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अब, जबकि..!

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सोचा, आज उस पर एक कविता लिखूंगा, पर.....कैसे..?


जबकि, 
मेरे दिमाग में केवल तुम हो, 
कविता के लिए शब्द कैसे खोजूं ..?


जबकि, मेरे दिल में 
सिर्फ तुम्हारा रंग छाया है 
कविता को कोई और रंग कैसे दे दूं..?  


जबकि मेरे तन-मन में  
तुम्हारा ही संगीत समाया है 
कविता को कोई और लय कैसे दे दूं..?  


अब, जबकि, मैंने जीवन में  
बस तुम्हारा ही प्यार बसाया है, 
कविता को कोई और विषय कैसे दे दूं..?

#श्रीश पाठक प्रखर


चित्र साभार:गूगल

नयी पौध की नीम के पेड़ पर अर्द्धनारीश्वर चर्चा

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अंतरतम से और सर्वत्र से संवाद अल्केमिस्ट में वृद्ध पाउलो कोएलो भी चाहते हैं और जवान चेतन भगत भी. one night @call centre में चेतन भगत inner call की बात करते हैं. सरल इंग्लिश में लिखी गयी किताब, प्रवाहमयी. पर ९०% किताब, व्यक्ति के भौतिक विलासों पर है तो अचानक अंतिम १०% भाग में लेखक को inner call की याद आ जाती है. शायद लेखक कहना चाहता है, कि इस inner call को ignore करके कुछ भी संभव नहीं है, कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता. पर ये इतना अचानक घटता है उपन्यास में कि नाटकीय लगने लगता है. वैसे विषयवस्तु की दृष्टि से पुरी किताब साधारण लग रही होती है कि वह नाटकीय मोड़ आता है और पढ़ना निष्फल नहीं जाता.
राही मासूम रजा की 'नीम का पेड़' और नागार्जुन की 'नयी पौध' भी पढ़ी. 'नयी पौध' स्वतंत्रता पश्चात, स्वाभाविक परिवर्तनों का बिगुल बजाते युवाओं पर देसी ढंग से प्रकाश डालता है, नागार्जुन की अपनी खास शैली, जबरदस्त चमत्कृत करती है और खासा रोचक है. पर यही 'नयी पौध' रजा के 'नीम के पेड़' से उसकी छांह छीन लेती है, जबकि आजादी के कुछ दशक हो चुके हैं. रजा की प्रशंसा करूँगा क…

क्या हम कभी इतने 'सभ्य' नहीं रहे कि 'हाशिया' ही ना रहे...?

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आज दीवाली है, खासा अकेला हूँ. सोचता हूँ, ये दीवाली, किनके लिए है, किनके लिए नहीं. एक लड़की जो फुलझड़ियॉ खरीद रही है, दूसरी बेच रही है, एक को 'खुशी' शायद खरीद लेने पर भी ना मिले, और दूसरी को भी 'खुशी' शायद बेच लेने पर भी ना मिले. हम कमरे साफ कर रहे हैं, चीजें जो काम की नहीं, पुरानी हैं..फेक रहें हैं, वे कुछ लोग जो गली, मोहल्ले, शहर के हाशिये पे और साथ-साथ मुकद्दर के हाशिये पे भी नंगे खड़े रहते हैं, उन्हीं चीजों को पहन रहे हैं, थैले में भर रहे हैं...ऐसे देखो तो कबाड़ा कुछ भी नहीं होता...ये भी सापेक्षिक है. २०,००० हो तो एक कोर्स की कोचिंग हो जाए, पढ़ा पेपर में कि--२०,००० के पटाखे भी आ रहे हैं, बाज़ार में. दीवाली, होली तो जैसे कोई और बैठा कहीं से खेल रहा हो जैसे..हम पटाखे, बंदूख, पिचकारी, रंग बनकर उछल रहे सभी...
अभी शाम को मैंने एक सिटी स्कूल के बगल बहती नाली से सटे बैठे दो छोटे बच्चे देखे--भाई-बहन. नंग-धड़ंग, काली-मैली, शर्ट-हाफ-पैंट, गंदी-फटी फ्राक--मिट्टी के दिए बना रहे थे वे. 'नगर-पथ' की मिट्टी से और नाली के पानी से ----इनकी दीवाली....? इनके पटाखे कौन फोड़ रहा ह…

"सर्वत्र" से संवाद

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JNU में राजनीतिक जागरूकता जबरदस्त है, ऐसा शायद ही भारत में किसी और कैम्पस में हो...तो इसमे खास बात क्या है..? खास ये है कि यहाँ आपको अपने व्यक्तिगत राजनीतिक अधिकारों के लिए जरूरी नहीं कि आप किसी खास ग्रुप से हों, परंपरा से यह विकसित हो गया है और मै इसे करीब से देख रहा हूँ. पर एक दूसरी बात जो मुझे बेहद पीड़ा पहुँचती है वो ये कि जो छात्र-संगठन यहाँ राजनीति करते हैं वो अक्सर असली मुद्दों को गड्ड--मड्ड कर देते हैं ठीक राष्ट्रीय राजनीतिक दलों की तरह. कैम्पस अंतर्राष्ट्रीय मामलों की तरफ बहुत संवेदनशील है (कम से कम चर्चा,पम्फलेट के स्तर पर), पर कई बार स्थानीय व राष्ट्रिय मुद्दे दरकिनार कर देते हैं. इसी प्रवृत्ति पर चुटकी लेते हुए, मेरे एक मित्र ने कहा कि- " people who are talking about America they don't know what is happening in Munirika.." मुनिरिका, JNU के पास की एक मार्केट है. खैर; अब पाउलो कोएलो की बात करते हैं. अल्केमिस्ट की कहानी कुल पांच से छः पेज में आ सकती है. पर कहानी कहना ही उद्देश्य नहीं लेखक का. लेखक को पाठक से आत्मिक संवाद करना है. ALCHEMIST--पूरी पुस्तक बोल क…

दीया, तुम जलना..

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दीवाली पर अभी तुरत लिखी एक छोटी कविता.
जो जीवन देकर उजाला देता है, उससे की मैंने विनती....




दीया, तुम जलना..  
अंतरतम का मालिन्य मिटाना 
विद्युत-स्फूर्त ले आना.  
दीया, तुम जलना.  


जलना तुम मंदिर-मंदिर 
हर गांव नगर में जलना 
ऊंच-नीच का भेद ना करना 
हर चौखट तुम जलना  




बूढ़ी आँखों में तुम जलना 
उलझी रातों में तुम जलना 
अवसाद मिटाना हर चहरे का 
हर आँगन तुम खिलना  
दिया तुम जलना

चित्र साभार: गूगल

#श्रीश पाठक प्रखर

कैसा लगता है, जब फुटपाथ पर कोई लड़की सिगरेट बेचती है...?

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सचमुच एक दृश्य देखा 
मैंने दिल्ली के फुटपाथ 
पर...और फिर....




कैसा लगता है, जब फुटपाथ पर कोई लड़की सिगरेट बेचती है...? 

पर यहाँ लड़की अपनी झोपड़ी के पास मजबूत धागों में गुटखे व चट्टे पर 
सिगरेट, पान, सलाई सजा रही है; 

अपने पैरों से लाचार भाई के लिए...! 

उसे चौका बर्तन करने जाना है, 
शाम हो गयी है, उसे दौड़-दौड़ कई काम निपटाने हैं, 
उसका छोटा चल नहीं सकता.
हाथ सलामत हैं उसके पर, 
इबादत के लिए, खाने के लिए,
पान लगाने के लिए और
कभी कभी रात के सन्नाटों में बहते उसके आँसू पोछने के लिए....  

संस्कार,ऊंची अट्टालिकाओं, पैनी शिक्षा, मंहगे कपड़ों के मोहताज नहीं, 

ये माता-पिता से विरासत में मिलते हैं.... 
'और भी' मिला है उन दोनों को 'विरासत' में.  

जाने कब कैसे मर गयी माँ और दे गयी दीदी को काम, जाने कितने घरों के....!
गुटखा खाते, बेचते बाप ने गुटखे से पक्की यारी निभायी, 
बड़ों की तरह धोखा नहीं दिया....बेवफाई नहीं की. 
जान दे दी और कर दी अपनी अगली पीढ़ी भी गुटखे को दान.  


आज दीदी रो रही है. 
नहीं, नहीं, भूखे नहीं है हम, 
अब हमने शाख के ऊंचे आम तोड़ना सीख लिया है. 
दीदी रो रही है...बस आज वो देख पायीं.. 
म…

निकल आते हैं आंसू हंसते-हंसते,ये किस गम की कसक है हर खुशी में .

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निदा फाज़ली की नज्में कुछ इस तरह चर्चित हैं कि अपने आस-पास साधारण, सामान्य हर तरह का आदमी उनकी पंक्तियाँ कह रहा होता है पर अक्सर सुनाने वाले और सुनने वाले दोनों को ही पता नहीं होता कि ये निदा फाज़ली की लाइनें हैं...निदा फाज़ली उन चुनिन्दा लोगों में शामिल हैं जिन्होंने इस पाप-कल्चर के युग में भी युवाओं को नज्में गुनगुनाने पर मजबूर कर दिया है.. आज उनके जन्मदिवस पर निदा फाज़ली साहब की ही कुछ लाइनें ब्लॉग पर डाल रहा हूँ, जिन्हें मेरे अनन्य मित्र श्री अंशुमाली ने अरसों पहले मेरी डायरी पर लिखा था...  


" निकल आते हैं आंसू हंसते-हंसते,
ये किस गम की कसक है हर खुशी में 
गुजर जाती है यूं ही उम्र सारी;  
किसी को ढूँढते है हम किसी में.  
बहुत मुश्किल है बंजारा मिजाजी;  
सलीका चाहिए आवारगी में." 


" फासला नज़रों का धोखा भी हो सकता है,
चाँद जब चमकें तो जरा हाथ बढाकर देखो.."  


आदरणीय निदा फाज़ली साहब को जन्मदिन की अनगिन शुभकामनायें......

चीनी खाने और गन्ना बोकर, चूसने में अंतर है, नायपाल जी.

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जे.एन. यू में मेरी पहली anchoring जबरदस्त सराही गयी, माँ शारदा को प्रणाम. प्रो. घोष की रसिकता पर मैंने यूं चुटकी ली : "..बदन होता है, बूढा, दिल की फितरत कब बदलती है, पुराना कूकर क्या सीटी बजाना छोड़ देता है....." (संपत सरल) खूब compliments मिले. मुझसे जुड़े सभी प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष को मेरा नमन, धन्यवाद. मुझे जो एक तरह की cultural भूख लगती रहती है, इसने संतृप्त किया. निष्क्रिय नहीं रहा इन दिनों. Research, Blogging आदि में उलझा रहा और बाकि समयों में newspaper और magazines ब्लोगिंग में कुछ लोग बड़े ही अच्छे मिले हैं, सीखने के लिए बहुत कुछ, वाकई...इधर साहित्यिक किताबें भी खूब पढी. अभी कुछ देर पहले ख़त्म की, वी. यस. नायपाल की 'A Wounded Civilization'. मानता हूँ, कुछ देर बाद यह पुस्तक मेरे लिए सहनीय नहीं रही. किसी देश को महज कुछ यात्राओं से कैसे जाना जा सकता है..? सर नायपाल ने कुछ मनपसंद किताबें चुनीं भारतीय लेखकों की, जिनमे उन्हें दोमुहें तर्क मिले; गांधी का व्यक्तिगत जीवन व सार्वजनिक जीवन चुना ( मानो, गांधी की गलतियाँ, भारत की गलतियाँ हों...) और कुछ विशेष मानक …

ये ब्लोगिंग में लाठी-बल्लम...?

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ये इतना घमासान क्यूँ....? किसको साबित करना चाहते हैं..? किसके  बरक्श....? ये कौनसी मिसाल आप सब बना रहे हैं..? सब, सब पर फिकरे कस रहे हैं. आये थे, कुछ बांटने, ब्लॉग लिखने, कुछ सीखने, कुछ बताने,...., ये क्या करने लगे...? ये बार-बार ब्लोगिंग को गोधरा बनाने पर क्यूँ आमादा हैं, कुछ लोग. कोई ऐसी तो नयी बात नहीं कह रहे...धर्मों से जुड़ी ऐसी घृणित बातें तो पहले भी विकृत मन वाले कह गए हैं, इसमे इतना श्रम क्यूँ लगा रहे हैं...शर्म नहीं आती जब एक ब्लॉगर अपनी प्रोफाइल ही डीलीट कर लेता है. सबसे आधुनिक माने जाने वाले माध्यम पर भी आखिरकार हम एक डेमोक्रेटिक स्पेस नहीं ही रच पाए. क्या कहेगा कोई, "ये हिन्दी वाले....".  मैंने देखा है, ज्यादातर ब्लॉगर खासा अनुभवी हैं, जीवन-व्यापार का उन्हें खासा अनुभव है, उम्रदराज भी हैं, पर टिप्पणी पर टिप्पणी बस दिए जा रहे हैं. आप युद्ध नहीं कर सकते यहाँ, उसके लिए, शायद हमने गली,कूंचे,मोहल्ले, सड़क और सीमायें बनायीं है..मन नहीं भरा..यार ब्लोगिंग वाला स्पेस तो बस बहस के लिए रहने दो. गाली-गलौज के लिए जगहों की कमी है क्या..?

आस्था को दिल की प्यारी सी कोठरी में संजो…

ek naya template

थोड़ी मेहनत की, एक नया टेम्पलेट

शायद फ़िक्र हो..

स्मार्ट दूकानदार, मुस्कुराकर,
अठन्नी वापस नहीं करता.. 
शायद फ़िक्र हो.. भिखमंगों की.


नये कपड़ों की जरूरत 
लगातार बनी रहती है 
शायद फ़िक्र हो हमें, अधनंगों की. 


चीजें कुछ फैशन के लिहाज से
पुरानी पड़ जाती हैं, 
इमारतों को फ़िक्र हो जैसे, नर-शूकरों की.  


मासूम बच्चे, उनके कुत्ते,
नहलाते हैं; 
शायद फ़िक्र हो उन्हें, अभागों की.


वही नारे फिर-फिर  
दुहराते हैं, नेता. 
शायद फ़िक्र हो, कुछ वादों की.  


मुद्दों पर लोग खामोश, 
बने रहते हैं, शायद 
फ़िक्र हो पत्रकारों की.  


और हाँ, अब गलत कहना 
छोड़ दिया लोगों ने  
शायद फ़िक्र हो, अख़बारों की.

#श्रीश पाठक प्रखर

पुनर्पाठ...तुम्हारा..

(१)  

मै; तुम्हे शिद्दत से चाहता हूँ, 

पर तुम नहीं.  

आत्मविश्वास ने समाधान किया:

'सफल हो जाने पर कौन नहीं चाहेगा मुझे,,,?

"....पर उन्ही लोगो में पाकर क्या मै चाह सकूँगा ..तब..तुम्हे..? 



(२) 

तुमने जब टटोला 

तो मैंने महसूस किया.. 

अपना अस्तित्व  

सर पर हाथ प्यार से फेरा तुमने 

तो. महसूस किया मैंने अपना उन्नत माथा.. 

"पर मै जानता हूँ; तुम्हे पाने के लिए सीना चौड़ा होना चाहिए..."

#श्रीश पाठक प्रखर

गाँधी मेरी नजरों से..

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गाँधी जी जैसा रीयल परसन अपने जन्मदिन पर आपको निष्क्रिय कैसे रहने दे सकता है..? जितना पढ़्ता जाता हूँ गाँधी जी को उतना ही प्रभावित होता जाता हूँ. गाँधी और मै. मेरे लिये गाँधी जी सम्भवत: सबसे पहले सामने आये दो माध्यमों से, पहला -रूपये की नोट से, दूसरा एक लोकप्रिय भजन- रघुपति राघव राजाराम...फिर पता चला इन्हें बापू भी कहते हैं; मोहन भी, इन्होने आज़ादी दिलवाई और सत्य, अहिंसा का पाठ पढ़ाया. बापू की लाठी और चश्मा एक बिम्ब बनाते रहे. इसमे चरखा बाद में जुड़ गया.पहले जाना कि यह भी एक महापुरूष है, बाकि कई महापुरुषों की तरह. और तो ये उनमे कमजोर ही दिखते हैं. सदा सच बोलते हैं और हाँ पढ़ाई में कोई तीस मारखां नहीं थे. ये बात बहुत राहत पहुँचाती थी. पहला महापुरुष जो संकोची था, अध्ययन में सामान्य था. मतलब ये कि --बचपन में सोचता था --ओह तो, महापुरुष बना जा सकता है, कोई राम या कृष्णजी की तरह, पूत के पांव पालने में ही नहीं दिखाने हैं. फिर गाँधी जी का 'हरिश्चंद्र नाटक' वाला प्रकरण और फिर उनकी आत्मकथा का पढ़ना.. मोहनदास का झूठ बोलना, पिताजी से पत्र लिखकर क्षमा याचना करना. पिता-पुत्र की आँखों से झर-झ…