अजीब सी उधेड़बुन ...

अजीब सी उधेड़बुन मची रहती है ज़ेहन में. लगता है जैसे कितना कुछ करना हो और कितना कम हो पा रहा हो. सीखता तो रोज ही कुछ न कुछ हूँ ....न ...न ...ये ज़िंदगी रोज ही कुछ न कुछ सीखाती रहती है. क्या होगा सब कुछ सीखकर. क्या होगा ज्यादातर जानकर.....! शायद ये उधेड़बुन मिट जाए... पर ऐसा होता नही. 

थोड़ी जानकारी और ज्यादा के लिए प्रेरित करती है...ज्यादा जानकारी और ज्यादा के लिए हिलोर मारती है....हम बूंद ही बने रहते हैं सामने विशाल सागर दिखता रहता है. हम बूंदों के विभिन्न रंग हो सकते हैं होते ही हैं हमारे सबके दृष्टिकोण भिन्न-भिन्न...! किन्तु मूल स्वरुप में हम रहते हैं बूंद ही. मै नियतिवादी या निराशावादी हो रहा हूँ क्या जब मै स्वयम कों बूंद से बड़ा नही समझ रहा हूँ. पर मै यों ही नही कह रहा ...!

आज तक किसी भी विषय पर मै पूरी तरह संतुष्ट नही रहा...मैंने किसी एक विषय पर बहुतेरे शोध किये, लोगों से पूछ-ताछ की...पर अंत तक कोई ना कोई प्रश्न उभरता रहा और वह अनुत्तरित ही रहा. कई बार लगा....उपलब्धि ये नए-नए प्रश्न ही रहे जिनकी प्रारंभ  में कल्पना भी नही हो सकती थी. जानना जैसे यह ही रहा हो कि हर स्तर पर कुछ जानना शेष है. मनुष्य की सबसे बड़ी बीमारी जिज्ञासा है. इसके मूल में शायद डर है अपनी सुरक्षा का. इस जानने की सतत प्रक्रिया में उसने अन्यान्य डर समाप्त करते हुए विकास की इतनी सीढ़ियाँ निर्मित भी कीं और उन्हें क्रमशः पार भी करता आ रहा है. किन्तु यदि इसके मूल में महज डर होता...तो यह यात्रा इतनी अधिक लंबी ना होती कदाचित. डर समाप्त होते ही वह चैन की बंसी बजाता....! पर ऐसा हुआ नही. तो माना जाय जिज्ञासा मानव की मूलभूत चेतना का गुण है. वह प्रतिपल जानने कों बाध्य है. 

इसे यों कहूँ ...मानव अपना अस्तित्व टटोलता रहता है.....छूता रहता है स्वयं कों.....क्यों कि शायद सामने मृत्यु का डर है. ये 'डर' फिर आ गया. और ये सबसे बड़ा डर है. मनुष्य ने इसका अपवाद नही देखा. प्रकृति में सततता तो है पर नवीनता के रूप में है...स्थायित्व नही है. कुछ भी चिर नही है; चर है. इस परिणति कों जान लेने के बाद जिज्ञासा क्यू है कुछ भी जानने की. 

कुछ उत्तर है लगातार पर बिना नए प्रश्नों के नही हैं........................................................!!!

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

लेकॉनिक टिप्पणी का अभियोग ........ऐसा है क्या....? प्रेरणा : आदरणीय ज्ञानदत्त जी...

तितर-बितर मन : एक बड़बड़ाहट

क्या हम कभी इतने 'सभ्य' नहीं रहे कि 'हाशिया' ही ना रहे...?