October 07, 2009

शायद फ़िक्र हो..



स्मार्ट दूकानदार, मुस्कुराकर,
अठन्नी वापस नहीं करता.. 
शायद फ़िक्र हो.. भिखमंगों की.

नये कपड़ों की जरूरत 
लगातार बनी रहती है 
शायद फ़िक्र हो हमें, अधनंगों की. 


चीजें कुछ फैशन के लिहाज से
पुरानी पड़ जाती हैं, 
इमारतों को फ़िक्र हो जैसे, नर-शूकरों की.  


मासूम बच्चे, उनके कुत्ते,
नहलाते हैं; 
शायद फ़िक्र हो उन्हें, अभागों की.


वही नारे फिर-फिर  
दुहराते हैं, नेता. 
शायद फ़िक्र हो, कुछ वादों की.  


मुद्दों पर लोग खामोश, 
बने रहते हैं, शायद 
फ़िक्र हो पत्रकारों की.  


और हाँ, अब गलत कहना 
छोड़ दिया लोगों ने  
शायद फ़िक्र हो, अख़बारों की.

9 comments:

वाणी गीत ने कहा…

हर फिक्र में फिक्र है विचारों की ...!!

Udan Tashtari ने कहा…

अब बताने को पोस्ट करते हैं..
कि पोस्ट नहीं दे पायेंगे आज...

शायद उनको फिक्र हो कमेंटों की...

हा हा!! मजाक किया है.

rahul ने कहा…

dost aapki kavti bahut acchi lagi ,

प्रतिमा ने कहा…

चलिए किसी भी बहाने से ही सही , कम से कम दूसरों को भी कुछ मिल तो रहा ही है

श्रीश पाठक 'प्रखर' ने कहा…

वह, उड़न तश्तरी जी की लाईन तो कविता में जोड़ने का मन हो रहा है.....शुक्रिया आप सभी का..

डॉ .अनुराग ने कहा…

इन दिनों सबको एक बीमारी है ..चुप्पियों की .समझदारी भरी चुप्पी हो या उदासीनता की चुप्पी..

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

फ़िक्र ही बाकी बचा है जी अब ..सही लिखा है आपने शुक्रिया

बेनामी ने कहा…

kabhi-kabhi loktantra me fikra wajib hai. achchhi kavita hai. likhate rahiye badhai.

अभिनव उपाध्याय ने कहा…

achchha laga. badhai.

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