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उमड़-घुमड़ रहे मेघ से श्याम

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             हाँ , जीवन में अवसर जो अविस्मरणीय हों ; सहसा ही मिलते हैं...आप उनकी आयोजना नहीं कर सकते ,  तैयार रह सकते हैं पर तैयारी नहीं कर सकते । अप्रत्याशिता उनका प्रधान रस है । योजना अगर गढ़ ली तो अवसर मिलने पर हानि-लाभ की वणिक बुद्धि उस अवसर विशेष का रस पीने लग जाती है । तो अच्छा ही हुआ कि श्याम जी से मिलने का अविस्मरणीय अवसर सहसा ही प्राप्त हो गया । कोई योजना नहीं...बस सहसा ही । निमित्त बन गए अपने सुशील जी. ..उन्हें धन्यवाद तो देना नहीं है...:) बचपन से ही हम जाने-अनजाने अनगिन रिश्तों में बंधे होते है । वैसे तो धरा के प्रत्येक जीव रिश्तों का मर्म समझते हैं पर अपने प्यारे देश में तो रिश्तों की बड़ी ही पवित्र अहमियत है । रिश्तों के जाने कितने बुनियाद हैं....पर तीन आधार मुझे समझ आते हैं: खून के , भाव के और विचार के । इन तीनों के अलग अलग महत्वों की तूलना करना बेमानी है क्योंकि ये तीनों रिश्ते हमारी इयत्ता को स्पर्श करते हैं और उसे प्रकट करने में मदद करते हैं । हम तीनों ही रिश्तों के बिना नहीं रह सकते क्योंकि व्यवहार में ये तीनों ...

वसुन्धरा दी की अद्भुत कविताओं का संकलन 'शब्द नदी है' की समीक्षा

Shyam  जी के निर्देश पर  वसुन्धरा  दी की अद्भुत कविताओं का संकलन 'शब्द नदी है' की समीक्षा का अवसर प्राप्त हुआ था। यह समीक्षा जन संदेश टाइम्स में प्रकाशित हुई है। दी को उनकी कविताओं के लिए पुनश्च बधाइयाँ...!  ‪#‎ श्रीशउवाच‬   http://www.jansandeshtimes.in/index.php…   पढ़ लिए समस्त पृष्ठ। फिर परखा मैंने , कवि की एक कविता की पंक्ति से स्वयं को.... “ पतझर में भी खिला करते हैं कई फूल क्यों इंतज़ार करे है बहार का मत ढूँढा कर शायरी में वजन पूछना है तो पता पूछ प्यार का ” मैंने सोचा कि मै ही क्या खरा उतरा हूँ इस कसौटी पर। इन्हें पढ़ते हुए क्या तलाश कर रहा था मै....शब्द , शिल्प , विन्यास , भाव , अलंकार , व्याकरण या  प्यार........! चूंकि ये पंक्ति शुरू में ही आ जाती है तो बच जाता हूँ , कोई बचकानी हरकत नहीं करता मै और फिर बस प्यार , प्यार और बस प्यार ही निरखता जाता हूँ मै समस्त रचनाओं में। जी हाँ , समस्त कवितायें , उनके समस्त अंग-प्रत्यंग प्रियतम के प्यार में रची-सनी हैं। कभी प्रियतम की याद में पिघल रहीं हैं , कभी उनसे मिलत...