कमबख्त सच

कमबख्त सच

कमबख्त सच को सीढ़ियों सा
सरपट होना था।

कि कोई भी कदम दर कदम
चढ़ते हुए
यथार्थ की सपाट छत पर पहुँचता...।

पर मुआ हुआ गोल प्याज सा
छीलो, उघाड़ो हर परत
हाथ कुछ ना आता।

दरम्यां हथेली पे ही सूख जाते
इकलौते आँसू, जाने
और क्या कहना था।
(श्रीश पाठक प्रखर )

#श्रीशउवाच 

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