माँ
सच है माँ के कर्तव्य कभी ख़तम नहीं होते.. !
डा. अनुराग जी की पोस्ट यथार्थ का क्रास वेरिफिकेशन पढ़ते हुए एक बेहद अच्छी कविता याद आ गयी जो मैंने कभी कादम्बिनी में पढी थी और जिसे राहुल राजेश जी ने लिखा है.आज वही आप सभी के समक्ष रख रहा हूँ...!!!
माँ
"जहाँ ठहर जाए
वहीं घर..
जिसे छू ले
जिसे छू ले
वही तुलसी..
जिसे पुकार दे
जिसे पुकार दे
वही बेटा..
जब जागे
जब जागे
तब बिहान..
जब पूजे
जब पूजे
तब नदी..
जब निरखे
जब निरखे
तब समुद्र.."
चित्र साभार :गूगल

टिप्पणियाँ
शुक्रिया .........
सी मिल सकता है ..
सुन्दर कविता .. आभार ..
सुन्दर...श्रीश भाई...
"सोचता हूँ पूछूं माँ से एक एक दिन
कितना मुश्किल है आसान होना "
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ये तो बहुत ही आसान पहेली है?
धरती का हर बाशिंदा महफ़ूज़ रहे, खुशहाल रहे।
तूने भी तो,
जिया होगा
अपना बचपन...
अपना यौवन .
या जन्म से ही,
बन गयी थी तू 'माँ' ?
एक अलसाई रात,
तेरे आँचल में,
तब भी एक निरंतर रात्री.
जिसमें मेरे लिए,
केवल...
चाँद और रौशनी,
दुविधा तो तब भी थी,
तुझे,
जब किनारे में पड़ी,
मेरी पतंग,
संभाल के,
अपने दिल में रख लेती थी.
...क्या तू भी उडी थी माँ?
इन लकडियों में,
तेरे जड़ होने का,
आभास है,
जो तू ऊँचे नीच रास्तों पे,
ले जाती थी.
लकडियाँ गीली थी,
और उनके निचे,
तू जलती थी.
पर उसका धुआं,
मेरे आँख में,
न लगा कभी.
मेरी भूख,
और
तेरे जलने में,
...एक सम्बन्ध था,
तू भी तो,
कभी रही होगी
"गीली लकडी".
या अपने,
"कल्पना-वृक्ष" से,
झड़कर सदेव के लिए,
तूने ग्रहण किया एक,
शुष्क रूप?
मेरी प्रथम पाठशाला,
"अ" "आ"....
....तेरे कभी,
साम्यवाद,
महिला उद्धार,
या
"मांग की लोच" के विचार आये थे ?
तू तो मैं ही हूँ,
पर मैं कभी न बन सका ...
"तू"
क्या कभी,
कोई तू भी हुआ था?
मेरे हर पूजा का सार....
क्या कभी कोई तेरे लिए,
पूजनीय था?
इतना ही पूजनीय ?
दिन के खेल से थक के,
तेरे पसीने को
किसीने तो पोछा होगा न?
तेरे आँसू मेरे पास से,
होकर गुज़रते हैं,
और उनमें तू ,
सांस लेती है,
क्या कभी,
आंसुओं के होने का,
एहसास,
तेरी साँसों से भी हुआ था?
क्या तेरे जीवन को,
किसीने,
"बेतरतीब"
होने से बचाया था?
क्या तेरे भी न होने से,
अपने लिए कोई "भूख" ही पकाता था?
क्या तूने जिया है,
माँ के अलावा कोई जीवन?
Ab ja ke dil ko sukoon hai.
(pichle comment se chooth gaya tha)