"...मुझमे तुम कितनी हो..?''

"...मुझमे तुम कितनी हो..?'' 


हर आहट, वो सरसराहट लगती है,  
जैसे डाल गया हो डाकिया; चिट्ठी  
दरवाजे के नीचे से.  
अब, हर आहट निराश करती है. 
हर महीने टुकड़ों में मिलने आती रही तुम 
देती दस्तक सरसराहटों से .  


सारी सरसराहटों से पूरी आहट कभी ना बना सके मै. 


तुम्हारे शब्दों से बिम्ब उकेरता मै,  
तुम्हे देख पाने के लिए...कागज पर कूंची फिराना जरूरी होता जा रहा है.  


कूंची जितनी यानी उमर तुम्हारी. तुम शब्दों में, तुम कूंची में. मुझमे तुम कितनी हो..? तुम में मै कहाँ हूँ....?

#श्रीश पाठक प्रखर

टिप्पणियाँ

वाणी गीत ने कहा…
तुम शब्दों में, तुम कूंची में. मुझमे तुम कितनी हो..? तुम में मै कहाँ हूँ....?
बड़ी उलझन है..उलझन जल्दी सुलझे..बहुत शुभकामनायें..!!
तुम शब्दों में, तुम कूंची में. मुझमे तुम कितनी हो..? तुम में मै कहाँ हूँ.
लाजवाब अभिव्यक्ति है शुभकामनायें
तुम शब्दों में, तुम कूंची में. मुझमे तुम कितनी हो..? तुम में मै कहाँ हूँ.
लाजवाब अभिव्यक्ति है शुभकामनायें
kabhi usase bhi puchha karo

तुम शब्दों में, तुम कूंची में. मुझमे तुम कितनी हो..? तुम में मै कहाँ हूँ....? badhai
सदा ने कहा…
बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द रचना, बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

लेकॉनिक टिप्पणी का अभियोग ........ऐसा है क्या....? प्रेरणा : आदरणीय ज्ञानदत्त जी...

तितर-बितर मन : एक बड़बड़ाहट

क्या हम कभी इतने 'सभ्य' नहीं रहे कि 'हाशिया' ही ना रहे...?