तुम....?
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मै बुलाता हूँ तुम्हे,
हहाकर मिलता हूँ,
भर लेता हूँ, तुम्हे बाँहों में.
तुम अपनी एक फीकी हंसी में
रंग भरने का प्रयास करते हो.
जूझती जिंदगी में अचानक मिली ,
तुम्हारी जीत पर नाचता हूँ,
और करता हूँ, तुम्हारी ताली की प्रतीक्षा.
मुझे खुश-मिजाज कहते हैं, लोग
क्या मुझे, फड़कता आलिंगन और ताली नहीं चाहिए.....?
मर जाऊँगा एक दिन, तब तुम..
औपचारिक आगमन में ,
मुझे ये श्रद्धांजलि दोगे:
" बड़ी गर्मजोशी से मिलता था.."
मेरी मरी हड्डियों में , फिर एक सिहरन होगी..... !!!
#श्रीश पाठक प्रखर
चित्र: गूगल इमेज से -http://blog.cold-comfort.org/wp-content/uploads/2009/06/shake-hands.jpg
टिप्पणियाँ
खडा होगा कोई,
यादों की कापी के
कुछ फटे पन्ने सहेजे
क्योकि तुम्हारे नाम के
कुछ अक्षर
उन पन्नों में अब भी
बचे रह गए हैं...
आज तक
कक्षा आठ में सुना
तुम्हारा गाया भजन..
"जाऊं कहाँ तजि चरण तुम्हारे.."
गाते हुए..
क्योकि
औपचारिकताएं
मृत्यु की आधिकारिक
अभिव्यक्ति है,
और तुम्हारे गीत
तुम्हें शाश्वत रखने
का माध्यम..
मुझे क्षमा
करना मित्र
मैं जीवित लोगो को
श्रद्धांजलि नहीं देता...||
और फिर संभवतः भवितव्य के भी..
क्षण-क्षण घटती परिवर्तन की उस भाव-वेळी की
तुम वह गुरुतर शाखा हो मित्र..
कि तुमसे औपचारिकताएं लजाती हैं, कुछ कह नहीं पाती.."
मित्रवर, मुझे बस आपकी यही तरल, प्रगाढ़ स्नेह की आवश्यकता है और रहेगी .....मेरी यह विनम्र आशा बारम्बार लहलहा उठती है क्योकि मै कभी तुम्हारी ओर से निराश नहीं हुआ....
Sushant.