“ सहज..2010..”

“ सहज..2010..”


नए साल पर लिखना चाहिए कुछ..इतना तो बनता ही है..यार..!
2009 जा चुका है. कहाँ कुछ चला जाता है..? कुछ नहीं जाता...सब कुछ यहीं रहता है..चेहरे पे, नसों मे, बहता रहता है...मेरी प्रतिक्रियाएँ बताती हैं मेरी हालत..। कुछ देखने-टोकने की आदत जाती नहीं..क्या करूँ..? गुजरा साल, हर साल की तरह कुछ और सीख दे गया. मसलन; अपनी अभिनय-क्षमता निखारते रहो. लोगों को यथार्थ भी मिलावटी चाहिए. एक आदमी मे वाकई देखो कितने और भी आदमी झूलते रहते हैं..अपनी आँखों को दिल-दिमाग से सटाकर रखना दोस्त..गच्चा खा जाओगे..।
ब्लागिरी मतलब..अपने ideas हाट पे लगाना..शायद. हम धीरे-धीरे नुमाइशी होते रहे..लोग nice-nice करते रहे.ब्लागिरी पे क्या कहना—कुछ जिंदा से लोग आपके पन्ने पलट सकते हैं...इतना कम है क्या..? इसमें इतना साहित्य-सेवा जितना कुछ नही है..ज्यादा सेंटी बनने की जरूरत नही है...! बिना दायित्व के भी लिखने दिया करो यार कहीं...!
नए साल से उम्मीदें.........तो गुजरे साल से कम नही है पर depend करता है कि अपने-आप से कितनी उम्मीदें बची हुई हैं..। पापा की आवाज—अपने आप को सम्हाल लो , बहुत है..! वाह...कितने समझदार हैं वकील लोग. कोर्ट मे इंटरकास्ट लव-मैरिज कराते हैं..और घर पे ब्लड की purity पर आख्यान देते हैं...!
जोड़-घटा कर चीजें तय करना चाहता हूँ..क्या करना है..नए साल मे..! क्या नहीं करना है, इसे कभी सोचना नहीं पड़ा ..होते रहता है..आवारगी का क्या हिसाब-किताब..! “..तुझमे रब दिखता है..यारा मै क्या करूँ..!”

नया साल अभी अपने बाल सँवारे ही था कि मुलाक़ात हुई उनसे जो फुरसत मे/से, बड़ों-बड़ों की मौज ले लेते हैं...फ़ुरसतिया जी...! कितनी जँचती है आपके चेहरे पर आपकी मुस्कान..और बेपरवाही( कोई भ्रम ना पालें..). आप मे कई विशेषतायें हैं जो आपको सबसे अलग कर देती हैं..! आप ब्लागिरी के इतिहास-पुरुषों मे से हैं..सो इनसे उड़ा नही जा सकता..हाँ, साथ थोड़ी देर उड़ सकते हैं. वरिष्ठ हैं..तो वरिष्ठों की जमकर मौज ले सकते हैं/लेते ही हैं. 3G मोबाइल-internet enabled तो..कहीं से भी-किसी पर बरस सकते हैं/ बरसते ही हैं. सर्वशक्तिमान-शक्तिशाली..। सबसे ज्यादा reference देने लायक पोस्टें आप सिरजते हैं..एकदम फॉर्मूला मार्का. ब्लागिरी-पोलिटिक्स से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नही बस हाथ धुलते रहते हैं अक्सर..:)
सोचिए अगर फ़ुरसतिया नही होते ब्लोगजगत मे तो फिर क्या होता..मौज-पंथ किसी पेन की सूखी स्याही मे या किसी के पेट मे ही दम तोड़ देता । आभारी हूँ आपके दर्शन हुए..मन खिल-खिल सा गया. प्र-फुल्लित..फूल के कुप्पा..:)
सागर साहब भी तशरीफ़ लाये. आँखों मे इतनी लहरें...कैसे सम्हलते/ सम्हालते हैं साहब. गोर्की याद आए यार. सपाट बयानी..आवाज मीठी-महीन पर होशियार रहें कमजोर दिल वाले....विनम्र बेबाकी आपको हिला सकती हैं..। अपनी रचनाओं से दिल पे अंगुलियाँ फेरने की आदत पड़ गई है जनाब को. फ़ुरसतिया जी और सागर साहब के साथ झूठे ही ब्लागिरी के दशा-दिशा पर थोड़ी बात होने लगी..ना हमें किसी निष्कर्ष की तलाश थी..ना इसकी चिंता ही. यह प्रतीक्षित मुलाक़ात खुशगँवार रही..कहीं-कुछ चमत्कारिक सा नही रहा तो सो सजोने लायक भी रही ये मुलाक़ात. आभारी हूँ...फिर-फिर आइएगा..आगे से भोजन की व्यवस्था भी रहेगी...:) गहरी साँस ने कहा- आभासी माध्यम इतना आभासी कहाँ रहा अब...धन्यवाद अनूप जी और सागर साहब..!

नया साल इंसाफ माँगता है, गुजरे कई साल के घिसट-पिसट का. इस साल हर क्षण सहज रहने/होने का अभ्यास करना चाहूँगा. ऐश्वर्या राय/बच्चन का एक इंटरव्यू याद आता है—“महत्वपूर्ण होना अच्छा है..अच्छा होना और भी महत्वपूर्ण है..”
इंडिया टुडे कहता है..बीता साल पुनरोदय का रहा..
किनका...?
भारत अब smart हो चला है. 91 मे बचा-खुचा 67 टन सोना गिरवी रख दिया था हमने और 2009 मे 200 टन सोना खरीद लिया हमने आईएमएफ़ से. शाबाश. ठंड से पर रामहरख मर गया, पिछले महीने उसकी इकलौती बेटी का इकलौता जेवर बिक गया..ससुराल की नाक तब भी जाती रही. कोपेनहेगेन मे हमारी सफलता ये कि हम अपनी हेकड़ी जता पाये..Thanks China. तुम सीमा पर थोड़ा और उत्पात मचाये रख सकते हो. दलाई लामा को रज़ाई ओढ़ाएंगे हम आखिर अपनी संप्रभुता भी है कोई चीज. शर्म-अल शेख मे जो हुआ, ठीकी हुआ आखिर बड़े भाई हैं हम पाकिस्तान के..क्ंता-म्ंता तो खिलाएंगे ना..बोलो..। नैनो एक फिसड्डी कार साबित हुई है.कोई मीडिया वाला नही लिखता इसे. टाटा कब किसे कहाँ क्या finance कर दे..! हाकी की स्टिक टेढ़ी होती जा रही पर कुछ की पगड़ी नही ढीली हो रही. धोनी खेल पुरस्कार लेने नही पहुँचते.. घर-घर मे दिखने वाला ऐड की शूटिंग भी तो थी उसी दिन. सेंसेक्स स्थिर हो चला है अब..क्या फरक पड़ता है मीडिया के लिए कि मै किलो भर चीनी नही खरीद पा रहा. अख़बार वालों के लिए अब महँगाई सनसनीखेज नही. दो उम्दा फिल्में आती हैं पा और थ्री इडियट्स जिसमें मीडिया-कार्यप्रणाली और सिस्टम के status quo पर प्रहार है. मिडियायी ब्लागर तिलमिला पड़ते हैं..मुझे टिप्पणी खर्चने का मन नही होता.
आशा है नए साल मे पोगा-पंथी चलती रहेगी. क्लिष्ट शब्दों का सहज/साधिकार प्रयोग करने वाले क्लिष्ट शब्दों का विरोध/व्यापार जारी रखेंगे. मौज वाली पोस्टों पर टिप्पणियाँ उमड़ती रहेंगी. मुझे विनम्र रहना चाहिए. सहज..!
“ सहज..2010..” 

(चित्र साभार:गूगल)  
18 टिप्पणियां

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

वो भूंकते कुत्ते...

सड़क

लंबे लाल पहाड़