अठन्नी वापस नहीं करता..
शायद फ़िक्र हो.. भिखमंगों की.
नये कपड़ों की जरूरत
लगातार बनी रहती है
शायद फ़िक्र हो हमें, अधनंगों की.
चीजें कुछ फैशन के लिहाज से
पुरानी पड़ जाती हैं,
इमारतों को फ़िक्र हो जैसे, नर-शूकरों की.
मासूम बच्चे, उनके कुत्ते,
नहलाते हैं;
शायद फ़िक्र हो उन्हें, अभागों की.
वही नारे फिर-फिर
दुहराते हैं, नेता.
शायद फ़िक्र हो, कुछ वादों की.
मुद्दों पर लोग खामोश,
बने रहते हैं, शायद
फ़िक्र हो पत्रकारों की.
और हाँ, अब गलत कहना
छोड़ दिया लोगों ने
शायद फ़िक्र हो, अख़बारों की.




9 comments:
हर फिक्र में फिक्र है विचारों की ...!!
अब बताने को पोस्ट करते हैं..
कि पोस्ट नहीं दे पायेंगे आज...
शायद उनको फिक्र हो कमेंटों की...
हा हा!! मजाक किया है.
dost aapki kavti bahut acchi lagi ,
चलिए किसी भी बहाने से ही सही , कम से कम दूसरों को भी कुछ मिल तो रहा ही है
वह, उड़न तश्तरी जी की लाईन तो कविता में जोड़ने का मन हो रहा है.....शुक्रिया आप सभी का..
इन दिनों सबको एक बीमारी है ..चुप्पियों की .समझदारी भरी चुप्पी हो या उदासीनता की चुप्पी..
फ़िक्र ही बाकी बचा है जी अब ..सही लिखा है आपने शुक्रिया
kabhi-kabhi loktantra me fikra wajib hai. achchhi kavita hai. likhate rahiye badhai.
achchha laga. badhai.
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