मिथिलेश भैया के "बिस्मिल" अखबार के लिए मैंने अपना पहला लेख लिखा...


"हर दौर के बिस्मिल को.."

बिस्मिल...यानि क्रांतिदूत..हर दौर को जरूरत होती है बिस्मिल की, क्योकि हर दौर में तब्दीलियाँ अपनी जगह बनाने को आतुर होती हैं और पुराने खंडहर अपनी जगह पर कुंडली मार बैठे होते हैं.


परिवर्तन का बिगुल छेड़ बिस्मिल चले जाते हैं और पीढियां कुछ लकीरों को बार-बार पीटने लगती हैं ये मानकर की ये अंतिम सत्य हैं और समाज का भला बस ऐसे ही हो सकता है. पर हर दौर के बिस्मिल को देखना होगा कि समय का यह नया रंग किस ढंग का है, यह बाकि रंगों से कितना अलग है और कितना सामयिक व प्रासंगिक. उस नए रंग की पवित्रता चुनने की समझदारी और उसके कच्चेपन को पहचान, उसमे अतीत की परिपक्वता घोल, समाज के समक्ष परोसने की जिम्मेदारी निभानी होगी ताकि समाज हर समय में महान बना रहे. उस बिस्मिल को नए बिस्मिल बनाने का गुरुतर उत्तरदायित्व भी निभाते रहना होगा. जो युवा होगा बिस्मिल बस वही बन पायेगा. तन का युवा हो न हो पर मन का युवा होना होगा. अपनी धरोहर की पहचान और नवीनता के प्रति आकर्षण, युवापन की कसौटी होगी और उसमे अपनी मौलिकता मिलाने का जरूरी साहस अपेक्षित है. बिस्मिल बन पाने की प्रक्रिया स्व की ईमानदार पड़ताल से शुरू होगी. पड़ताल अपने इतिहास की भी करनी होगी और अपने वर्तमान की भी. संस्कार व परम्पराएँ, रूढियां ना बन जाये चौकस रहना पड़ेगा बिस्मिल को. 





.... शायद पचास-साठ सालों में हम इतना लोकतान्त्रिक स्पेस नहीं गढ़ पाए है कि किसी भीं विषय पर खुलकर बहस हो सके. यहाँ बिस्मिल को सचेत रहना होगा.
जसवंत सिंह एक किताब में भारत-विभाजन की पड़ताल करते है और देश के दोनों मुख्य दल अस्वाभाविक सा व्यवहार करते है. क्या सही है क्या गलत है, यह एक बात है पर किसी भी प्रकार की बहस की गुन्जाइस को ख़तम करने की कोशिश करना खतरनाक है. शायद पचास-साठ सालों में हम इतना लोकतान्त्रिक स्पेस नहीं गढ़ पाए है कि किसी भीं विषय पर खुलकर बहस हो सके. यहाँ बिस्मिल को सचेत रहना होगा. आधुनिकता का ये मतलब नहीं हैं कि हर नयी चीज अपनाने योग्य है पर प्रयोग करने की आज़ादी नहीं मिटनी चाहिए. ग्लोबलाइजेशन से भागकर हम विकल्पों पर भी कैसे विचार कर सकते है? नयी चुनौतियाँ तो ये सुअवसर भी देती है कि आप अपनी मौलिकता से नए विकल्प गढ़ लें. ऐसे नवीन अविष्कार ही हमारी नए दौर में हमारी पहचान होंगे, जो हमारी अटूट जिजीविषा के जीवंत प्रतीक होंगे. हर दौर के बिस्मिल की तरह इस दौर के बिस्मिलों को भी अपनी जिम्मेदारी पहचाननी होगी और भविष्य के सुनहरे इतिहास के लिए एक सजग, प्रखर और सुदृढ़ वर्तमान की नींव सतत रखनी होगी.


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इसीकी तो प्रतीक्षा थी!

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