देश परिवार समाज : एक विमर्श

....नवोत्पल(http://navotpal.wall.fm/forum/topic/2?&page=1) पर हुई एक पुरानी चर्चा को यहाँ रख रहा हूँ, इसमें श्याम जी ने बड़े करीने से कुछ चीजें रखी हैं, शायद मित्रों को पसंद आये...!



अंकित ............The Real Scholar Aug 14 '10
Message #1
सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद हैदिल पे रखकर हाथ कहिये  देश क्या आजाद है...?


प्रश्न तो कई दशक पुराना है ...पर उत्तर आज तक किसी ने नहीं दिया .......क्या इस पर नावोत्पल में कुछ चर्चा करना उचित होगा?

Shyam Juneja Aug 15 '10
Message #2
इस महत्वपूर्ण प्रश्न पर चर्चा मैं एक शिवसूत्र से करना चाहूँगा .."धी वशात सत्व सिद्धि.. सिद्ध स्वतंत्र भाव.."हमारे यहाँ गायत्री मन्त्र में भी "धी" की ही मांग की गई है ..पंजाब में "धी" शब्द का प्रयोग बेटी के लिए किया जाता रहा है.. शायद कहीं कहीं आज भी प्रचलित है ..और शायद स्त्री के सम्मान में कही गई एक शब्द की सबसे सुन्दर कविता है यह "धी" ..क्या है धी ? कृष्ण ने गीता में जिसे "व्यवसायात्मिका बुद्धि" कहा है..कृष्णमूर्ती इसे "सजगता" कहते हैं ... आम बोल चाल में हम इसे विवेक कहते हैं.. जब चर्चा चल ही पड़ी है तो लगते हाथ बहुत पहले" सारिका" में पढ़ी धर्म की वह परिभाषा भी उद्दृत कर दूं जो पांच दशकों के बाद भी मुझे भूली नहीं .."अनासक्त विवेक से समष्टि कल्याण के हेतु किया जाने वाला कोई भी कर्म धर्म है " यह सारी भूमिका इसलिए क्योंकि स्वतंत्रता को समझ पाना ही कोई इतना आसान नहीं है.. स्वाद लेना तो बहुत दूर की बात है.. दूसरी बात है "सत्व की सिद्धि की" धी वश में हो तब कहीं सत्व की सिद्धि हो पाती है जब तक सत्व सिद्ध नहीं होता तब तक स्वतंत्रता नहीं .. सत्व सिद्धि का अर्थ है व्यर्थता से मुक्त हो पाना ..बोझ से मुक्ति ..पल्ले रिज़क न बनदे पंछी ते दरवेश ...क्रमश

अंकित ............The Real Scholar Aug 15 '10
Message #3
श्याम जी बहुत ही अच्छी तरह से प्रराम्ब किया है आपने ...............कुछ आगे बढाइये बात को ..हम शीघ्र पढना चाहेंगे

Shyam Juneja Aug 21 '10
Message #4
प्रिय अंकित, कोई पल विशेष होता है, जिसमें कोई फ्लो चला आता है.. आपके मन में यदि कोई प्रश्न उठ रहा हो, उसे सामने रखोगे तो शायद चाबी लग जाये.. मेरे पास बना बनाया कुछ भी नहीं होता..स्वतंत्रता के संदर्भ में मुझे लगता है वृति के बारे में थोड़ी बात कर लें .. चलो शुरू से शुरू करते हैं ..एक आदमी क्या है ? एक मन +एक शरीर .. हम पहले मन को लेते हैं.. यह मन कैसे बनता है ? निश्चित रूप से क्रिया प्रतिक्रिया (stimulus and response cycle) चक्रों से मन निर्मित होता है.. शरीर निर्माण की प्रक्रिया भी लगभग यही है.. भूख लगी खाना खाओ.. प्यास लगी पानी पियो ..यह तो हुई शरीर के तल पर क्रिया प्रतिक्रिया का चक्र..मन के तल पर.. किसी ने गाली दी क्रोध आ गया.. और यही वृति है.. वृत्त की आवृति =वृति.. यही हर प्रकार के बंधन के मूल में हैं.. सरल शब्दों में वृति का अर्थ है आदत (sow an action you reap a habit sow a habit you reap your character sow your character you reap your destiny) हिंदुओं ने इस आदत का निरुपन विलक्षण ढंग से किया है उन्होनें आदतों के जमावड़े को कुण्डलिनी कहा है (that which is spiral).. बहुत विलक्षण प्रतीक हैं हमारे पास .. शिव परमात्मा क्यों हैं क्योंकि उन्होनें अपनी कुंडली खोल ली है और इन सर्पों को उन्होनें अपने गले का और जटाओं का श्रृंगार बना लिया है और परम स्वतंत्र यानि मुक्त हो गए हैं अब यह आदतों के सांप उनके वश में हैं ..भगवान विष्णु के संदर्भ में भी यही तथ्य है वे अपनी जागृत कुंडली को शेष नाग के रूप में व्यवहार में लाते हैं .. मैं फिर भटक गया बात वृति की हो रही थी.. महर्षि पतंजलि के योग दर्शन का पहला सूत्र है योगस-चित-वृति-निरोध यानि योग चित की वृतियों का के निरोध का नाम है ..वृतियों का यह निरोध (काबू पाना .. दमन नहीं) ही स्वतंत्रता है ..दुसरे शब्दों में योग यानि युक्त-चित ही स्वतंत्र है ..अब चर्चा चित को लेकर करनी होगी .. चित क्या है ? मन और चित में क्या अंतर है ? बहुत से प्रश्नों की परतें हैं जिनमें उतरना पडेगा यदि स्वतंत्रता को समझना है .. अब आपकी बारी
The Forum post is edited by Shyam Juneja Aug 21 '10

अंकित ............The Real Scholar Aug 21 '10
Message #5
बातें तो गूढ़ है और ऐसा होना अत्यंत स्वाभिक भी है ........परन्तु क्या भूखे पेटों को ये बात समझाई जा सकती है?बिल्कुल स्वतंत्रता दर्शन का ही विषय है क्यूंकि प्राणी के अस्तित्व के लिए तो केवल केवल "आहार भय निद्रा और मैथुन" की आवश्यकता है स्वतंत्रता के बिना भी प्राणी का अस्तित्व संभव है परन्तु क्या दार्शनिक ज्ञान किसी को भी स्वतंत्रता दिला सकता है ?

अब देखिये ना आज तो दो ही तरह के समाज हैं एक तो वो जिनकी ये आवश्यकताएं ही पूर्ण नहीं हो पाती हैं और दुसरे वो जो अपनी तृष्णा के लिए बाकियों की ऐसी आवश्यकताएं पूर्ण नहीं होनेदेते हैं |अब अगर कोई ऐसा व्यक्ति जिसने कभी भी भार पेट भिजन ही ना किया हो , अगर वो शिव मंदिर जाता है तो उसके लिए शिव कुंडली खोल कर गल्मे में डालने वाले "योगेश्वर शिव" नहीं अपितु "भोले बाबा" हैं जो की सापों तक को शरण देते हैं तो उनको भी भोजन देंगे |

भारतीय दर्शन ने इस बात को सबसे अछि तरह से समझा था तभी तो "ना जाने किस रूप में नारायण मिल जाये " भी कहा था परन्तु आज की दशा क्या है ...............आज तो भारतीय समाज भी उसी तरह के दो भागों में विभक्त हो चुका है ....जबकि उससे तो अपेक्षा थी की वो विश्वगुरु बनकर जगत को राह दिखायेगा |

और रबसे बड़ी बात ...........बुरी स्थिति उती दुखदाई नहीं होती है जितनी की गलत दिशा ....आज तो दिशा भी गलत ही है ..........और कोई भी किसी भी तरह की आशा भी नहीं दिख रही है .....


Govind Juneja Aug 22 '10
Message #6
प्रिय अंकित जी, ऐसा नहीं की आशा नहीं है, जब अँधेरा घना हो तो समझो लौ फूटने वाली है प्रकाश की हलकी सी किरण अँधेरे को चीर देगी और ऐसा ही समय अब आना है. शरीर की भूख ना गरीब की मिटती है ना आमिर की बात तो यहाँ मन की चल पड़ी है जिसमें की गरीब लोग ज़्यादा अमीर होते हैं धनवानों से. जब तक हमारी मानसिकता भोग से लिप्त रहेगी हमारे लिए स्वतंत्रता एक स्वप्न ही है. श्री श्याम जी ने जो अपनी टिप्पणी में लिखा है वो एक अनिवार्यता है स्वतंत्रता के लिए."परन्तु क्या दार्शनिक ज्ञान किसी को भी स्वतंत्रता दिला सकता है ?" इसका उत्तर हाँ है स्वतंत्रता केवल इसी से सम्भव है. क्योंकि ज्ञान से निकला हुआ कर्म ही श्रेष्ठ है और वही स्वतंत्रता दिला सकता है.हम अज्ञानी कितने ही प्रयास करलें पर दुःख से मुक्ति का रास्ता बिना ज्ञान के सम्भव नहीं

Govind Juneja Aug 22 '10
Message #7
डॉ प्रताप चौहान (jiva.com), स्वामी रामदेव जी, श्री श्री रविशंकर जी, मुरारी बापू , नरेंद्र मोदी, सुदांशु जी महाराज, स्वामी अनुभवानंद (just be happy.com) ऐसे अनगिनत लोग बहुत सही दिशा में कार्य कर रहे हैं. और इन सबकी प्रेरणा से सही मार्ग हमें मिल सकता है और जीवन को समृद्ध बनाया जा सकता है.

Shyam Juneja Aug 25 '10
Message #8
प्रिय अंकित, स्वतंत्रता को समझना हो तो बहुत गहरे में उतरना होगा ... भूखे पेट आदमिओं को स्वतंत्रता समझाने की कोई जरूरत नहीं होती .. सच्ची भूख अपने आप में इतनी शानदार टीचर है जो या तो स्वतंत्रता के मायने खोल देती है या फिर दुनिया से विदा कर देती है ... यहाँ जो बात खुल रही है वह मेरे जैसे भरपेट या कहें अफारे के मारे गुलाम हो चुकी मानसिकता वाले लोगों के लिए है.. प्रकृति नें समग्र प्राणी जगत के लिए आहार की व्यवस्था कर रखी है...आदमी तो सबसे बुद्धिमान है फिर उसे भूख की समस्या क्यों होनी चाहिए थी? कारण इतना है सभी प्राणी जीने के लिए खाते हैं सिर्फ आदमी है जो खाने के लिए जीता है.. यही परतंत्रता के मूल कारणों में से एक है ऐसा क्यों है ? आदमी खाने के लिए क्यों जीता है ? इस बात की खोज-बीन सतही नहीं हो सकती भीतर तो उतरना होगा ... यदि आप ऊब रहे हैं तो इस चर्चा को यहीं छोड़ देते हैं ..
The Forum post is edited by Shyam Juneja Aug 25 '10

अंकित ............The Real Scholar Aug 25 '10
Message #9
मुझे नहीं लगता है की चर्चायों को कभी भी छोड़ा जाना चाहिए .....अपितु मैं तो यह कहना चाहता था की चर्चा को उस परिणिति तक ले जाना चाहिए की केवल वो बौद्धिक चर्चा ना रह जाये उसका कुछ लाभ भी आम जन को हो | भारतीय संस्कृति में केवल समस्या को पूरी तरह समझने ही नहीं अपितु उसका समाधान समझने की भी परंपरा रही है ....और यह तो बुद्धिजीवियों का कर्तव्य कहा गया है तो परतंत्रता के कारणों को समझना होगा ...आदमी खाने के लिए क्यों जीता है इसको समझना होगा भीतर जाकर ही समझना होगा सतह पर नहीं ........परन्तु उसके बाद रुकना नहीं है .........आदमी जीने के लिए खाना प्रारंभ करे और जीना "सर्वे भवन्तु सुखिनः " के लिए इसके लिए उपाय भी खोजना होगा ..नावोत्पल की चर्चाओं का असर समाज तक होना चाहिए

Shyam Juneja Aug 26 '10
Message #10
प्रिय अंकित आपका मूल प्रश्न है ..क्या देश आजाद है ? वर्तमान दृश्य के परिप्रेक्ष्य में जो कुछ आप महसूस कर रहे हैं ..वहीं से इस प्रश्न नें जन्म लिया है ? प्रश्न जब उठा तो चिंतन तो आपने भी किया होगा ... मैंने भी आपकी तरह ही महसूस किया और मेरे मन में भी यही प्रश्न उठता रहा ..उसी के अनुसार चिंतन भी चला और वहाँ पर मुझे स्वतंत्रता को समझने की जरूरत महसूस हुई .. और यह प्रश्न इतना सरल नहीं था.. इसे हर दृष्टि से खंगालना जरूरी लगा सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक..इत्यादि ...समाज शास्त्र, अर्थ शास्त्र या राजनीती शास्त्र में मेरी कोई अधिक समझ नहीं है अधिक क्या बिलकुल समझ नहीं है ..दर्शन का भी मेरा कोई अध्ययन नहीं है लेकिन जो कुछ जीवन की किताब को पढते देखते समझ में आया वही ब्यान करता हूँ .. खैर आप कहते हैं चर्चा चलनी चाहिए तो वहीं से सूत्र पकड़ते हैं जहां से छोड़ा था... लेकिन नहीं ! अभी आज ही कुछ चला आया है पहले उसे पोस्ट करता हूँ जितनी लघु, संकुचित और सीमित जीवन-दृष्टि; उतनी ही तेज़ी से भागता है समय.. जीवन-दृष्टि जितनी व्यापक होती चली जाती है; समय की गति भी उसी अनुपात में धीमी होती चली जाती है .. जब दृष्टि अस्तित्व की व्यापकता को पा लेती है..तब समय ठहर जाता है.. विलीन हो जाता है ..आदमी के गणित के हजारों लाखों प्रकाश वर्ष मात्र आँख की झपक में बदल जाते हैं .. स्रष्टि और स्रष्टा में भेद समाप्त हो जाता है..वहाँ स्वतंत्रता है ... और यह घटना प्रयत्न साध्य बिलकुल भी नहीं है ...

विस्मय और जिज्ञासा, जीवन-दृष्टि को विकसित करने वाले तत्व ही नहीं हैं; अपितु, यांत्रिकता की यंत्रणा से, किसी सीमा तक बचाए रखने के उपक्रम भी हैं ..  

The Forum post is edited by Shyam Juneja Aug 26 '10

Shyam Juneja Aug 26 '10
Message #11
मैं कुछ उलटे सिरे से बात करने जा रहा हूँ चौंकना नहीं ...कभी परमात्मा के बारे में चिंतन किया है ? क्या है वह? आधुनिक विज्ञान "शुद्ध ऊर्जा" में हुए विस्फोट को जगत की उत्पति का कारण मानता है..लेकिन पमात्मा शुद्ध ऊर्जा भी नहीं है .. वह तो विशुद्ध ज्ञान है .. शायद यह कहना भी गलत है" परमात्मा विशुद्ध ज्ञान का अज्ञान है ..परम बोध की अबोधता है" जिसमें जरा सा यह बोध या ज्ञान की " मैं हूँ " इसे आत्मा में बदल देता है .. मत समझना की केवल साँस लेने वाले प्राणियों में ही आत्मा है जगत में जितना भी पदार्थ जितनी भी ऊर्जा है सब आत्म-वान है .. लेकिन आत्मा जब होने के विस्तार की मांग करता है तब यह चित में बदल जाता है और यह चित जिसे चेतना का केन्द्र भी कह सकते हैं देह धारण करता है यही अहं-भाव है इसके बाद की यात्रा देह के समानांतर, मन के, या कहें, अहंकार की यात्रा है .. जो की चित्रों, ध्वनियों, विचारों की अंतहीन उपद्रवी भीड़ है जो अपने आप को मैं के रूप में महसूस करती रहती है .. एक मैं दुसरे मैं को खाने के लिए सतत संघर्ष में रहता है .. ग्रहों के बनने की भी लगभग यही प्रक्रिया है ... दुसरे को खाने का अर्थ है दुसरे की स्वतंत्रता को बाधित करना ..वही survival of the fittest .. देश और समाज की भी यही स्थिति है .. यानि गुलामी की एक श्रृंखला है जो कही से भी कमजोर होती दिखाई नहीं देती .. यानि पूरी सृष्टि बंधन है .. लेकिन यदि यह सच है तो आदमी में स्वतंत्रता का विचार क्यों और कहाँ से आता है..क्योंकि आदमी की रचना ही इसी उद्देश्य से हुई है ...आदमी एक सम्भावना है बोध की अबोधता में लौटने की just innocence .. क्रमशः

Shyam Juneja Aug 27 '10
Message #12
प्रिय अंकित, आपने कोई हुंकारा नहीं भरा, और स्वतंत्रता के प्रश्न ने मुझे फिर दर्शन के गहन गंभीर गह्वरों में धकेल दिया है .. अद्वैत से द्वैत के स्फुटन में ..कहते हैं जो नहीं कहा जा सकता नहीं कहा जाना चाहिए.. लेकिन.. मुझ जैसे हिरन भी होते हैं दुनिया में.. उसी दिशा में दौड़े चले जाते हैं जिधर से आ रहा होता है बाघ..आह ! शुद्ध ज्ञान और परम अज्ञान में कोई भेद नहीं ..जितना अन्धकार है सृष्टि में उतना ही प्रकाश ... जितनी अच्छाई है उतनी ही बुराई भी है.. यह कुछ ऐसा है जैसे दो जापानी समुराई एक ही आकार प्रकार के बराबर की ताकत वाले किसी अखाड़े में लड रहे हों..लड़ रहे हैं या खेल रहे हैं यह भी नहीं कहा जा सकता .. बस जरा सा फर्क और एक नीचे दूसरा ऊपर ..फिर जरा सा फर्क दूसरा नीचे पहला ऊपर .. अद्वैत अतियों से मुक्त है क्योंकि युक्त है .. द्वैत में अतियों का द्वंद्व है इस जरा से फर्क के साथ ...पता नही मुझे इन प्र्लापित पंक्तियों को इस चर्चा में शामिल होने देना चाहिए या नहीं ,,पर अधिक से अधिक क्या कह लेंगे लोग बुड्डा सठिया गया है .. लेकिन एक निष्कर्ष पर भी आगया हूँ इस दुनिया में कोई भी देश या उसके नागरिक कोई भी स्वतंत्र नहीं है ..कोई सुखी भी नहीं है ..स्वतंत्रता और सुख के छायाभास मात्र है जिन्होनें लोगों को मोहित कर रक्खा है और कुछ नहीं है ..एक बेचारा योगी निकला था स्वतंत्रता और सच्चे सुख की राह में वह भी भटक गया लगता है .. मुझे माफ करना यार जिस उदेश्य को लेकर आपने चर्चा शुरू की थी मैं उससे भटक गया ...स्वतंत्रता एक शब्द है ही ऐसा मेरे जीवन में जिसके मैं सिर्फ सपने देखता रहा हूँ ..

अंकित ............The Real Scholar Aug 27 '10
Message #13
मान लेते हैं कोई स्वतन्त्र नहीं .पर क्या स्वतंत्रता संभव भी नहीं ............रामराज्य कहीं नहीं है पर क्या यह संभव भी नहीं है .............माना की आदर्श स्थिति नहीं है परत्न्तु क्या उस दिशा में प्रयत्न भी नहीं हो सकते हैं ? क्या दो पैरों वाले पशु को मनुष्य बनाया भी नहीं जा सकता है ? क्या जंगल के कानून ही चलते रहेंगे ....अगर हाँ तो फिर हमारे अस्तित्व की आवश्यकता ही क्या है ? और अगर हम की संसार को कुछ अच्छा नहीं कर सकते तो फिर हम हैं ही क्यों? क्या यह समाज और समजिक्ताओं के बंधन केवन अपनी अवश्यक्तऊँ की पूर्ती के लिए हैं ?


और अगर यह है तो हमारे ज्ञानी (अगर हम हैं तो) होने का क्या लाभ या ज्ञान के अस्तित्व का भी क्या लाभ ?

Shyam Juneja Aug 28 '10
Message #14
सापेक्षिक स्वतंत्रता यानि स्वतंत्रता का छायाभास् तो हमेशा से ही सम्भव रहा है .. आप लोहे की जंजीरों की तुलना में शायद सोने की जंजीरों में कुछ अधिक स्वतंत्रता का अनुभव कर लें .. अंग्रेजी हकूमत को मुगलों की हकूमत से बेहतर मान लें या फिर चुने हुए गुंडों की हकूमत को अंग्रेजी हकूमत से बेहतर मान लें, लेकिन, हकूमत तो है.. हालाँकि, इस हकूमत नाम की चीज़ की वास्तव में कोई जरूरत नहीं है ..इसे मात्र काम चलाऊ होना चाहिए था ... लेकिन हम सब इसके इतने आदि हो चुके हैं की बिना हकूमत वाले समाज की कल्पना भी नहीं कर सकते .. मेरी सीमित बुद्धि, ज्ञात मानव इतिहास में जिन दो व्यक्तित्वों को स्वतंत्रता के आसपास अनुभव करती है वे हैं बुद्ध और पतंजलि.. क्रमशः 



Shyam Juneja Aug 28 '10
Message #15
सबसे अच्छी समाज व्यवस्था को अभिव्यक्त करने का लिए.. राम-राज्य कहना भी प्रतीकात्मक है .. .. ऐसी कोई समाज-व्यवस्था उपलब्ध हो चुकी होती तो समग्र मानव समाज ने उसे अंगीकार कर लिया होता.. फिर इस्लाम, समाजवाद, नाजीवाद जैसी हिंसा-प्रतिहिंसा पर आधारित मजहबों और विचारधाराओं के अंकुरण के लिए अवकाश ही नहीं बचता.. हाँ इस युग में, विज्ञान और तकनीक के इस युग में, ऐसी किसी व्यवस्था के अनुसंधान की सम्भावनाएं उजागर हो गई हैं हैं .. एक ऐसा कोई माडल तैयार किया जा सकता है जो जीवन को पूर्णता दे सके .. स्वतंत्रता का अधिकतम आभास दे सके..और सबसे बड़ी बात जो हिंसा-प्रतिहिंसा से मुक्त हो...इस्लाम और समाजवाद मानव-विकास के बहुत साहसपूर्ण प्रयोग थे लेकिन, हिंसा-प्रतिहिंसा पर आधारित होने और करुणा के अभाव में दोनों विफल हो गये.. इस्लाम ने एक प्रकार की जड़ आस्था को अपना आधार बनाया तो समाजवाद ने आस्था के तत्व को ही प्रयोग से अलग कर दिया ...लेकिन अब एक ऐसा प्रयोग होना चाहिए ..क्रमश

Shyam Juneja Aug 28 '10
Message #16
आगे:-जिसमें आज तक के प्रयोगों से जो कुछ सर्वश्रेष्ठ मिला उसका समायोजन हो सके और व्यर्थ का निर्ममता-पूर्वक त्याग किया जा सके ..मिसाल के तोर पर हिंदुओं के पास विश्व की सर्वश्रेष्ठ प्रार्थना है "सर्वे भवन्तु सुखिनं..प्राणी मात्र के प्रति सद्भावना .. वासुदेव कुटुम्बकम " इस्लाम के पास इबादत का सबसे बढ़िया सलीका है .".हाथ मुह धो लो.. जाय-नमाज बिछाओ और प्रार्थना कर लो.". समाजवादियों का यह विचार" जिसके पास जो अतिरिक्त है वह ले लिया जाये जिसे उसकी जरूरत है दे दिया जाये" और" किसी के पास किसी भी सम्पति का व्यक्तिगत अधिकार नहीं" लेकिन "सभी कुछ सभी का" .. ईसाइयत से "do unto others as you want others to do unto you"..यह सब मैं मिसाल के तौर पर लिख रहा हूँ.. विचार तो चिंतको और विशेषज्ञों ने ही करना है .. इस नए मोडल को पारम्परिक व्यक्तिगत परिवार व्यवस्था से मुक्त होना पडेगा .. इसका प्रथम प्रशिक्षण भी फौजी अनुशासन के अंतर्गत होना होगा..एक पूरी की पूरी बंधन मुक्त वैज्ञानिक व्यवस्था जिसमें सादगी, स्वावलंबन, निर्भयता के साथ साथ करुणा, प्रेम और सह-अस्तित्व का विकास हो जिसमें आत्मरक्षा के लिए शस्त्र पर निर्भरता समाप्त .. जिसमें किसी की कर्तव्य-परायणता ही उसके अधिकार को परिभाषित करे .. जिसमें व्यापार और व्यक्तिगत हांनी-लाभ की कोई जगह न हो .. अपनी जवानी से लेकरआज तक ऐसे दिवा-स्वप्न ही देखे हैं और कुछ नहीं कर पाया .. शायद ऐसे ही सपने देखने के लिए संसार में आया था ..

Shreesh Aug 29 '10
Message #17
ओह अंकित जी, श्याम जी एवं गोविन्द जी ने तो क्या शानदार चर्चा छेड़ रखी है...अभी बस मनोयोग से पढ़ रहा हूँ, फिर जो बन पड़ेगा आज ही अपने विचार रखता हूँ.
The Forum post is edited by Shreesh Aug 29 '10

Shreesh Aug 29 '10
Message #18
मन में कई विचार गोते लगा रहे हैं. पर सबसे पहले श्याम जी द्वारा लिखे गए वे शब्द और वाक्य जिन्हें मैंने अपनी डायरी में लिख लिए हैं... ये लाइनें शून्यकाल में मेरा बहुत साथ देंगी. और ये पंक्तियाँ सूत्रवाक्य हैं..कई कुंजियों का समवेत छल्ला है..उन्हें देखें:


"जब चर्चा चल ही पड़ी है तो लगते हाथ बहुत पहले" सारिका" में पढ़ी धर्म की वह परिभाषा भी उद्दृत कर दूं जो पांच दशकों के बाद भी मुझे भूली नहीं .."अनासक्त विवेक से समष्टि कल्याण के हेतु किया जाने वाला कोई भी कर्म धर्म है."

"यह मन कैसे बनता है ? निश्चित रूप से क्रिया प्रतिक्रिया (stimulus and response cycle) चक्रों से मन निर्मित होता है."


"वृत्त की आवृति =वृति"

"उन्होनें आदतों के जमावड़े को कुण्डलिनी कहा है"


"जितनी लघु, संकुचित और सीमित जीवन-दृष्टि; उतनी ही तेज़ी से भागता है समय.. जीवन-दृष्टि जितनी व्यापक होती चली जाती है; समय की गति भी उसी अनुपात में धीमी होती चली जाती है .. जब दृष्टि अस्तित्व की व्यापकता को पा लेती है..तब समय ठहर जाता है.. विलीन हो जाता है ..आदमी के गणित के हजारों लाखों प्रकाश वर्ष मात्र आँख की झपक में बदल जाते हैं .. स्रष्टि और स्रष्टा में भेद समाप्त हो जाता है..वहाँ स्वतंत्रता है ... और यह घटना प्रयत्न साध्य बिलकुल भी नहीं है ... ð

विस्मय और जिज्ञासा, जीवन-दृष्टि को विकसित करने वाले तत्व ही नहीं हैं; अपितु, यांत्रिकता की यंत्रणा से, किसी सीमा तक बचाए रखने के उपक्रम भी हैं .."


अपनी समझ से इनपर चर्चा थोड़ी देर बाद करूँगा, क्योंकि थोड़ा विषयान्तर हो जायेगा. पहले अंकित जी की उठाई गयी चर्चा के मूल मंतव्य, और फिर इस चर्चा के मौजूदा स्वरुप पर सोचता हूँ.

अंकित जी का मूल प्रश्न है: "देश क्या आजाद है..?"

यह प्रश्न उपजता है जब विभिन्न सामजिक-राजनीतिक विडंबनाएं मुंह बाए आम इंसान को खड़े-खड़े निगलने लगती हैं..और जिनपर दारोमदार होता है रहनुमाई का वही जब मुनाफाखोर व्यापारी निकलते हैं. 

श्याम जी , मेरी समझ से अंकित जी देश की , राष्ट्र की और समाज की उस स्वतंत्रता की ओर ईशारा कर रहे हैं जहाँ सामाजिक-राजनीतिक अधिकार की गारंटी की आदर्श व्यवस्था होती है ताकि समाज का वह अंतिम आदमी जो केन्द्र में नही है, वह भी अपना सर्वांगीण विकास कर पाए. 

श्याम जी , अंकित जी राजनैतिक-सामजिक स्वतंत्रता (अपने पूर्ण अर्थों में) की बात कर रहे हैं, और आप आत्मिक स्वतंत्रता की बात कर रहे हैं. जो कई कदम और ऊपर की बात है. यदि आपकी कसौटी पर सोचें फिर तो हर कोई परम आनंदित, संतुलित-प्रफुल्लित होगा: जैसा हमारे ऋषि-मुनियों ने एक व्यवस्था बना रखी थी अथवा कहें सोच रखी थी/आजमा रखी थी. 

श्याम जी आप समस्या के जड़मूल निदान पर बात कर रहे हैं. अंकित जी ने जिन समस्याओं की ओर ईशारा किया है, वे समस्त समस्याएं तब पनपी हैं, जबसे आधुनिक राज्य की आधारशीला रखी गयी,जबसे औद्योगिक क्रांति हुई, जबसे औपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद आया,जबसे नेशन-स्टेट की संकल्पना आयी. इसपर विस्तार से लिखना पड़ेगा. लिखूंगा भी.

श्याम जी, कुछ ऐसी समस्याएं हैं जो वाह्य जगत से/तक उपजी/सीमित हैं. आप "स्वतंत्रता" की व्याख्या कर रहे हैं, जो बिलकुल ही सटीक है. अंकित जी राजनीतिक-सामाजिक स्वतंत्रता' की बात कर रहे हैं, जो सहज अपेक्षित है. 

मै मानता हूँ, कि स्वतंत्रता एक व्यापक शब्द है और इसमे समस्त स्वतंत्रताएं सन्निहित हैं. किन्तु श्याम जी बिना घाव धोवे आप उसका उपचार नहीं कर सकते. यह घाव धुलना समझ लीजिए राजनीति और सामाजिकता के रास्ते होगा. और अंतिम निर्णायक उपचार आत्मिक अवलोकन यानी दर्शन से होगा. 

इतना आसान नही यह. देखिये. गाँधी जी परम आध्यात्मिक थे, दार्शनिक भी थे, गीता साथ रखते थे, आत्मिक रूप से वे संतुष्ट थे. पर राजनीतिक आन्दोलनों का नेतृत्व क्यूँ किया उन्होंने...? क्योंकि जिस आत्मिक स्वतत्रता (इसे परम साक्षी भाव कहने दीजिए) को पाना अभीष्ट है वो एक खास मानसिक अवस्था(परिपक्वता) के बाद अभ्यास से आती है. यह अभ्यास और मानसिक विकास हो सके इसके एक सुव्यवस्था की आवश्यकता है. सुव्यवस्था ; आधुनिक सन्दर्भों में एक पूरी राजनीतिक-सामाजिक आंदोलन में भाग लेकर फिर आदर्श वितरण की ठोस पद्धति निर्मित कर पाना है. इस दुरूह प्रक्रिया को आधुनिक आविष्कारों और उपभोक्तावादी संस्कृति ने और भी जटिल बना दिया है. अब आप द्वीप के किनारे नहीं रहते, जहां बस कुछ सभाएं मिलजुलकर सभी सार्वजानिक समस्याओं का निदान कर लेती थी. अब अमेरिका के बैंक में नकदी घटती है तो मंदी पुरे विश्व में छा जाती है. 

अंकित जी, मुझे ठीक करियेगा, यदि मै भटक रहा होउंगा..मै चाहता हूँ कि पहले विषय स्पष्ट हो जाए. अभी बहुत कुछ कहना बाकी है. इससे पहले मै श्याम जी के और आप सभी के विचार आमंत्रित करता हूँ. 


Shyam Juneja Aug 30 '10
Message #19
प्रिय श्रीश जी, तब तो मूल प्रश्न "सुव्यवस्था" का है.. "स्वतंत्रता" का नही..

Shreesh Aug 30 '10
Message #20
यकीनन श्याम जी; कुछ सम्बंधित अधिकार व स्वतंत्रताएं जो व्यक्ति के विकास के लिए वाह्य अनुकूलताएँ जुटाती हैं ऐसी सुव्यवस्था क्यूँ नही है आज देश में जबकि राजनीतिक रूप से हम ६३ सालों से ज्यादा हो गये स्वतंत्र हुए, संभवतः यह प्रश्न है श्री अंकित जी का..!

Shyam Juneja Aug 30 '10
Message #21
तो इस के कारणों में उतरना होगा जिनमें सबसे ऊपर है बडती हुई जनसंख्या ... मुझे इसका एक उपाय नजर आता है .. इलैक्ट्रोनिक और प्रिंट मीडिया को किसी तरीके से इस मुद्दे पर लगातार लगातार बात करने के लिए बाध्य किया जाय ...और यह बात ऐसी न हो जिसमे कुछ खास लोगो को कुर्सी पर बैठा कर बातचीत करवाई जाती है बल्कि हर आम-ओ- खास (हर धर्म, हर वर्ग, हर पेशे से जुड़े, हर आयु-वर्ग और लिंग के लोग) का एक विशेष रूप से तैयार की गई प्रश्नावली के अंतर्गत साक्षात्कार लिया जाये, ..उन्हें समस्या की गंभीरता से अवगत कराया जाये..उनसे समस्या के समाधान पूछे जायें .. उन्हें जिम्मेदारी का एहसास कराया जाये ...और यह कार्य एक लंबे समय तक चले .. यह मीडिया बहुत ताकतवर उपकरण है इतने आलतू फालतू विचार लोगों के दिल-दिमाग में ठूंसता रहता है.. इससे यह काम क्यों नहीं लिया जाना चाहिए प्रत्यक्षत इस कार्य-प्रणाली से आपको कोई समाधान नहीं मिलेगा.. लेकिन, एक शोर उबलता हुआ शोर जैसा आग लगने पर गूँज उठता है वैसी कोई जाग्रति की लहर आ सकती है .. लोग सोचने के लिए बाध्य हो सकते हैं कि आखिर उनका भविष्य है क्या ? और जब लोक चेतना (मुझे सत्ता और राजनीती शब्द से परहेज़ है) किसी कार्य को करने पर आमादा हो जाये फिर तो कहना ही क्या

Shyam Juneja Aug 30 '10
Message #22
दूसरी सबसे बड़ी समस्या है अनुशासन-हीनता और विकृत-अनुशासन की...मुझे श्रीमती इंदिरा गाँधी के तीन शब्द बहुत प्रिय थे पक्का इरादा, कड़ी मेहनत और अनुशासन (हालाँकि मैं जीवन भर कांग्रेस को उसकी नीतियों के कारण कोसता रहा हूँ) शास्त्री जी के दो शब्द थे संयम-नियम, मोरारजी निर्भयता की बात किया करते थे.. अडवाणी जी भी भय-मुक्त समाज कि बात करते रहे हैं..पता नहीं इन शब्दों को लेकर मीडिया पर कभी कोई चर्चा देखने सुनने को नहीं मिलती.. फूहड़ता जैसे हमारे समाज का गुण-धर्म बन कर रह गई है ..क्रमशः

Shreesh Aug 30 '10
Message #23
अंकित जी, आये नही ..कोई बात नही. हम चर्चा बढ़ाते हैं.


कहाँ से शुरू करूं..? 

सुव्यवस्था. 

सुव्यवस्था का लक्ष्य है कि सभी सुचारू रूप से रहें और सभी अपने ईच्छित लक्ष्य की ओर निर्बाध बढ़ सकें. इस मार्ग में जितना भी हो सकें; अवरोध हटाएँ जाएँ, खासकर वे अवरोध जिनके मूल में भौतिक अभाव हों एवं वे समस्याएं जो परस्पर विभिन्नताओं से उपजी हों.

श्री श्याम जी, अब जबकि आपने यह लिख दिया है :"मुझे सत्ता और राजनीति शब्द से परहेज़ है "

और मै राजनीति का विद्यार्थी हूँ. मै समझता हूँ आपका रोष. पर इसके लिए चाक़ू जिम्मेदार नही है कि आपने हाथ काट लिए हैं.

एक सुव्यवस्थित वितरण प्रणाली हो जिसमें सभी को न्यूनतम आवश्यक चीजें सरलता से प्राप्त हो, इसके इतिहास साक्षी है अनगिन प्रणालियाँ विकसित की गईं. किन्तु मानव मन में 'लोभ' व 'संग्रह' की सहज वृत्ति होती है(जिसकी ओर आपने इंगित भी किया था). तो अब यह इतना आसान नही किसी भी एक प्रणाली के लिए. सतत प्रयोग जारी है. जाने कितनी क्रांतियां हुईं..! संविधान बने, हुक्मरान बदले.

यह चलता रहेगा. अब इसी क्रम में मै आपके द्वारा संकेतित 'जनसंख्या-वृद्धि' व 'अनुशासन-हीनता' की समस्या को जोड़ लेता हूँ. सहमत हूँ. वाकई ये दोनों यदि अभीष्ट ढंग से हो जाएँ तत्क्षण एक परिवर्तन दृष्टिगत होने लाग जायेगा.

श्याम जी आपको नही लगता, ऐसे और भी अन्य कारक गिनाये जा सकते हैं. जैसे - अशिक्षा ,भ्रष्टाचार, गरीबी, कुरीतियाँ, धार्मिक-उन्माद, आतंकवाद, आदि-आदि. और ये महत्वपूर्ण कारक हैं, एक आदर्श व्यवस्था की चाहत रखने वाला इनकी अनदेखी करने की नहीं सोचेगा.

जैसा कि अंकित जी ने अपनी एक टिप्पणी में कहा.:"चर्चा को उस परिणिति तक ले जाना चाहिए की केवल वो बौद्धिक चर्चा ना रह जाये उसका कुछ लाभ भी आम जन को हो |"

आइये चर्चा करें कि हम व्यक्तिगत अथवा सामाजिक स्तर पर ऐसे कौन से कदम सरलता से (सरलता से इसलिए ताकि इसका अभ्यास बन सके) उठाये जा सकते हैं..?

मेरा मानना है, शिक्षा इसमें बहुत ही बड़ी भूमिका अदा करती है. और औपचारिक शिक्षा से ज्यादा मै उस शिक्षा की बात कर रहा हूँ, जिसे अनौपचारिक कहिये या जिसका कोई सिलेबस नही होता और जो वातावरण से सीखी जाती है. इस अनौपचारिक शिक्षा के सबसे बड़े वाहक हैं परिवार के जन और वरिष्ठ जन का जिम्मेदाराना एवं स्नेहिल-सभ्य व्यवहार. यहाँ वरिष्ठ-जन का मतलब ८ साल वाले के लिए १० साल वाले का व्यवहार, ४० साल वाले के लिए ७० साल वाले का व्यवहार. यह व्यवहार वाणी तक ही सीमित नही है. आचरण की भी बात है. आपको नहीं लगता लोग कितना कैजुअली बात करते हैं. शब्दों का कितना शिथिल प्रयोग करते हैं. केवल अपनी धारणा सत्य साबित करने के लिए किसी भी महापुरुष तक को किसी भी अपशब्द से नवाज़ सकते हैं. यहीं/यूँ ही अनुशासनहीनता पनपती है. 

माता-पिता, वरिष्ठों का सुबह से लेकर शाम तक आचरण, और घर से बाहर भी उनका आचरण,( चूँकि समाज के बाकी अन्य लोग भी माता-पिता, सम्बन्धियों के बारे में कैसी राय रखते हैं, यह भी महत्वपूर्ण हो जाता है.

तो सबसे पहले व्यक्तिगत स्तर पर अध्ययन, अनुशीलन, सतत श्रम एवं अनुशासन की महत्ता का उदाहरण सतत देना होगा. मतलब आचरण की महत्ता.

फिर औपचारिक शिक्षा पर आते हैं...यहाँ तो गंभीर परिवर्तन की आवश्यकता है. यह एक अलग गंभीर मुद्दा है, मेरे पास इसपर कहने को काफी कुछ है. फिर कभी. संक्षेप में शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो काफी लचीली हो, अपने पर्यावरण-सामाजिक वातावरण से सुसंगत हो और छात्रों एवं शिक्षक का सम्बन्ध औपचारिक-अनौपचारिक का सुन्दर-गंभीर मिश्रण हो. मित्रवत तो हो ही, और दोनों ही स्वयं को विषय का शोधार्थी समझें . व्यापार की तरह Give n Take का गंदा रिश्ता ना हो.

फिर राजनीतिक शिक्षा-जागरूकता की आवश्यकता व प्रशिक्षण. लोगों को जानना होगा कि उनकें सहज अधिकार क्या हैं, उन्हें कैसे ईस्तेमाल करना है और इससे भी बड़ी बात उन अधिकारों को कैसे-किन पद्धतियों से प्राप्त करना है..मतलब साध्य से ज्यादा साधन की पवित्रता पर बल. 


इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

वो भूंकते कुत्ते...

निकल आते हैं आंसू हंसते-हंसते,ये किस गम की कसक है हर खुशी में .

लंबे लाल पहाड़