संदेश

आवारगी

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  आवारगी; पर लिखने का मन है, आज, माफ़ करियेगा.मुझे 'आवारा' शब्द से इतनी ज्यादा नफ़रत रही है, कि मेरे पापाजी को जब मुझसे अधिकतम विरोध जताना होता है, तो वे इसी शब्द का प्रयोग करते हैं. और वे जानते हैं, कि मै तिलमिला पडूंगा..

मिथिलेश भैया के "बिस्मिल" अखबार के लिए मैंने अपना पहला लेख लिखा...

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"हर दौर के बिस्मिल को.." बिस्मिल...यानि क्रांतिदूत..हर दौर को जरूरत होती है बिस्मिल की, क्योकि हर दौर में तब्दीलियाँ अपनी जगह बनाने को आतुर होती हैं और पुराने खंडहर अपनी जगह पर कुंडली मार बैठे होते हैं.

हो ना ,, ना होना

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आकर्षण,कोई भी .. जब मुझे खींचता है.. और यदि मै जानता हूँ; इसे पाना सरल नहीं.... मै कठिन प्रयास करता हूँ.   अभीष्ट पा लेने पर दो बातें हो जाती है: एक तो प्राप्ति को छूता हूँ तो वह वैसा नहीं लगता, जैसा दूर से था..! ....और दुसरे ,  उस आकर्षण से गुजरते हुए, स्वयं को एक कठिन, विकासशील जाल में पाता हूँ, जो अनुभव को आकर्षण की प्रथम कल्पना से एकदम अलग कर देता है.   इसके उलट ; यदि किसी परेशानी में आ पड़ता हूँ, आकस्मिक , तो उससे पार पाते हुए लगता है जैसे  मै मुक्त हो रहा होऊं किसी अनदिखे जाल से .   समझ नहीं आता ; ...क्या होना ,कुछ ना होना है   ...और ना कुछ होना ही,कुछ हो जाना है.........??? #श्रीश पाठक प्रखर 

पहले पन्ने की कविता

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लिखूं,  कुछ डायरी के पृष्ठों पर  कुछ घना-सघन,  जो घटा हो..मन में या तन से इतर.  लिखूं, पत्तों का सूखना  या आँगन का रीतना   कांव-कांव और बरगद की छांव शहर का गांव में दबे-पांव आना या गाँव का शहर के किनारे समाना या, लिखूं माँ का साल दर साल बुढाना, कमजोर नज़र और स्वेटर का बुनते जाना, मेरी शरीर पर चर्बी की परत का चढ़ना   मन के बटुए का खाली होते जाना.  ................................................................................ ................................................................................ ................................................................................ इस डायरी के पृष्ठों पर समानांतर रेखाएं हैं;  जीवन तो खुदा हुआ है , बर-बस इसपर.  अब, और इतर क्या लिखना..! #श्रीश पाठक प्रखर 

रिश्ता

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"साँझ ढले,पंछी चले,निज-निज रैन बसेरा। मनवा कहे,ऐसे रहे,माँ-बेटे का फेरा। होत सवेरा उड़ जाती वो,जाती लाने चारा। दिनभर चुगकर वो लाती है,खायेगा उसका प्यारा। आसमान में उड़-फिरकर वो ;साँझ को आ जाए डेरा..मनवा कहे....! रोज सवेरे उड़ जाती  माँ , छोड़  घास   का घेरा। दिनभर अकेला वो डर जाता,देख शाम घनेरा। पल में सुनकर वो खुश हो जाए, आती माँ का टेरा.. मनवा कहे .....!!" #श्रीश पाठक प्रखर 

खता

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".........खता तबसे शुरू हो गई बेसाख्ता; ......अजमाना जबसे जनाब ने शुरू किया......." #श्रीश पाठक प्रखर 

तेरा ना होना

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".....आज इक बार फिर तेरा    ना होना नागवार गुजरा है.   वीरानी शाम में आशिक हवाओं ने मुझे बदनाम समझा है. पुराने जख्म अब पककर,मलहम से हाथ चाहेंगे. सनम आ जाए महफ़िल में ,दुआं दिन रत मांगेंगे. अभी इक दर्द का लश्कर सीने के पर उतरा है ! कहूँ साजिश सितारों की या फिर बेदर्द वक़्त ही है सनम ने ख़ुद मेरे लिए जुदाई की तय सजा की है. कशमकश हो गई बेदम,हवाओं पर आसमां का पहरा है !!" #श्रीश पाठक प्रखर