जिंदगी वाया 615

(नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से जे.एन.यू. जाने के लिए डी.टी.सी. बस जाती है, ६१५ नंबर की. यह मिंटो रोड (पिन कोड-११०००१) से चलकर पूर्वांचल होस्टल (पिन कोड-११००६७) तक जाती है. कनाट प्लेस, इंडिया गेट, सरोजिनी मार्केट होते हुए ये बस फिर जे.एन.यू.होस्टल पहुँच जाती है. ऐसा कई बार हुआ कि यह छोटा सा सफर पूरा करते हुए पढ़ाई का अपना पूरा सफर याद आने लगता है. ये सफर एक कान्वेंट स्कूल, शिशु मंदिर , गोरखपुर विश्वविद्यालय होते हुए जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय तक अब आ पहुंचा है. ६१५ कभी झूम के चलती है, कभी जाम में फस जाती है. बिलकुल ज़िंदगी की तरह. इसमें खूब भीड़ होती है . सफर में जाने कितने मिले. पर सबको कहाँ एक ही मंजिल पर रुकना होता है..! ये ६१५ ना अक्सर रेड सिग्नल पर रुक जाती है..पर कभी-कभी रेड होने के एकदम पहले ही निकल जाती. ज़िंदगी में भी ऐसे वाकये तो आये ही जब हमने खतरे की घंटी बजने से पहले ही लगाम अपने हाथ में ले ली हो..!)






नई  दिल्ली रेलवे स्टेशन से ६१५ को आजकल पकड़ना आसान नही. कंस्ट्रक्सन वर्क  चल रहे हैं तो कुछ समझ में नही आता कि कहाँ खड़े रहें तो बस मिल जायेगी. आज सोचता हूँ तो लगता है शुरू में पापाजी को भी बड़ी दुविधा हुई होगी कहाँ पढ़ायें बेटे को . घर का पहला बच्चा , अभी छोटा भी है ठीक से तीन साल भी नही. १९८७-८८  में बच्चे को स्कूल भेजने की औसत उम्र (मध्यमवर्गीय परिवार में) ४-५ साल तो होती होगी. मकान मालिक की बेटी इन्डियन कान्वेंट में पढ़ती है तो उसी में पढ़ाना ठीक होगा. पापाजी के मुताबिक शुरू के एक-दो साल तो बच्चा स्कूल जाना सीख ले बस.

कुछ बेहद धुंधली तस्वीरें याद है मुझको..आप शायद ना मानें ..पर मान लीजिये..सबको याद होती हैं. ये यादें एक रेशमी महीन धागे जैसी  होती हैं. इनमें समय गाँठ पे  गाँठ लगाये जाता है. कुछ गांठें चुभती हैं, कुछ्को बार-बार छूनेका मन होता है..गांठें भी तो रेशम की ही होती हैं न..इसलिए. अगर इन गाठों का कोई एक सिरा खुल जाता है, या फिर कोई खोल देता है ना फिर याद आने लग जाती है कई ढेर सारी यादें, बातें..उस ज़माने की महक भी . तो यूँ ही मुझे भी याद आती हैं वें तस्वीरे..धुधली-धुधली. वे तस्वीरे रंगीन हो जाती हैं जब इस बस की खिड़की से किसी स्कूल जाते छोटे से बच्चे को देखता हूँ अपनी थोड़ी सी बड़ी बहन के साथ. दीदियां  कुछ खास बड़ी नही होती पर उस वक़्त और फिर तबसे हमेशा वो कितनी बड़ी लगती हैं  ना. उन दीदी के साथ सड़क पार करना याद आता है..बस और कुछ नही. सड़क पार करना मुश्किल होता है ना. मुश्किल चीजें याद रह जाती हैं. सड़कें ज्यादातर वन वे होती थीं. लोग एक -दुसरे से गुत्थम-गुत्थम चलते थे..हाल-चाल होती रहती थी. आज सड़कें कई तरह की हैं..सो लोग रफ्तार में हैं..लाल बत्ती काम ना करे तो लोग बिलकुल ना रुकें..! सड़कें जितनी ही चौड़ी हुई हैं लोगों के पास उतना ही वक़्त कम हुआ है.
 


(...जारी )

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