October 27, 2009

अब, जबकि..!


सोचा, आज उस पर एक कविता लिखूंगा, पर.....कैसे..?  


जबकि, 
मेरे दिमाग में केवल तुम हो, 
कविता के लिए शब्द कैसे खोजूं ..?


जबकि, मेरे दिल में 
सिर्फ तुम्हारा रंग छाया है 
कविता को कोई और रंग कैसे दे दूं..?  


जबकि मेरे तन-मन में  
तुम्हारा ही संगीत समाया है 
कविता को कोई और लय कैसे दे दूं..?  


अब, जबकि, मैंने जीवन में  
बस तुम्हारा ही प्यार बसाया है, 
कविता को कोई और विषय कैसे दे दूं..?


चित्र साभार:गूगल

22 comments:

महफूज़ अली ने कहा…

अब, जबकि, मैंने जीवन में
बस तुम्हारा ही प्यार बसाया है,
कविता को कोई और विषय कैसे दे दूं..?

sach! kaise koi aur vishay de den.....

bahut achchci lagi yeh kavita....

khoobsoorat lafzon ke saath ek sashakt rachna....

Nirmla Kapila ने कहा…

शायद इस *तुम* ने ही कविता को जन्म दिया है। इसके बिना कविता की कल्पना और सुन्दरता कही ही नहीं जा सकती। ये *तुम* अपने आप शब्द ख्ोज लेती है जैसे आपकी कविता ने खोज लिये
जबकि,
मेरे दिमाग में केवल तुम हो,
कविता के लिए शब्द कैसे खोजूं ..?
इस से अच्छा विषय भी शायद कोई नहीं हो सकता। प्यार अपने आप मे एक संपूर्णता है । बहुत सुन्दर कविता है बधाई और शुभकामनायें

वाणी गीत ने कहा…

हर कविता में कही न कही कोई न कोई तुम छिपा रहता है ...हकीकत हो या कल्पना ...अब और कविता को क्या चाहिए ..!!

जी.के. अवधिया ने कहा…

तुम ही तुम हो मेरे जीवन में ...

sada ने कहा…

अब, जबकि, मैंने जीवन में
बस तुम्हारा ही प्यार बसाया है,
कविता को कोई और विषय कैसे दे दूं..?

बहुत सुन्दर कविता है बधाई और शुभकामनायें !

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

कविता के लिए अब इससे बेहतर शब्द , रंग, लय की जरुरत भी क्या है ?
बहुत सुन्दर लिखा है !

सागर ने कहा…

सारगर्भित है की कविता में उनका जिक्र होगा... पर कविता यहीं तक नहीं ठहरेगी यह भी उतना ही बड़ा सत्य है... किन्तु पूरे आलोक में तो जो आपने कहा है वो प्रतिबिंबित तो होगा ही... शिरीष जी... 'अब जबकि' शब्द पढ़ा तो चौंक पड़ा था... कुछ दिनों पहले मैंने इसका प्रयोग किया था... शब्द कम थे मेरे पास... किन्तु अब आपने किया है तो... बोझ उतरता रहा...

Arvind Mishra ने कहा…

कविता में ही कविता की खोज की कशिश ,अरे वाह !

दिगम्बर नासवा ने कहा…

श्रीश जी .......... उनका होना अपने आप में इक कविता है ......... किसी शब्द की क्या जरूरत ........
बहुत खूबसूरत कविता की रचना है ..........

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने कहा…

कवि-कर्म की चरम स्थिति है, यह |

जब साधन[कविता] और साध्य[काव्य-विषय यानि ''तुम''] एकमेक होने लगें |

यहाँ भावना सदैव भाषा से आगे चलती है |

अतः भावनाओं का शुक्रिया ...

रश्मि प्रभा... ने कहा…

यही 'तुम'तो कविता है,बहुत अच्छी

कंचन सिंह चौहान ने कहा…

हम्म्म बात तो सच है...जो अंदर होगा वही तो बाहर आयेगा...!

बहुत खूब...!

शरद कोकास ने कहा…

ऐसी ही स्थिति मे तो कविता निकलती है भाई !!

Apoorv ने कहा…

भई श्रीश जी कविता तो इसी रिक्तता से जन्मती है...यह शब्दहीनता की ध्वनि, रंगहीनता का कैनवस और लयहीनता का संगीत ही तो कविता के स्रजनभूमि बनता है..
और इस विषयही्नता की समृद्धि पर सारे बिषयों की सम्पदा निसार है..बधाई!!!

चच्चा टिप्पू सिंह ने कहा…

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शुभेच्छू
चच्चा टिप्पू सिंह

अर्शिया ने कहा…

ये लजिए आपने उसे दिल से सोचा और इतनी प्यारी कविता बन गयी।
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परा मनोविज्ञान-अलौकिक बातों का विज्ञान।
ओबामा जी, 70 डॉलर में लादेन से निपटिए।

Meenu Khare ने कहा…

बहुत सुन्दर कविता है बधाई और शुभकामनायें !

पदमजा शर्मा ने कहा…

श्रीश जी
प्यार की नदी सदा बहती रहती है . वह अपना रास्ता आप तलाश ही लेती है .

प्रकाश गोविन्द ने कहा…

जबकि मेरे तन-मन में
तुम्हारा ही संगीत समाया है
कविता को कोई और लय कैसे दे दूं..


बहुत सुन्दर कविता है

बधाई और शुभकामनायें

Harkirat Haqeer ने कहा…

श्रीश जी हमें तो रश्क हो रहा है उसके नसीब पर .....!!

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

बेहद खुबसूरत तलाश करती हुई यह रचना बहुत बहुत पसंद आई ...

चंदन कुमार झा ने कहा…

जो प्रेम हमारे मन में बसा है वही तो कविता है………………रचना बहुत अच्छी लगी ।

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