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जिंदगी के मायने

"जब एक एक कर गिर रहे हों  उम्मीदों के मकां  जब टूट रहे हों अरसों से सजाये सपने  जब ख्वाहिशों के घरौदें  साबित हों रेत से और ढहने लगें कशमकश की  लहरों से .  जब मासूम अँगुलियों के पोर फिसलने लगे उनकी दिलकश  हथेलियों की पकड़ से और  छूटने लगे सारे एहसासों की  छुअन उनके दामन से . जब बाते विसाल की महक जाती रहे  और आंसूओं की बारिश से नज़र  उनकी खारी ना हो ... उस ज़ालिम वक़्त में ऐ मेरे प्यारे दोस्त... जिंदगी के मायने ना समझाना...!!! "                                     -श्रीश पाठक 'प्रखर' 

धीरज ....

".....जीवन का शायद सबसे कठिन कार्य है धीरज रखना. खासकर जब आपको लगता है कि किसी ना किसी प्रकार से आप लगातार प्रयत्नशील हैं. ये धीरज रखना, किसी साधारण व्यक्ति से नहीं हो सकता. बचपन में जब किसी परिणाम पर टकटकी लगा के उद्विग्न रहा करता तो बड़े बुजुर्ग समझाते कि धीरज धारण करो, बड़ी झुंझलाहट होती उस वक़्त. सारी पढ़ाई सारा ज्ञान शायद विपरीत परिस्थितियों में आपा ना खोने के लिए ही प्रशिक्षित करता है..! धीरज भी अभ्यास मांगता है...यूँ ही नहीं सध जाता...! चुप्पी धारण कर लेना धीरज नहीं है. सकारात्मकता के साथ शांतिपूर्वक सतत प्रयत्नशील रहना, धैर्य है. इस अवस्था में ही 'कर्मण्ये वाधिकारस्ते' का सही अर्थ स्पष्ट होता है.....!!! " ‪#‎ श्रीशउवाच‬

अजीब सी उधेड़बुन ...

अजीब सी उधेड़बुन मची रहती है ज़ेहन में. लगता है जैसे कितना कुछ करना हो और कितना कम हो पा रहा हो. सीखता तो रोज ही कुछ न कुछ हूँ ....न ...न ...ये ज़िंदगी रोज ही कुछ न कुछ सीखाती रहती है. क्या होगा सब कुछ सीखकर. क्या होगा ज्यादातर जानकर.....! शायद ये उधेड़बुन मिट जाए... पर ऐसा होता नही.  थोड़ी जानकारी और ज्यादा के लिए प्रेरित करती है...ज्यादा जानकारी और ज्यादा के लिए हिलोर मारती है....हम बूंद ही बने रहते हैं सामने विशाल सागर दिखता रहता है. हम बूंदों के विभिन्न रंग हो सकते हैं होते ही हैं हमारे सबके दृष्टिकोण भिन्न-भिन्न...! किन्तु मूल स्वरुप में हम रहते हैं बूंद ही. मै नियतिवादी या निराशावादी हो रहा हूँ क्या जब मै स्वयम कों बूंद से बड़ा नही समझ रहा हूँ. पर मै यों ही नही कह रहा ...! आज तक किसी भी विषय पर मै पूरी तरह संतुष्ट नही रहा...मैंने किसी एक विषय पर बहुतेरे शोध किये, लोगों से पूछ-ताछ की...पर अंत तक कोई ना कोई प्रश्न उभरता रहा और वह अनुत्तरित ही रहा. कई बार लगा....उपलब्धि ये नए-नए प्रश्न ही रहे जिनकी प्रारंभ  में कल्पना भी नही हो सकती थी. जानना जैसे यह ही रहा हो कि ...

जिंदगी वाया 615

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(नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से जे.एन.यू. जाने के लिए डी.टी.सी. बस जाती है, ६१५ नंबर की. यह मिंटो रोड (पिन कोड-११०००१) से चलकर पूर्वांचल होस्टल (पिन कोड-११००६७) तक जाती है. कनाट प्लेस, इंडिया गेट, सरोजिनी मार्केट होते हुए ये बस फिर जे.एन.यू.होस्टल पहुँच जाती है. ऐसा कई बार हुआ कि यह छोटा सा सफर पूरा करते हुए पढ़ाई का अपना पूरा सफर याद आने लगता है. ये सफर एक कान्वेंट स्कूल, शिशु मंदिर , गोरखपुर विश्वविद्यालय होते हुए जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय तक अब आ पहुंचा है. ६१५ कभी झूम के चलती है, कभी जाम में फस जाती है. बिलकुल ज़िंदगी की तरह. इसमें खूब भीड़ होती है . सफर में जाने कितने मिले. पर सबको कहाँ एक ही मंजिल पर रुकना होता है..! ये ६१५ ना अक्सर रेड सिग्नल पर रुक जाती है..पर कभी-कभी रेड होने के एकदम पहले ही निकल जाती. ज़िंदगी में भी ऐसे वाकये तो आये ही जब हमने खतरे की घंटी बजने से पहले ही लगाम अपने हाथ में ले ली हो..!) नई  दिल्ली रेलवे स्टेशन से ६१५ को आजकल पकड़ना आसान नही. कंस्ट्रक्सन वर्क  चल रहे हैं तो कुछ समझ में नही आता कि कहाँ खड़े रहें तो बस मिल जायेगी. आज सो...

लंबे लाल पहाड़

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"इससे पहले कि सांस लूँ कुछ कहने के लिए साहब वे जान लेते हैं मेरी त्यौरियों से कि क्या कह डालूँगा अभी मै. इससे अधिक वे ये जान लेते हैं कि वह ही क्यूँ  कहूँगा मै..! और फिर जब मै कहता हूँ..कुछ तो उन्हें नहीं दिखता मेरा लाल चेहरा, सुखें ओंठ, गीली-सूनी- धंसी आँखें, पिचके गाल, या और कुछ भी. वे मेरी बात में तलाशते हैं मार्क्सवाद, उदारवाद, बाजारवाद, नक्सलवाद, जातिवाद या फिर मजहबी कतरनें. सो सोचा है , कहूँगा नही उनसे  अब कुछ. साँसे जुटाऊंगा , धौंकनी भर-भर कर ताकि घटे ना आक्सीजन उन लम्बे लाल ईर्ष्या-द्वेष के पहाड़ों को लांघते हुए. " #श्रीश पाठक प्रखर  पेंटिंग साभार :Tsuneko Kokubo (स्रोत :गूगल इमेज)

मुझे उम्मीद नही है..!

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मुझे उम्मीद नही है, कि वे अपनी सोच बदलेंगे.. जिन्हें पीढ़ियों की सोच सँवारने का काम सौपा है..! वे यूँ ही बकबक करेंगे विषयांतर.. सिलेबस आप उलट लेना..! उम्मीद नही करता उनसे, कि वे अपने काम को धंधा नही समझेंगे.. जो प्राइवेट नर्सिंग होम खोलना चाहते हैं..! लिख देंगे फिर एक लम्बी जांच, ...पैसे आप खरच लेना..! क्यों हो उम्मीद उनसे भी, कि वे अपनी लट्ठमार भाषा बदलेंगे.. जिन्हें चौकस रहना था हर तिराहे, नुक्कड़ पर..! खाकी खखारकर डांटेगी,...गाँधी आप लुटा देना..! उम्मीद नही काले कोटों से, कि वे तारिख पे तारीखें नही बढ़वाएंगे.. उन्हें  संवाद कराना था वाद-विवादों पर..! वे फिर अगले  महीने बुलाएँगे...सुलह आप करा लेना..! कत्तई उम्मीद नही उन साहबों से, कि वे आम चेहरे पहचानेंगे.. योजनाओं को जमीन पे लाना था उन्हें...! वे मोटी फाइलें बनायेंगे...सड़कें आप बना लेना..! अब क्या उम्मीद दगाबाजों से, कि वे विकास कार्य करवाएंगे.. जनता को गले लगाना था जिनको ..! वे बस लाल सायरन बजायेंगे, ..कानून आप बना लेना..! उम्मीद तो बस उन लोगों से है, जो तैयार है बदलने के लिए इस क्षण भी.. जो जानते हैं कि शुरुआत स्वयं से होगी....

लव ..कैन किल यू...!

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"बहुत डगर कठिन है, प्रेम की.... लव ..कैन किल यू...! इन हवाओं में तैरती हैं इतनी नफरतें भी, गुत्थम-गुत्थम परेशां है चाहतें और मन में गोल-गोल घूमती उम्मीदें..! ये उम्मीदें ..कैन किल यू...! क्षितिज पार से आते हैं कुछ चेहरे .. उनपर बजबजाती है अनगिन बातें.. ऊंघता आकाश छितराए से हैं सपनों  के बादल ये सपने..कैन किल यू....! हर तरफ फैला है जहर जज्बातों का.. रंगीन रातों औ' बेहया ख्वाहिशों का.. अंजाम सिफर क्यूँ उन मासूम कोशिशों का.. वे कोशिशें..कैन किल यू...! उफ ये गम  और फिर बार-बार डूबना.. तेरे लिए इतना भी क्यूँ सिसकना.. फिर-फिर दौड़-पकड़  आदतों को पहनना.. ये आदतें..कैन  किल यू...! साथी; रोज चाँद का तनहा डूबना मत देखो.. उसे सोचो उसे लिख लो , प्यार से मत देखो.. उसे जी लो, पी लो , पर उस पार से मत देखो.. ये देखना..कैन किल यू...! मत करो प्यार..इसे बस मौक़ा दो.. इजहार जरूरी नही, एहसास छुपा लो वजह बासी हो ना जाये, सवाल लुटा दो.. प्यारे .. ये प्यार ..देख लेना...वुड किल यू...!" चित्र साभार: गूगल इमेज (ग्रेचर मेयर की एक प...