लेकॉनिक टिप्पणी का अभियोग ........ऐसा है क्या....? प्रेरणा : आदरणीय ज्ञानदत्त जी. .. भूमिका : आजकल व्यस्त हूँ, या यूँ कहें कुछ ऐसा ही रहना चाहता हूँ. मै जिस मध्यम स्तरीय पारिवारिक विन्यास से हूँ वहां अभी कुछ समय पहले तक सेलफोन भी विलासिता का प्रतीक माना जाता रहा है तो लैपटॉप और उसमे भी इन्टरनेट कनेक्शन...शायद सरासर विलासिता. अभी मेरा कैरियर मुझसे और ढेर सारा पसीना मांग रहा है और चाहिए उसे स्पर्श integrated and comprehensive time management का. तो समय मेरे लिए केवल कीमती ही नहीं है वरन उसका असहनीय दबाव भी रहता है लगातार. लिखना अच्छा लगता है तो ब्लागरी पर नज़र गयी. अचानक से ब्लोगिंग हाथ लगी और हम आ गए धीरे-धीरे रौ में. पर एक अपराध बोध लगातार चलता रहता है मन में कि शायद मेरी दिशा ठीक नहीं है. शायद मै समय गवां रहा हूँ या ब्लागरी तो कभी की जा सकती है. या ऐसा भी क्या है ..मिलता क्या है..कुछ/न्यूनाधिक टिप्पणियां...!!! अपराध-बोध का कम होते जाना : शुरू में बस लिखता गया. ब्लाग-एग्रीगेटर्स के बारे में कुछ पता नहीं था. मुझे लगता था कि एक डायरी सा...
तितर-बितर मन : एक बड़बड़ाहट तितर-बितर मन भीतर कुनमुना रहा एक आलाप जो अनगढ़ सपनों से बन पड़ा है. गला सूख रहा; सारे आदर्श वाक्य निस्तेज से हैं. सब समझ लेता है मन, उधेड़बुन पर जाती नहीं. दरक रहे केंचुल संस्कारों के, रेंग रही देह शाश्वत पहनावे में से. ताना-बाना नया-नया गढ़ता मन, कुछ बासी से प्रश्न ढहा देते उन्हें हर बार. आदत, जान गए हैं कि नहीं निभाए जा रहे नियत व्यापार बोरियत खूब समझती है अपनी वज़ह. मन, जुआठे के साथ नहीं लगा, पर चल रहा लगातार अटपट. चिंतन अपने चरम पर पहुंचकर शून्यता का लुआठा दिखा देता है, तर्कों से घृणा हो रही-एक लंबी उबकाई सी. सोच में कोई नए जलजले नहीं; और शायद ऐसी कोई कालजयी जरूरत भी नहीं. विचलित-विलगित आगत से..आगम आहट का कल्पित सौंदर्य.. भी बासी लगेगा जैसे. 'सापेक्ष' शब्द ने 'सत्य की खोज' का आकर्षण ध्वस्त कर दिया है. नए मूल्यों की खोज जैसी कोई बात नहीं; सुविधानुसार नामकरण कुछ आदतों का. बड़बड़ाना, एक जरूरत है, मुर्दे को ईर्ष्या है इस अदा से. सरकार, सर्कस की सीटी बजा रही, टिकट गिरे हैं जमीं पर. चंचल चित्त--ठीक है, ह...
[गोरखपुर से सीधे दिल्ली आया तो बहुत कुछ झेलना पड़ा था..उन्हीं दिनों में लिखी थी एक कविता अनगढ़ सी..एक शाम का सच है ये..मै भीड़-भाड़ वाली सड़क से चला जा रहा हूँ और क्या-क्या सोचते जा रहा हूँ..लोग टकरा रहे हैं और ठीक-ठाक बके जा रहे हैं.... ] चलूँ; जरा नुक्कड़ तक, पलट लूं, कुछ मैगजीन ही | फोन पर पापा से मैंने पूछा : और कोई नयी बात पापा ..? "..बस संघर्ष है...तुम बताओ..." "ठीक हूँ..." 'ठीक से चलो ---सामने देखकर..!' पापा का संघर्ष ...अभी समाप्त नहीं हुआ.. 'समय' को अब उनकी कदर करनी चाहिए. समय ही गलत चल रहा है.. 'अरे..! कैसे चल रहा है..?--स्कूटर वाला आँखें निकाले चला गया.' ' सोचता हूँ; कितना कठिन समय है, अभाव, परिस्थिति, लक्ष्य... 'हुंह; सोचने भी नहीं देते, सब मुझसे ही टकराते हैं और घूरते भी मुझे ही हैं..' समय कम है और समय की मांग ज्यादा, जल्दी करना होगा..! 'ओफ्फो..! सबको जल्दी है..कहाँ धकेल दिया..समय होता तो बोलता भी मुझे ही...' इतने संघर्षों में मेहनत के बाद भी.. आशा तो है पर..डर लगता है... जान...
टिप्पणियाँ