भी गुजरना ही पड़ता है). इनके आतंक से ही "आम आदमी" अपनी "खासियत" भूल जाता है.  इसमें से कई नामी पत्रकार-संपादक लोग भी हैं, जिन्होंने मौसम को भांपते हुए यहाँ फेसबुक पे भी कुछ यों स्टेटस लिखा-"कम से कम मै तो कही रहा था",.....! ये वे लोग हैं, जिन्हें पहले हुई सभी क्रांतियाँ महान लगती हैं, और उसके अनगिन कारण भी वे गिनाते हैं. इन्हें सामने का कुछ नज़र नहीं आता. ये वे लोग हैं जिन्हें लोकतंत्र की मजबूतियों से ज्यादा उसकी कमजोरियों में अखंड विश्वास है. ये खाए-पीये-अघाए लोग जाने कितनी ही ऐसी क्रांतियों की ऐसे ही भ्रूण-ह्त्या कर देते हैं..दिनों-दिन अपने कुतर्कों से. क्...

#सचिन

.....We really miss u,  ‪#‎ Sachin‬ . Undoubtedly, you are a great person and fantastic human being on/off the field. The more you mounted above, you have maintained more discipline, decency, dignity and nobility. You are really living legend and above in the list of maestros of every field, an iconic ideal to get immense inspiration and lead life more meaningfully. I am lucky to belong the generation in which I have seen you in action. For you, nation is above from all the thin gs and in this way you have played a greater role to integrate our nation into one spirit. Bharat Ratna Sachin Ramesh Tendulkar...! Thanks to GOI. What a timing…! It’s ok; after all, politics and batting is all about timing.. smile emoticon   Hopefully, government would recognize some more people who deserve Bharat Ratna equally in sport and many more field.

Some worth pursuing good thoughts

"मानने लायक कुछ बहुत अच्छी बातों में सबसे बड़ा नुक्स ये होता है कि वे देखने, सुनने, समझने में बड़ी साधारण लगती हैं...! ” "Some worth pursuing good thoughts have a great lacuna that they seem so simple to eye, ear and mind.” #श्रीश प्रखर 

देश परिवार समाज : एक विमर्श

....नवोत्पल(http://navotpal.wall.fm/forum/topic/2?&page=1) पर हुई एक पुरानी चर्चा को यहाँ रख रहा हूँ, इसमें श्याम जी ने बड़े करीने से कुछ चीजें रखी हैं, शायद मित्रों को पसंद आये...! अंकित ...... ......The Real Scholar Aug 14 '10 Message #1 सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद हैदिल पे रखकर हाथ कहिये   देश क्या आजाद है...? प्रश्न तो कई दशक पुराना है ...पर उत्तर आज तक किसी ने नहीं दिया .......क्या इस पर नावोत्पल में कुछ चर्चा करना उचित होगा? Shyam Juneja Aug 15 '10 Message #2 इस महत्वपूर्ण प्रश्न पर चर्चा मैं एक शिवसूत्र से करना चाहूँगा .."धी वशात सत्व सिद्धि.. सिद्ध स्वतंत्र भाव.."हमारे यहाँ गायत्री मन्त्र में भी "धी" की ही मांग की गई है ..पंजाब में "धी" शब्द का प्रयोग बेटी के लिए किया जाता रहा है.. शायद कहीं कहीं आज भी प्रचलित है ..और शायद स्त्री के सम्मान में कही गई एक शब्द की सबसे सुन्दर कविता है यह "धी" ..क्या है धी ? कृष्ण ने गीता में जिसे "व्यवसायात्मिका बुद्धि" कहा है..कृष्णमूर्ती इसे "सजग...

“ सहज..2010..”

चित्र
“ सहज..2010..” नए साल पर लिखना चाहिए कुछ..इतना तो बनता ही है..यार..! 2009 जा चुका है. कहाँ कुछ चला जाता है.. ? कुछ नहीं जाता...सब कुछ यहीं रहता है..चेहरे पे , नसों मे , बहता रहता है...मेरी प्रतिक्रियाएँ बताती हैं मेरी हालत..। कुछ देखने-टोकने की आदत जाती नहीं..क्या करूँ.. ? गुजरा साल , हर साल की तरह कुछ और सीख दे गया. मसलन ; अपनी अभिनय-क्षमता निखारते रहो. लोगों को यथार्थ भी मिलावटी चाहिए. एक आदमी मे वाकई देखो कितने और भी आदमी झूलते रहते हैं..अपनी आँखों को दिल-दिमाग से सटाकर रखना दोस्त..गच्चा खा जाओगे..। ब्लागिरी मतलब..अपने ideas हाट पे लगाना..शायद. हम धीरे-धीरे नुमाइशी होते रहे..लोग nice-nice करते रहे.ब्लागिरी पे क्या कहना—कुछ जिंदा से लोग आपके पन्ने पलट सकते हैं...इतना कम है क्या.. ? इसमें इतना साहित्य-सेवा जितना कुछ नही है..ज्यादा सेंटी बनने की जरूरत नही है...! बिना दायित्व के भी लिखने दिया करो यार कहीं...! नए साल से उम्मीदें.........तो गुजरे साल से कम नही है पर depend करता है कि अपने-आप से कितनी उम्मीदें बची हुई हैं..। पापा की आवाज—अपने आप को सम्हाल लो , बहुत है....

ब्लॉग-जगत मे 'बात' : "बात की चूड़ी मर गई"

ब्लॉग-जगत मे 'बात' : "बात की चूड़ी मर गई" हम ब्लागर हैं. हम विचार चुनते हैं, बहुधा सोचते हैं..और देर-सबेर उसे पोस्ट मे तब्दील करते हैं..टिप्पणियाँ आती हैं...लोग कहते हैं कि चर्चा शुरू हो गई. अब हम टिप्पणियाँ कर रहे हैं. प्रति टिप्पणियाँ कर रहे हैं..हम टिप्पणी शायद विषय पर कर रहे हैं...वस्तुपरक होकर कर रहे हैं...आ हा हा..ना ना व्यक्तिपरक होने लगे ...चर्चा गुम नई चर्चा शुरू...तो ठीक है कुछ भी हो हमे क्या टिप्पणियाँ तो बढ़ी रही हैं....तो फिर क्या हुआ कि वो बात खो गई जिस पर कुछ कहना था, वह विचार गुम हो गया जिसे हमने चुना था कि कोई सार्थक बहस होगी और लेखन का दायित्व (?) पूरा होगा...तो अब हमारी ब्लॉग-आर्काइव मे बस पोस्ट बचते  हैं , टिप्पणियाँ रह जाती हैं..बात-दर-बात, बात कुछ और ही बात मे तब्दील हो जाती है पर हमे क्या, हम तो दनादन लिखे जा रहे हैं...टिप्पणियों की सेंचुरी बनाते जा रहे हैं...वैसे भी यह हमारा ब्लॉग है..हमारी कलम है..दायित्व की चिंता से हमे क्या लेना-देना...हमे बात उठाना था...टिप्पणी पाना था...बात आगे बढ़े, बदल  जाये, कहीं और पहुँच जाये..तो क्या...अपनी बला से...