माना, बचपन इतना भी बेख़ौफ़ ना होता हो सबका


माना, बचपन इतना भी बेख़ौफ़ ना होता हो सबका, पर जैसी भी जिन्दगी है किसी की, बचपन का अल्हड़पन याद जरुर आता होगा. तेरा-मेरा था, तरोड़-मरोड़ ना था, नीच-ऊंच था भी तो उसका महत्त्व कुछ ना था. जानते कुछ ना थे, जानना सब चाहते थे. प्यार जितना भी नसीब था, हिसाब नहीं था. खेल खेल में मेल और मेल मेल में रेलम रेल हो जाती थी...हंसी-खुशी की फुलझड़ियाँ सबके पास होती थीं. बचपन में हम बड़े बनना चाहते थे, बड़े बनकर हम बड़े जानते हैं कि हम कितने लम्बे, महीन और कमजोर हो गए. बेजान कागज के नोट की अहमियत , जानदार तितलियों से अधिक हम समझदार आंकने लगे...! पता नहीं हम बड़े हुए या छोटे हुए....पता नहीं.

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