मानविकी विषयों की हीन समझ

जिस समाज में मानविकी विषयों को विज्ञान एवं तकनीकी विषयों से हीनतर समझने की अपरिपक्वता व्याप्त है , खासे पढ़े-लिखे लोग भी मानविकी विषयों की महत्ता नगण्य ही समझते हैं, वे नहीं समझ सकते कि ये विद्यार्थी लोग क्यों विरोध कर रहे हैं सीसैट का. समाज और संस्कृति की बुनियादी समझ, विज्ञान एवं तकनीकी विषयों में भी सही मायने में उपयोगी इनोवेशन को जन्म देती है, अन्यथा उनमें विनाश के ही बीज रोपे हुए होते हैं. विज्ञान विषयों की तकनीकियों के माध्यम से, कला विषयों में भी उपयोगिता एवं यथार्थ का तत्व प्रमुखता से उभरता है. ज्ञान का कोई क्लिष्ट विभाग विभाजन नहीं हो सकता. अपने अपने अनुशासन में सभी परिश्रम करते हैं और यथासंभव योग भी देते हैं. मशीन बनाने वाले, समझने वाले लोगों को भी रचनात्मक योगदान देने के लिए एक शांत, उन्नत बेहतर समाज और सरकार चाहिए होता है...ताकि विकास का मूल उद्देश्य सुरक्षित रह सके. एक उन्नत बेहतर समाज और सरकार के लिए मानविकी विषयों में भी निरंतर शोध एवं पठन-पाठन की आवश्यकता होती है. 

दुनिया के बाकि उन्नत देश जिनकी हम बेशर्म नक़ल करना चाहते हैं वे अपनी भाषा एवं इस मानविकी जरूरत की महत्ता को समझते हैं. प्रतियोगी परीक्षाओं को देने वाले लोग खूब समझते हैं आज की जरूरतों को, समाज और आधुनिकता की जरूरतों को, उन्हें पता है इस सेवा के लिए क्या आवश्यक है, वे कहीं से भी कमतर लोग नहीं हैं. पिछले तीन-चार सालों में उनमें से अधिकांश ने अंगरेजी और रीजनिंग जैसे चीजों पर खासा पकड़ भी बना ली है. सामान्य अध्ययन, स्वयं की पढ़ाई से संभव है किन्तु, भाषा एवं aptitude के प्रश्न एक ख़ास ट्रेनिंग की मांग करते हैं, खासकर उन्हें यदि एक समय सीमा में हल करना हो. द्रष्टव्य है कि- जिसे सीखने के लिए कम से कम प्राथमिक स्तर पर वाह्य सहायता अनिवार्य हो, उसका भारांक, स्वयं की पढ़ाई एवं जागरूकता से संभव हो सकने वाले 'सामान्य अध्ययन' से अधिक कर देना अगर आपको तर्कसंगत लगता है, तो कुछ नहीं कहा जा सकता है. 

ध्यान से देखिये तीन चार सालों के प्रश्नपत्रों को, उनकी सरंचनागत पक्षपात को, फिर बोलिए इनके खिलाफ. वे इन प्रश्नों के खिलाफ नहीं हैं, वे इन प्रश्नों के अन्यायपूर्ण वितरण के खिलाफ हैं. इस बारीकी को समझने के लिए आपको खुद तीन-चार वर्ष के प्रश्नपत्रों से गुजरना होगा. तरस आती हैं उन लोगों की सोच पर जो इस मुद्दे को यूँ समझते हैं कि ये आन्दोलनकारी दोयम दर्जे के लोग हैं जिन्हें न कामचलाऊ इंग्लिश आती है और ना ही रीजनिंग-मैथ. और हाँ, ध्यान से देखिये प्रश्नपत्र ...उसमे हाईस्कूल स्तर के प्रश्न नहीं मिलेंगे आपको, जैसा कई लोग कहते आ रहे हैं. आप सभी प्रकार के प्रश्न पूछिए, उन प्रश्नों का स्तर अन्य परीक्षाओं की भांति धीरे धीरे कठिनतर करते जाइए, किन्तु उनका न्यायोचित वितरण तो करिए. अथवा कुछ ना करिए, यही बदनाम यू. पी. -बिहार के लड़के जिन्हें उन्नत शिक्षा सरकारी तौर पे नसीब नहीं हो पायी है ; आने वाले चार-पांच सालों में फिर उतनी ही प्रतिशतता के साथ आने लगेंगे, भले ही वे कक्षा छः से इंग्लिश पढ़ना क्यों ना शुरू करते हों, तब हिंदी के अलावा बाकि भाषाओँ के लोग भी उन्मत्त होंगे...क्योंकि उनकी अग्रेजी वाली बैसाखी भले आज मजबूत दिखाई देती हो, पर उनकी अपनी भाषाओँ का प्रतिशत भी कोई बहुत काबिले तारीफ नहीं है.

सुलझे हुए लोग चाहे जिस भी पृष्ठभूमि के हों, समझता हूँ; उनकी सहानुभूति है पर उलझे हुए समर्थ लोगों का क्या करें....उनसे बस विनती इतनी ही है कि थोड़ा सा समय देकर, शोध कर ही अपनी राय दें.
अच्छे दिन वाली सरकार पर क्या अब कोई वार करें, शायद, सरकारों का चरित्र कमोबेश एक जैसा ही होता हो. आतंकवादियों से नागरिको जैसे डील करते हैं और नागरिकों से आतंकवादियों जैसे. ‪#‎UPSC‬ ‪#‎CSAT‬ ‪#‎श्रीशउवाच‬

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