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स्वतंत्रता व सुव्यवस्था के नोट्स : श्रीश

मन में कई विचार गोते लगा रहे हैं. पर सबसे पहलेश्याम जीद्वारा लिखे गए वे शब्द और वाक्य जिन्हें मैंने अपनी डायरी में लिख लिए हैं... ये लाइनें शून्यकाल में मेरा बहुत साथ देंगी. और ये पंक्तियाँ सूत्रवाक्य हैं..कई कुंजियों का समवेत छल्ला है..उन्हें देखें:

"जब चर्चा चल ही पड़ी है तो लगते हाथ बहुत पहले" सारिका" में पढ़ी धर्म की वह परिभाषा भी उद्दृत कर दूं जो पांच दशकों के बाद भी मुझे भूली नहीं .."अनासक्त विवेक से समष्टि कल्याण के हेतु किया जाने वाला कोई भी कर्म धर्म है."
"यह मन कैसे बनता है ? निश्चित रूप से क्रिया प्रतिक्रिया (stimulus and response cycle) चक्रों से मन निर्मित होता है."

"वृत्त की आवृति =वृति"
"उन्होनें आदतों के जमावड़े को कुण्डलिनी कहा है"

"जितनी लघु, संकुचित और सीमित जीवन-दृष्टि; उतनी ही तेज़ी से भागता है समय.. जीवन-दृष्टि जितनी व्यापक होती चली जाती है; समय की गति भी उसी अनुपात में धीमी होती चली जाती है .. जब दृष्टि अस्तित्व की व्यापकता को पा लेती है..तब समय ठहर जाता है.. विलीन हो जाता है ..आदमी के गणित के हजारों लाखों प…

साहित्य विभाजनकारी नहीं हो सकता, जब भी होगा जोड़ेगा.

साहित्य विभाजनकारी नहीं हो सकता, जब भी होगा जोड़ेगा.साहित्य शब्द कानों में पड़ते ही सहित वाला अर्थ दिमाग में आने लग जाता है. साहित्य में सहित का भाव है. कितना सटीक शब्द है. साहित्य शब्द में ही इसका उद्देश्य रोपित है. साहित्य विभाजनकारी नहीं हो सकता, जब भी होगा जोड़ेगा. इतना हर लिखने वाले को स्पष्ट होना चाहिए. इसीलिये जरुरी नहीं हर लेखन साहित्य में शामिल हो. मेरी दिक्कत ये है कि कुछ लोग साहित्य मतलब महज कविता कहानी समझते हैं. और इसे भी वो 'सब कुछ समझ सकने के गुरुर के साथ' समझते हैं-मतलब ये कि उन्हें सही समझाना कठिन भी है. कविता मतलब भी वो कुछ यूँ समझते हैं कि एक लिखने की शैली जिसमें ख़ास रिदम और एक पैटर्न की पुनरावृत्ति होती है जिसकी विषयवस्तु अमूमन प्रकृति अथवा नारी की खूबसूरती होती है. कहानी मतलब भी कि एक नायक होगा..एक नायिका होगी. ज़माने से लड़ेंगे-भिड़ेंगे-फिर जीत ही जायेंगे.एक सीधी सी बात समझनी चाहिए कि किसी भी विषय-विशेष में उतनी ही गहराई और आयाम होते हैं जितनी कि ज़िंदगी की जटिलताएं गहरी होती हैं. इस तरह कोई भी विषय विशेष का महत्त्व किसी भी के सापेक्ष कमतर या अधिकतर नहीं होता. म…

बुद्ध पूर्णिमा

'अपने लिए स्वयं दीप बन जाना' 

और 

परस्पर विरोधी राहों में से 'मध्यम मार्ग' का चयन ; 

महात्मा बुद्ध की इस दो सीख ने अब तक मेरा बहुत ही मार्गदर्शन किया है l

जातियों से इतर मानवता में विश्वास रखने वाले और करुणा भाव से ओत-प्रोत इस महाभाव को
उनके बुद्धत्व दिवस एवं निर्वाण दिवस पर स्मरण करना प्रासंगिक है और सर्वदा रहेगा l

#ShreeshUvach

Grateful to Birthday Wishes :)

आह्लादित मन बहुधा कुछ विशेष प्रतिक्रिया नहीं कर पाता l
इस वर्ष, वर्षगाँठ पे आप सभी का असीमित प्यार-दुलार मिला l
नसीहतें भी मिलीं, कुछ ने झिझोड़ा भी-हो कहाँ तुम?
याद सभी आते हैं और जानता हूँ याद सभी करते हैं l
जीवन में बस इतना ही समेटा भी जा सकता है...हासिल इतना ही है ज़िंदगी का...सो खुश हूँ..और हमेशा की तरह तैयार भी l
जन्मदिन हर वर्ष अपने समय पर दुन्दुभि बजाते आते हैं कि तैयार हो जाओ कुछ और नए उमंगों के लिए l
मन पे गुजरा हर साल यों तो चिपका ही होता है, फिर भी नए मौके अतीत को एक तरफ रख भविष्य की हिलोर को थामने के लिए वर्तमान को तैयार कर ही देते हैं l
एक बार फिर आप सबका शुक्रिया..! थैंक्स फेसबुक ...smile emoticon