ईश्वर यदि एक उपयोगी संकल्पना भी है तो वरेण्य तो हैं ही...!!!

धर्म की बात होती है तो सबसे पहले मुझे वोल्तेयर की कही ये उक्ति याद आती है-
ईश्वर ना होता तो उसके अविष्कार की आवश्यकता पड़ती. 
“If God did not exist, it would be necessary to invent him.”

यह उक्ति ईश्वर अस्तित्व की बहस को एक संतुलन  दे देती है. इसीलिये यह उक्ति बहुत ही खूबसूरत हो जाती है. ईश्वर हो ना हो, उसकी आवश्यकता तो है, रहेगी. हम मर्त्यशील हैं, समय की सीमा में बंधा है हमारा अस्तित्व. यह सीमित समय ही शायद हमारी सभी बेचैनियों की वज़ह है. जैसे आप कहीं घूमने जाते हो तो उस जगह का पूरा लुत्फ़ लेना चाहते हो, कम से कम उस जगह की ख़ास चीजों को जरूर महसूस करना चाहते हो...वहां भी हम कम समय में अधिक चीजें कर लेना चाहते हैं. कम समय में अधिक चीजें कर लेने के लिए सबसे आवश्यक है कुशल मार्गदर्शन. शायद धर्म की जरूरत यों महसूस की गयी हो. समय का नुकसान बर्दाश्त नहीं किया जा सकता था तो अनुशासन की आवश्यकता हुई. अनुशासन के लिए अनुशासक एवं मार्गदर्शन के लिए मार्गदर्शक की आवश्यक भूमिका में ईश्वर अवतरित होते हैं. भविष्य की अनिश्चितता एवं प्रकृति के गूढ़ रहस्यों से अनभिज्ञता; ईश्वर में स्वाभाविक आस्था एवं विश्वास का निर्माण कर देती है. 

मनुष्य के विकास के दृष्टिकोण से यह बहुत उपयोगी शुरुआत रही. राज्य, संप्रभुता, शासन, नैतिकता के आधुनिक आविष्कारों से पहले भी तो मनुष्य को इनकी आवश्यकता तो थी ही, तो धर्म और ईश्वर ने इस आकाश को सहज रूप से पूरा किया. वोल्तेयर शायद कहना चाह रहे थे कि संभव है कि ईश्वर हों अथवा ना हों पर निश्चित ही उनकी भूमिका की हमें आवश्यकता जरूर थी. ईश्वर यदि एक उपयोगी संकल्पना भी हैं तो वरेण्य तो हैं ही. ईश्वर का अस्तित्व है तब तो कोई बात ही नहीं है. वोल्तेयर समझाना चाह रहे थे कि फिलहाल ईश्वर-अस्तित्व की बहस बेमानी है. मानव मन चंचल है. चंचल मन अनुशासित करना सहज नहीं. अनुशासन हमारे सीमित समय वाली इयत्ता के लिए आवश्यक है. फिर एक ऐसे मार्गदर्शक के रूप में हमें ईश्वर की भूमिका चाहिए थी जो कठोर मार्गदर्शक हो और सभ्य अनुशासक हो. जीवन-समय का बेहतर उपयोग करने का उद्देश्य कुछ नियमों एवं नैतिकताओं को जन्म देता है. क्रमशः इनका विकास धर्म की विशद आयोजना को लेकर आता है. 

{ Photo Credit : Ayan Bose: Roots of India}

धर्म इसीलिये महत्वपूर्ण है. हम धर्म से इसीलिये अलग नहीं हो पाते क्योंकि इसकी उत्पति का जो हेतु है वो हम सबको संस्पर्श करता है. धर्म की उद्देश्य निश्चित ही पवित्र है...पर इसमें जो कमियां हैं वो इसलिए हैं क्योंकि हममें भी कमियां है. यदि हमने ईश्वर का आविष्कार किया है तो धर्म भी मानवकृत आयोजना है ..सो इसमें भी कमियां है और जैसे जैसे हमारा ज्ञान बोध बढ़ेगा, हमारी यह जिम्मेदारी है कि हम इस पवित्र आयोजना को और भी सम्पूर्ण बनायें. इस जिम्मेदारी का एहसास बताता है कि किसी विश्वास के प्रति कट्टरता कितनी घिनौनी एवं निरर्थक है और यह भी कि कट्टर लोग अपनी कट्टरता से उस विश्वास का सर्वाधिक अहित करते हैं जिसका प्रतिनिधित्व करते वे प्रतीत होते हैं. 

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